मी टू का असर आने लगा

थिएटर, फिल्म कलाकार और निर्देशक नंदिता दास ने अहम् बात कही है. यह जानने के बाद कि उनके पेंटर पिता जतिन दास खुद मी टू अभियान के तूफ़ान के घेरे में हैं, उन्होंने कहा, ‘यह वक्त सही या गलत होने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का है. हमें आवाज उठाने का मंच मिला है, ताकि आने वाले समय में हम तय कर सकें कि हमें कैसे समाज में जीना है. यह तो तय है कि समाज हमेशा सही व्यक्ति का ही साथ देता है. मैं अपने पिता के लिए भी यही बात कहूंगी कि अगर वे सही हैं, तो इसका प्रमाण दें. कम से कम इस अभियान से कुछ सफाई तो हुई है.’
ज्यादा वक्त नहीं हुआ, जब मीडिया इंडस्ट्री महिला कलाकारों के साथ मनमानी करती थी. ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जहां नायिकाओं ने कहा कि बोल्ड और सेक्स के दृश्यों को फिल्माने से पहले निर्देशक ने उनसे सहमति नहीं ली थी . अभिनेत्री रेखा उस समय महज 15 वर्ष की थीं, जब उनकी पहली हिंदी फिल्म अनजाना सफर के नायक विश्वजीत ने निर्देशक राजा नवाथे के कहने पर उन्हें बिना बताए उनके साथ पांच मिनट का चुंबन दृश्य फिल्माया था. रेखा ने कहा था, ‘इस घटना से मैं बुरी तरह बिखर गई थी. मुझे डरावने सपने आते थे. स्वयं से घिन आती थी, लगता था, कहीं दूर भाग जाऊं. लेकिन मजबूरी थी, पैसा कमाना था, इसलिए ऐसे ही माहौल में काम करती रही.’ इधर टेलीविजन और हिंदी फिल्मों में चरित्र भूमिकाएं निभाने वाले वरिष्ठ कलाकार दिलीप ताहिल ने मी टू अभियान को एक नया मोड़ दे दिया है और इसके चलते कुछ सवाल भी खड़े किये हैं .दिलीप, सुधीर मिश्रा की आगामी फिल्म में एक बलात्कारी किरदार की भूमिका निभा रहे हैं. दिलीप इस भूमिका को निभाने के लिए बहुत ही मुश्किल से तैयार हुए, वह भी इस शर्त पर कि अभिनेत्री उन्हें लिखित में देंगी कि उन्हें इस दृश्य को करने में कोई आपत्ति नहीं है और सेट पर उनकी सुरक्षा का मुकम्मल इंतजाम रहेगा .
दिलीप ताहिल के इस बयान के बाद कई फिल्मकारों ने खुलकर सामने आकर उनसे सहमति जताई है. आयुष्मान खुराना, रणवीर सिंह और राजकुमार राव जैसे नई पीढ़ी के युवा अभिनेताओं ने कहा कि फिल्म में नायिका की सहमति के बगैर अब वे उसे छुएंगे भी नहीं. मी टू की पक्षधर मीडिया इंडस्ट्री की युवा पीढ़ी खुद ऐसे नामों के साथ काम करने से परहेज कर रही है, जिनका नाम इस अभियान में सामने आ रहा है. जाहिर है, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की नई पीढ़ी मी टू अभियान का साथ दे रही है, फिर यह चाहे मजबूरी हो या उनकी अंतरात्मा की आवाज. क्योंकि उनके काम पर मोहर लगाने वाले और उन्हें सफल बनाने वाला और कोई नहीं, आम जनता ही है. उस आम जनता की आवाज को सुनना उनके लिए जरूरी है फिर ऐसा चाहे मजबूरी में या फिर इच्छा से किया गया हो.
