वो सिर्फ एक ज्योति थी

इंदिरा जी, आपकी पुण्यतिथि पर आपको यह स्मृति पत्र मेरी तरफ से एक भेंट है. नहीं मालूम निंदा है या प्रशंसा ! लेकिन आप मेरे जेहन में बचपन की उस याद की तरह हैं जो कुछ भूली जरूर है लेकिन उससे कहीं ज्यादा याद है. आप गीतकार के उस कथन की तरह हैं जहां वो कहता है “कभी अलविदा न कहना.”
31अक्टूबर 1984 की सुबह … इंदिरा अपने गले की रुद्राक्ष माला पहनना भूल गयीं और बाहर निकल आयीं तेज़ी से चलती हुई उस लौह महिला को उनके अंगरक्षक बेअंत सिंह ने सलाम किया उत्तर में इंदिरा ने भी सलाम किया. बेअंत ने रिवॉल्वर निकला और अनगिनत गोलियां प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी के सीने में उतार दीं, ये गोलियां नहीं थीं ये एक देश की शान्ति की रोशनी को घृणा के दावानल में बदलने की कुत्सित क्रिया थी.
जो अपने उद्देश्य में सफल भी हुई, आज़ादी के बाद, एक गांधी और, एक इतिहास और ! प्रियदर्शिनी इंदिरा जमीन पर निश्चल गिरी हुई थी वह इंदिरा जिसमें गज़ब का जीवट था.


