गांधी के गाँव : ग्रामीण विकास

“गांधी के ग्रामीण विकास मॉडल”

हर शहर के बाहर रेलवे लाइन के किनारे किनारे बसी झुग्गी झोपड़ियां , शहर में हर पॉश और शानदार इलाकों के आगे, निर्माणाधीन क्षेत्रों के आसपास बानी झोपड़पट्टियां ! हर शहर का नगर निगम इन्हें एक जगह से उठाकर दूसरी जगह फेंक देता है. कैसे बनती हैं ये झोपड़पट्टियां? कहाँ से आते हैं इनमें रहने वाले लोग ? क्या ये सभी भीख मांगने वाले होते हैं ? इतने गरीब , भिखारी आते कहाँ से हैं ? क्या दुनिया बनी तभी से ये मौजूद हैं दरअसल शहर और ग्रामीण विकास के धरातल अलग अलग रहे हैं. एक तरफ जहां विकास के नाम पर प्राथमिक शाला और एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद रहा है. वहीँ दूसरी और चमचमाती सड़कें, तकनीकी महाविद्यालय, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, महाविद्यालय विश्वविद्यालय, शॉपिंग मॉल, मल्टीप्लेक्स, शानदार सितारा होटल्स हैं. ऐसे में ये चमक दमक किसी को भी अपनी और खींचने की सामर्थ्य रखती है दूसरी और बारिश- गर्मी की मार, बीमारियों से जूझते और रोज़मर्रा की परेशानियों को झेलते ग्रामीण हैं. इन सबसे ऊपर असुरक्षित व्यसाय कृषि जिसमें ज्यादा फायदा तो छोटे और मझले किसानों को कभी हुआ ही नहीं, आये दिन अकाल , बाढ़, सूखे की मार को और झेलना पड़ता है. अशिक्षा की कमी से रूढ़ियों में जकड़े जीवन की सामान्य मुस्कान को भी तरसते लोग स्वतः ही रोज़गार, आसान जीवन की चाह में शहरों की ओर खींचे चले आते हैं लेकिन ये तो कौशल रहित मानव हैं इन्हें खेती के अलावा कुछ आता ही नहीं है ऊपर से पैसा भी नहीं ! फिर क्या ? देखते देखते खेतों का किसान मल्टिस्टोरीज का मज़दूर बन जाता है. उसकी पत्नी के हाथ घर घर जाकर झाड़ू पौंछा और जूठे बर्तन साफ़ करने लगते हैं. सरकारी स्कूलों में गए बच्चे दोपहर को घर लौटकर माँ पिता के स्नेह से वंचित, किसी की देख रेख के अभाव में या तो चोरी करने लगते हैं या कचरा बीनते हैं या ऐसे ही किसी छोटे मोठे अपराध में सलंग्न हो जाते हैं या बाल मजदूरी इन्हें मिल सकती है और इस तरह बस जाती है एक और झोपड़ पट्टी !
ग्रामीण विकास के लिए गांधीजी ने एक सक्रिय प्रयास किया था. ग्रामीण विकास के लिए, रोज़गार और उससे होने वाली आय के माध्यम से गाँव और देश का विकास उनका लक्ष्य था और इस उद्देश्य की पूर्ती के लिए लिए उन्होनें 18 रचनात्मक कार्यक्रम विकसित किए गए थे. जिनको लागू करने के लिए 5000 कार्यकर्ता और कई संगठन थे जिनमें चरखा संघ, हरिजन संघ, सेवा संघ, ग्रामोद्योग संघ, अखिल भारत, गौसवा संघ शामिल थे और कस्तूरबा ट्रस्ट शामिल थे.
इन कार्यक्रमों के द्वारा ग्रामीण विकास के लिए एक नई नींव रखी गयी थी . जिसकी रूपरेखा गांधीजी के आश्रम में तैयार की गई थी और इन सभी कार्यक्रमों के साथ, गांवों का विकास धीरे-धीरे शुरू हुआ . आज़ादी के बाद इन सभी ग्रामीण पुनर्निर्माण कार्यक्रमों को “सर्व सेवा संघ” द्वारा चलाया गया, जिसका मुख्य लक्ष्य सर्वोदय समाज था.
इसलिए, 1938 से गांधी द्वारा शुरू किए गए इन सभी प्रयासों को 1948 में सम्मिलित रूप से “सर्वोदय समाज” नाम दिया गया और आजादी के बाद भी इस संस्था के अंतर्गत ये सभी कार्य जारी रखे गए .
प्राचीन भारतीय संस्कृति की छाया में गांधीजी नई सामाजिक रचना विकसित करना चाहते थे, जिसमें अहिंसा और सत्य के माध्यम से मानव विकास का महत्व शामिल था.
यह अभियान लोगों और समाज के बीच शांति पर आधारित है. गांधीजी का उद्देश्य गांवों से गंदगी को हटाना और गाँवों को साफ़ बनाना भी था. गांधीजी का उद्देश्य ग्राम्य संस्कृति पर आधारित एक भारतीय समाज बनाना था, उनके अनुसार,गाँवों का विकास होगा तभी देश का विकास होगा. इसके लिए उन्होनें सार्वभौमिकता, विशेष प्रयास की नीति और नीति नियमों का महत्व दिया जिसे आज “गांधी के ग्रामीण विकास मॉडल” के रूप में जाना जाता है.


गांधीजी का गांवों के विकास पर जोर देने का मुख्य कारण यह था कि भारत के अधिकांश नागरिक गाँवों में रहते हैं और गांव के लोगों के जीवन में सत्य और अहिंसा शामिल है ग्रामीण जीवन स्वदेशी को बढ़ावा देता है.
गांधी के मंतव्य के अनुसार, खादी एक महत्वपूर्ण उद्योग था. खादी का उत्पादन और बिक्री ग्रामीण लोगों के जीवन यापन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
गांधीजी द्वारा खादी उद्योग शुरू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य गांव में हर व्यक्ति को मिलने वाला रोजगार था . उन्होंने सरकार को चुनौती दी “कि यदि सरकार खादी उद्योग और ग्रामोद्योग के बिना सभी को नौकरियां मुहैया कराती है, तो मैं अपने सभी कार्यक्रमों को वापस ले लूँगा .”
गांधीजी द्वारा शुरू किए गए सभी कार्यक्रमों को अब सरकार आगे बढ़ा रही है, गांधी जी चाहते थे कि गांवों में बेरोजगारी, गरीबी और बढ़ती शहरी असमानता को हटा दिया जाना चाहिए. आज़ादी बाद सरकारें इस दिशा में प्रयास कर तो रहीं हैं लेकिन अधूरे प्रयास पूरी सफलता कैसे दे सकते हैं
आदमी के लिए सिर्फ बेतहाशा भागते जाना ही सब कुछ नहीं है दिशाहीन दौड़ का कोई मतलब नहीं होता. अगर हमारी दौड़ की दिशा सही है तो हम देरसवेर मंजिल तक भी पहुंचेंगे और सही सलामत व संतुष्ट होते हुए पहुंचेंगे. वरना एक अतृप्ति, एक प्यास, एक छटपटाहट, एक बेचैनी जीवन भर हमारे इर्दगिर्द मंडराती रहेगी और हम सतत तनाव में जीते हुए बेचैन मौत मर जाएंगे.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *