हिन्दी कविता का इतिहास

हिंदी दिवस के अवसर पर आओ सब बैठो पास ,

ध्यान लगा कर सुनना  हिंदी कविता का इतिहास .

आदिकाल हिंदी कविता का युद्धभूमि से आया ,

जब विजयी नृप के चारण ने गीत विजय का गाया .

पृथ्वीराज रासो लिख कर हैं अमर चंदबरदाई ,

खुसरो की सारी पहेलियाँ भी इस युग आईं .

भक्तिकाल ने हिंदी कविता की धारा को मोड़ा ,

छोड़ युद्ध को ईश्वर की भक्ति से नाता जोड़ा .

संत कबीर के दोहों ने था किया बड़ा परिवर्तन ,

पाखंडों की पोल खोल कर ले आए नवचिंतन .

बृजभाषा में सूरदास ने वाह ! गज़ब रच डाला ,

कृष्णभक्ति में वात्सल्य रस का मधु मिश्रण डाला .

सुर सागर में भर डाला उन्होनें घट में सागर ,

भ्रमर गीत में विकल गोपियों की वेदना उजागर .

और हुए कवि कुल शिरोमणि तुलसीदास हमारे ,

रामचरित मानस सी रचना जग में नहीं हमारे .

घर घर में गाई जाती पुरुषोत्तम राम की गाथा ,

धन्य हुआ यह राष्ट्र ! बनी हिंदी जन जन की भाषा .

और तभी राणा के देश में मीरा ने घर छोड़ा ,

रच पदावली श्याम भक्ति की सबसे नाता जोड़ा .

और हुए नानक , दयाल , रैदास  और सुंदरदास ,

रसखान , रहीम , बिहारी , भूषण और चतुर्भुजदास .

फिर आया वह रीतिकाल जिसने हिंदी को सजाया ,

सजी अलंकारों सी नायिका , सुंदर रूप बनाया .

केशवदास की कविप्रिया कल्हण की रजतरंगिनी ,

जयदेव की कविता ज्यों सरोवर के बीच कमलिनी .

ऐसे ही समय गुजरा जब सदी उन्नीसवीं आई ,

हिंदी ने खड़ी होकर अपनी पहचान बनाई .

एक सूत्र में देश पिरोने चली कविता की माला ,

भारतेन्दु , हरिऔध , द्विवेदीजी ने इसे संभाला .

राष्ट्र गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था भाई ,

भारत – दुर्दशा के मंचन ने नवचेतना जगाई .

श्रीधर पाठक की श्रांत पथिक और हरिऔध का प्रिय – प्रवास ,

नव – पुष्पों के नव – पल्लव में हिंदी बनी देश की आस .

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण जी गुप्त हुए अविनाशी ,

जब उन्होनें महाकाव्य साकेत की रचना की .

जिसका दुःख किसी ने न जाना उसको उन्होंने पहचाना ,

व्यथा बयाँ की उर्मिला की यशोधरा का दर्द भी जाना .

दिनकर से दिनकर उदित हुए जब रश्मिरथी बनकर आये ,

महाकाव्य कुरुक्षेत्र लिखा और राष्ट्रकवि बनकर छाए .

वयस्क हुई हिंदी कविता बन छायावाद थी छाई ,

जयशंकर प्रसाद ने रचना कामायनी बनाई .

महादेवी की अगम व्यथा भी यामा में दी दिखाई ,

अज्ञेय, निराला, पंत भी लाये कविता में सच्चाई .

नई कविता की नई बातें हैं , कुछ छुई – अनछुई रातें हैं ,

बच्चनजी की वो मधुशाला , तन का प्याला मन की हाला .

नागार्जुन की कविता में निहित गरीब की बानी ,

और सुमनजी की कविताएं हों ज्यों बहता पानी .

कवि शेष हैं और अनेक हैं सब हैं एक से बढ़कर एक ,

क्षमाप्रार्थी हूँ मैं उनसे जो रह गए हों शेष .

हिंदी बढ़े चहुँ ओर दिशा से सबके मन को भाये ,

भारत ही नहीं अपितु सारा विश्व विजय कर आये .

   डॉ. कमलेन्दु कुमार पान्डेय

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