19 नवंबर 1917 प्रयाग के आनंद भवन में नेहरू वंश की सबसे प्रभावशाली किलकारी गूंजी. इंदिरा प्रियदर्शिनी मेधावी किन्तु मीठी आवाज और शांत व्यवहार की बालिका थी लेकिन औरों से अलग उसमें कुछ था. वह समान्य स्त्रियों की तरह सर झुकाकर प्रत्येक बात सहन नहीं करती थी वरन अन्याय की थोड़ी सी भी मात्रा सहन करने को वह तैयार नहीं थी.
उसमें अपने अधिकारों के लिए लड़ने का साहस था. वह किसी पुरुष का अनुगमन करने के लिए नहीं बनी थी बल्कि पुरुषों को अपनी गरिमा और मेधा से अपना अनुगामी बनाने का उसमें सामर्थ्य था.
उसने गांधी से शान्ति, अहिंसा से भरी राजनीति, पटेल से लौह सी मजबूती, नेहरू की कूटनीति के साथ ही शान्ति निकेतन में टैगोर का सौंदर्य बोध अपने में समेटा, दुनिया भर के साहित्य को पढ़ रही थी, विश्वयुद्ध की विभीषिका को देख रही थी, लता मंगेशकर के गीत गुनगुना रही थी. महादेवी की कविता समझ रही थी. उसे नेहरू होने का गर्व विरासत में मिला था तो श्रीमती फ़िरोज़ गांधी बनना उसने चुना था.
नेहरू इंदिरा के विवाह बंधन से प्रसन्न नहीं थे लेकिन उस उन्नत ललाट वाली इंदिरा ने सभी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को दरकिनार करते हुए फ़िरोज़ का हाथ थाम लिया, लेकिन गुजरते वक़्त के साथ इंदिरा को स्पष्ट हो गया कि फ़िरोज़ को बीवी चाहिए और इंदिरा को हमसफर नतीजा अलगाव. इंदिरा फिर से प्रियदर्शिनी थीं, कदम आंनद भवन की ओर थे, साथ में, राजीव और संजय थे.
चीन की दग़ाबाज़ी नेहरू को अपने साथ ले गयी अब , नेहरू के बाद कौन? क्या इंदिरा? परन्तु नेहरू के बाद सबसे बड़ी दावेदारी लाल बहादुर शास्त्री की थी जो साधु जैसे थे लेकिन इतने साधू नहीं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का सिंहासन अपने नेता की पुत्री को सौंप दें और फिर ये लोकतांत्रिक भी तो नहीं था.
लाल बहादुर की मृत्यु रहस्यमय परिस्थितियों में हो गयी और भारत ने अपनी भूल चुकी सनातन व्यवस्था के गौरव को देखा और भारत को वह गौरव प्राप्त हुआ जो अब तक दुनिया के किसी राष्ट्र को प्राप्त नहीं हुआ था. एक महिला का देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचना , इंदिरा भारत की प्रधान मंत्री बन गयीं. पश्चिमी देशों में पिछड़ा और रूढ़िवादी देश कहे जाने वाले भारत ने इंदिरा को अपना प्रधान मंत्री चुनकर संसार को अपने अग्रणी और आधुनिक होने का परिचय दिया. इंदिरा को सत्ता तो मिली पर सत्ता के साथ ही मिले सत्ता के कांटे और भय लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने इंदिरा का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए सुझाया पर वरिष्ठ नेता मोरारजी देसाई ने भी प्रधानमंत्री पद के लिए स्वयं का नाम प्रस्तावित कर दिया. कांग्रेस संसदीय पार्टी द्वारा मतदान के माध्यम से इस गतिरोध को सुलझाया गया और इंदिरा गाँधी भारी मतों से विजयी हुई. 24 जनवरी, 1966 को इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण की. सन 1967 के चुनाव में कांग्रेस को बहुत नुकसान हुआ पर पार्टी सरकार बनाने में सफल रही. उधर मोरारजी देसाई के नेतृत्व में एक खेमा इंदिरा गाँधी का निरंतर विरोध करता रहा. जिसके परिणाम स्वरुप सन 1969 में कांग्रेस का विभाजन हो गया. उनके अपने ही संगठन में विरोध होने लगे, विरोधी बढ़ते जा रहे थे किन्तु इंदिरा अपनी ही शैली में आगे बढ़ती जा रहीं थीं. 1969 में इंदिरा ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और निजी बैंकों का अस्तित्व खत्म करके जहां उन्हें एक राष्ट्रीय नीति के अंतर्गत लाकर आम जनता की पहुंच में बनाया वहीँ देश भर के वणिक समाज की वह दुश्मन बन गयीं. गूंगी गुड़िया कहलाने वाली इंदिरा दुर्गा बन गयी थीं जब उन्होंने बड़े ही कूटनीति ढंग से पाकिस्तान पर हमला करके उसके दो टुकड़े कर दिए और झुकने पर मजबूर कर दिया. सन 1971 में बांग्लादेश के मुद्दे पर भारत-पाकिस्तान में युद्ध छिड़ा और पहले के तरह एक बार फिर पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी. 13 दिसंबर को भारत की सेनाओं ने ढाका को सभी दिशाओं से घेर लिया. 16 दिसंबर को जनरल नियाजी ने 93 हज़ार पाक सैनिकों के साथ हथियार डाल दिए. युद्ध में हार के बाद ज़ुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के नए राष्ट्रपति बने और उन्होंने भारत के समक्ष शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा जिसे इंदिरा गाँधी ने स्वीकार कर लिया और फिर दोनों देशों के बीच शिमला समझौता हुआ.

