हिंद स्वराज : गांधीवाद

गांधी ब्रिटेन या ब्रिटिशर्स के खिलाफ नहीं थे और न ही वह पश्चिम के विरोधी थे बल्कि वे केवल भारत के लिए प्रतिबद्ध थे.

1909 में सभी के लिए स्वराज का अर्थ था ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता. लेकिन महात्मा गांधी के स्वराज का विचार अलग था. उनके लिए, आजादी का अर्थ स्व शासन अर्थात आत्म-शासन, आत्म नियंत्रण एवं वास्तविक ग्रह शासन था. इसका अर्थ केवल भारतीयों द्वारा शासन नहीं था, बल्कि अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि भारतीयों द्वारा भारतीय मूल्यों के साथ शासन किया जाए.

आजादी से बिलकुल उलट, आत्म-शासन वाला स्वराज पूरी तरह से आध्यात्मिक अवधारणा है. केवल अंग्रेजों को बाहर निकालकर मिली स्वतंत्रता से गांधी संतुष्ट नहीं थे. उनका मानना था की यह तो अंग्रेजों के खिलाफ लगातार विद्रोह करके भी किया जा सकता है, जैसा कि अमेरिकियों ने सन 1776 में किया था, और भारतीयों ने भी सन 1857 में इसी अमेरिकी तरीके को दोहराने की कोशिश की और उसमें असफल रहे.
स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के अपने प्रकृति प्रदत जन्मसिद्ध अधिकार की रक्षा करने के लिए भारतीय हथियारों का इस्तेमाल कर रहे थे और यह एक अवैध गतिविधि भी नहीं कहलाती थी, लेकिन गांधी ने तस्वीर बदल दी और ब्रिटिश शासन से आजादी के लिए नए रूप में संघर्ष किया, साथ ही एक नई सभ्यता का निर्माण भी किया.
1908 में जहाज द्वारा लंदन होते हुए भारत से दक्षिण अफ्रीका लौटने के दौरान गांधी ने हिंद स्वराज को लिखा था. उन्होंने केवल 10 दिनों में 30,000 शब्द, 275 पृष्ठों के साथ 20 अध्यायों के साथ लेखन पूरा किया और वह भी तब जब दाहिने हाथ में लिखते लिखते दर्द शुरू हो गया तब यह कार्य उन्होनें बाएं हाथ से पूरा किया.
यह पुस्तक पहली बार इंडियन ओपिनियन समाचार पत्र में किश्तों में छपी और फिर 1909 में एक पुस्तक के रूप (गुजराती में) में आई.
हिंद स्वराज को भारत में बैन कर दिया गया और बाद में गांधी ने स्वयं इसका अंग्रेजी अनुवाद इंडियन होम रूल के नाम से किया. उपनिषद परंपरा का अनुसरण करते हुए, उन्होंने हिंद स्वराज पुस्तक को एक संवाद के रूप में प्रस्तुत किया. जो कि एक ‘संपादक’ और एक पाठक के बीच था.
पुस्तक की प्रस्तावना में गांधी ने लिखा ‘कि वह लंदन में कुछ भारतीय क्रांतिकारियों से मिले. वह उनकी “बहादुरी” से प्रभावित थे, लेकिन उन्होंने उनके उत्साह को ‘गुमराह’ माना क्योंकि वे भारत को हिंसा के तरीकों और माध्यमों से मुक्त करना चाह रहे थे, जिसमें बम विस्फोट और राजनीतिक हत्याएं तक शामिल थीँ.
गांधी ने हिंद स्वराज में लिखा था, वह यह तथ्य पहले से ही मानते थे और इससे सहमत थे कि हिंसा अन्याय से लड़ने का भारतीय तरीका नहीं था, और यह मानव जाति के लिए आधुनिक औद्योगिक सभ्यता की देन था. इसलिए, उन्होंने हिंसक तरीकों को कभी स्वीकार नहीं किया.
वे अंग्रेजों के खिलाफ नहीं थे और न ही वे पश्चिम के खिलाफ थे; वे भारत और उसके मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध थे और आधुनिक सभ्यता के रूप में थोपी गयी पश्चिमी औद्योगिक सभ्यता के खिलाफ थे. वे चाहते थे कि स्वतंत्र भारत को भारतीय जड़ों द्वारा शासित किया जाए क्योंकि ‘यह आधुनिक दुनिया का चमक है जिसने भारत को बंदी बना दिया.
उन्होनें कहा “अंग्रेजों ने भारत नहीं लिया है; हमने उन्हें दिया है. वे अपनी ताकत के कारण भारत में नहीं हैं, बल्कि इसलिए हैं कि हम उन्हें रखते हैं”. इस प्रकार हिंद स्वराज अहिंसा और अहिंसात्मक प्रतिरोध पर एक पुस्तक है यह आधुनिक सभ्यता के निहित खतरों को बताता है. उनसे सावधान करता है.

भारत में स्वतंत्रता संग्राम का लक्ष्य है:
– अंग्रेजों को केवल अहिंसक साधनों का उपयोग करके भारत छोड़ने के लिए मजबूर करना.
– अपने कर्तव्यों को प्राथमिकता देने के लिए लोगों को शिक्षित करना
लोगों को स्व-नियंत्रण (स्वराज) द्वारा बेहतर इंसान बनने के लिए प्रशिक्षित करना. स्व-नियंत्रण अर्थात स्वराज्य, यह सभी जगहों गांव, शहर, राज्य,और प्रदेश पर लागू करना है वहाँ लोगों को स्वराज्य अर्थात स्व नियंत्रण द्वारा सिखाना है कि यह मानव अधिकारों की रक्षा का कर्तव्य है जो की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक भेद भाव से दूर है.
स्वतंत्र भारत के समाज और अर्थव्यवस्था को इस तरह से व्यवस्थित करना कि आत्म-सम्मान के साथ सभी की खाद्य, कपड़े, आश्रय, स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, जैसी बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता के आधार पर और संतोषजनक ढंग से पूरा किया जा सके.
हिन्द स्वराज अवधारणा और कार्य दोनों में विशिष्ट रूप से भारतीय था और बड़े पैमाने पर इसका उपयोग करने का इसका कोई पूर्व इतिहास भी नहीं था. इसमें लोगों को अन्याय के खिलाफ विरोध करने के लिए संगठित करना था, लेकिन किसी भी रूप में हिंसा के उपयोग के बिना-विचार, शब्दों या कार्रवाई के रूप में भी हिंसा का उपयोग नहीं करना हगा यही हिन्द स्वराज का तात्पर्य है.

महात्मा गांधी ने इसे अहिंसक विरोध का नाम दिया, यानी प्रतिद्वंदी को चोट पहुंचाए बिना बुराई और अन्याय के खिलाफ लड़ना ही अहिंसक विरोध है.

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