अस्सी और नब्बे के दशक की हिंदी फिल्मों में नायक की बहन या नायिका का बलात्कार-दृश्य फिल्म को चलाने का एक आसान और अचूक तरीका माना जाता था. उस दौरान ऐसी अनगिनत फिल्में सामने आयीं उस समय अभिनेत्री की सहमति लेना तो दूर की बात, उन्हें ठीक से उस दृश्य के बारे में बताया भी नहीं जाता था. रोटी कपड़ा और मकान की नायिका मौसमी चटर्जी और प्रेम ग्रंथ की नायिका माधुरी दीक्षित, दोनों ने बलात्कार के दृश्यों को अपनी जिंदगी के पन्नों से निकालने की बात कही है. मौसमी इस दृश्य को फिल्माने के कई दिनों बाद तक अपने पति से सहज नहीं हो पाई थीं. माधुरी ने कहा था कि उन्हें इस दृश्य को करने के बाद सामान्य होने के लिए मनोचिकित्सक की मदद लेनी पड़ी थी. परदे के पीछे की दुनिया अत्यंत लिजलिजी, क्रूर और अमानवीय हमेशा से ही रही है.
यह प्रवृत्ति सिर्फ एक अभियान से बदल जाएगी, यह कहना अत्यंत ही मुश्किल है. क्या इससे कास्टिंग काउच जैसी प्रवृत्तियों पर लगाम लग जायेगी ? सालों से चली आ रही सोच कि स्त्री पुरुष की अनुगामिनी है उस के शरीर पर पुरुष का सहज और प्राकृतिक अधिकार है को इतनी जल्दी बदला जा सकेगा? सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री में ही नहीं, दूसरे क्षेत्रों में भी आज जो लोग मी टू का साथ दे रहे हैं, क्या आने वाले समय में वे इस पर सतत डटे रह पाएंगे?
फिलहाल तो मी टू का असर इस स्तर पर भी देखा ही जा रहा है कि जिन लोगों का नाम इस अभियान में आया, उन्हें सामाजिक भत्सर्ना का सामना करना पड़ रहा है और साथ-साथ अपने काम से भी हाथ धोना पड़ रहा है पत्रकार और नेता एम जे अकबर,नाना पाटेकर निर्देशक सुभाष घई, साजिद खान और सुभाष कपूर, संगीतकार अनु मलिक ऐसे ही कुछ नाम हैं, जिन्हें अपने काम, नाम के साथ पद भी गंवाने पड़े. साथ ही सार्वजनिक तौर पर माफ़ी भी मांगनी पड़ रही है लेखक चेतन भगत को, सोशल मीडिया में अपमान का सामना करना पड़ रहा है. कई बड़े नाम सार्वजनिक तौर पर माफी मांग ही चुके हैं.
दरअसल, अब दुनिया पहले से कहीं अधिक पारदर्शी हो गई है. सोशल मीडिया के चलते हर कोई सबकी नजरों में है. मी टू एक ऐसा उपकरण बन गया है, जो रातोंरात किसी को आसमान से जमीं पर ला सकता है, हालांकि यह सब बहुत जल्दबाजी में होता नज़र आ रहा है. लेकिन फिर भी नैतिक जिम्मेदारी से आज कोई बच नहीं सकता. जवाबदेही पुरुषों और स्त्रियों की बराबर है. जिन्होंने शोषण किया वे पुरुष और उनका साथ देने वाली महिलाएं भी. कामकाजी क्षेत्र में स्त्री और पुरुष के बीच तलवार खिंचने का खामियाजा अंतत: किसी को तो उठाना ही पड़ेगा.
जिन क्षेत्रों में आज तक स्त्री-पुरुष एक साथ काम करते थे, आज वहां नए नियम-कानून लागू किए जा रहे हैं. हाल ही में अभिनेत्री कल्कि कोचलीन ने अपने इंस्टाग्राम एकाउंट पर थिएटर ग्रुप की नई गाइड लाइन के बारे में जिक्र किया. साथी कलाकारों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाना चाहिए, किस तरह का स्पर्श जायज और किस तरह का नाजायज है. क्या इन नीतियों के चलते फिल्म, टीवी और वेब सीरीज में काम करने की स्थितियां बेहतर हो पाएंगी? कहीं आपसी सहजता पर इसका असर तो नहीं पड़ेगा?

 

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