इंदिरा गाँधी कभी भी अमेरिकी खेमे में शामिल नहीं हुईं और तत्कालीन सोवियत संघ से मित्रता और आपसी सहयोग बढ़ाया, जिसके परिणाम 1971 के युद्ध में भारत की जीत में सोवियत संघ का राजनैतिक और सैन्य समर्थन के भरपूर योगदान के रूप में सामने आया था. इसके साथ ही कमजोर कहे जाने वाले भारत को उन्होंने विश्व के सबसे शक्तिशाली देशों की पंक्ति में ला खड़ा किया. जब उन्होनें पोखरण में भारत का पहला परमाणु परिक्षण किया, तब वे दुनिया पर दादागिरी कर रहे अमरीका से भी नहीं डरीं. न ही उसके डर से, किसी तरह की बंदिशों को भारत पर लादने वाले समझौते किये. पाकिस्तान युद्ध के बाद इंदिरा गाँधी ने अपना ध्यान देश के विकास की ओर लगा दिया. संसद में उन्हें पूर्ण बहुमत प्राप्त था जिससे निर्णय लेने में स्वतंत्रता थी. उन्होंने सन 1972 में बीमा और कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया. उनके इन दोनों फैसलों को अपार जनसमर्थन प्राप्त हुआ. इसके अतिरिक्त उन्होंने भूमि सुधार, समाज कल्याण और अर्थ जगत में भी कई सुधार लागू किये. उन्होंने भारत को विज्ञान के मार्ग पर डाला, हरित क्रान्ति, श्वेत क्रान्ति, भूमि सुधार, हरिजन उत्थान, पुल, सड़कें, विश्व विद्यालय, यहां तक की संचार क्रांति के महत्व को समझ कर उपग्रहों के निर्माण की शुरुआत की और देश को संचार क्रान्ति के मार्ग पर डाला. इनसेट १-बी को अंतरिक्ष में भेजा जिससे दूर संचार और दूरदर्शन दोनों नए रूप में आधुनिकता के साथ आगे आये. उन्होनें राष्ट्र का सिर उठाकर भारत के पहले और अब तक के एकमात्र अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा से पूछा, अंतरिक्ष से हमारा भारत केसा लग रहा है? उत्तर मिला …. सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा … . इतिहास सत्ताधारियों के डर और भय का गवाह रहा है भ्र्ष्टाचार बढ़ रहा था और बढ़ रहे थे अनदेखे दुश्मन. प्रिवीपर्स बंद कर देने से भारत के तमाम राजवंश और उनके अधीनस्थ उनके विरोधी हो चुके थे. राजवंशों से उनके तोहफे और अतिरिक्त विलासिता की सामग्री छिन रही थी और छिन रहे थे उनके वे अधिकार जिन्हें वे राजवंश के होने के नाते अपने प्राकृतिक अधिकार मानते थे.
बढ़ते हुए विरोधियों और भ्रष्टाचार से घबराकर लौह महिला ने देश पर आपातकाल लाद दिया. बदले में इंदिरा को मिला देश भर का विरोध, अंतर्राष्ट्रीय मंच पर असम्मान, जनता सड़कों पर उतर आयी. दिनकर ने लिख डाला, सिंहासन खाली करो की जनता आती है. गांधीवादी सिद्धांतों पर चलने वाले जयप्रकाश नारायण, जनता के नेता बनकर सामने आये. उत्तर भारत जल उठा, इंदिरा को सत्ता से उतार दिया. ..जेल में डाल दिया , लेकिन आर्योवन – रक्त से सिंचित इंदिरा आपातकाल के लिए जनता से माफ़ी मांगकर और गरीबी हटाओ के नारे के साथ पुनः सत्ता में लौट आयीं लेकिन इस बार उनकी प्रतीक्षा में था देश का पहला साम्प्रदायिक आतंकवाद — सिख आतंकवाद ! भिंडरावाले के नेतृत्व में पंजाब में अलगाववादी ताकतें सिर उठाने लगीं दूसरी ओर भिंडरावाले को ऐसा लगने लगा था की वह हथियारों के बल पर अलग अस्तित्व बना सकता था. स्थिति बहुत बिगड़ गयी थी और ऐसा लगने लगा था की नियंत्रण अब केंद्र सरकार के हाथ से भी निकलता जा रहा है. इधर इंदिरा के लाड़ले संजय की अकाल मृत्यु हो चुकी थी.


सितम्बर 1981 अंततः दुखी और विचलित इंदिरा गाँधी ने किसी भी धर्म स्थल में सबसे अधिक गोलियां चलाने का इतिहास बनाया. स्वर्ण मंदिर रक्त से नहा उठा और पंजाब की हर आँख में वह खून उतर आया. ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के पाँच महीने के बाद ही 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गाँधी के दो सिक्ख अंगरक्षकों बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी. सदी के महानायक अमिताभ बच्चन दिए की लौ को बढ़ाते रहे. दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्ष आते रहे जाते रहे , जल उठा सारा देश , जल गई नेहरू की लाड़ली. …. फिरोज की प्रिय…अटल की दुर्गा. ..देश की लौह बिटिया , दुनिया की सबसे प्रभावशाली महिला और देश की सबसे शक्तिशाली प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी. ..धरती रो रही थी. ..और प्रियदर्शिनी आकाश में सीने से लिपट चुकी थी अपने परमपिता के सीने से ठीक गुलाब की उस अधखुली कली की तरह जो उनके पिता नेहरू के कोट पर हमेशा टंकी रहती थी. ..अब न कोई विवाद था , न प्रसाद. ..केवल एक रोशनी थी पवित्र रोशनी.

किरन संजीव

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