महिला दिवस पर सविशेष– कविता ,सशक्त नारी

न सताए जाने का रुदन, न निरीहता की भावना ,

शिकवे-शिकायत ना किसी से – न कोई दुर्भावना ।

वह अपने  मन की शक्ति से करती है जग का सामना ।

वो टूट सकती है, मगर अन्याय से झुकती नहीं,

काँटे हों बिखरे राह में पर वो कभी रुकती नहीं ।

दृढ़ मनोबल है भरा, उसे, जरा कम मत आंकना  ,

वह अपने  मन की शक्ति से करती है जग का सामना ।

सशक्त है पर स्निग्ध है, वह तप्त  है, शीतल भी है,

अपनों के खातिर प्रेम की सरिता का निर्मल जल भी है।

परिवार के हित के लिए जो  सदा करती कामना ,

वह अपने  मन की शक्ति से करती है जग का सामना ।

वो! फर्ज सारे है निभाती, किसी से भी कमतर नहीं ,

डॉ कमलेन्दु कुमार पान्डेय

प्राध्यापक, 

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