बांके बिहारी बहरे हो गए ?

 

 एक सवाल भी उसके साथ आया, क्या सच ही बांके बिहारी बहरे हो गए हैं ?

जल्दी जल्दी सामान को बांधती रिंकू भूल ही गयी थी कि पिछले लगभग एक माह से वह लगातार काम में जुटी हुई थी. पहले दिवाली की सफाइयां फिर बजारदारी और अंत में घर में मिठाइयां, मठरी लड्डू बनाने में इतनी व्यस्त रही कि महीना कहाँ बीत गया खबर ही नहीं लगी.
सूरत में रहने का एक ये भी सुख था की वर्ष में दिवाली के बाद एक बार छुट्टियां बिताने किसी पर्यटन स्थल पर या फिर किसी भी नई अनदेखी जगह पर वह अपने पति और बच्चों के साथ, सैर पर कुछ दिनों के लिए चली जाती थी.

व्यापारी पति दिवाली पर अत्यंत व्यस्त तो रहते थे पर वर्ष भर का मुनाफा भी इसी समय निकल आता था, इसलिए खर्चा करने में कोई हिचकिचाहट उन्हें नहीं होती थी. दूसरे दिवाली के तुरंत बाद से पूरा बज़ार भी पांच दिनों के लिए बंद हो जाता था. बच्चों के स्कूल तो पूरे तीन हफ़्तों के लिए अवकाश देते थे. दूसरे शहरों में रहने वाले उनके रिश्तेदार इस अजीब से अवकाश पर आश्चर्य व्यक्त करते थे लेकिन सूरत वासियों की तो ये छुट्टियां जान होतीं थीं.

इस व्यापारिक नगरी के लोग वर्ष भर दिवाली और फिर इसकी छुट्टियों की राह देखते थे. पूरे देश में इस शहर की बनी साड़ियां बिक्री के लिए जातीं थीं और दिवाली तो सच की दिवाली हो जाती थी. इस बार भी उसके पति संजय को व्यापार में खूब फायदा हुआ था. उन लोगों ने दिवाली से तीन माह पूर्व ही आगरा घूमने का कार्यक्रम बना लिया था. पिछले तीन दिन से वे आगरा घूम रहे थे.

अब बच्चे यहां से अपनी मौसी के साथ ट्रेन से वापस कोटा जा रहे थे, जो की दिल्ली से आज दोपहर की ट्रेन से आगरा होते हुए कोटा लौट रही थी बस इसीलिए वह जल्दी कर रही थी, होटल से चेक आउट करना था. उसने सामान एक बार फिर से चैक किया कहीं कुछ छूट तो नहीं गया है सब रख गया है तसल्ली करने के बाद उसने संजय से सामान बाहर रखने के लिए बोल दिया. होटल का पेमेंट चुकाकर वे बाहर आ गए तब तक टैक्सी आ गयी. सामान उसमें रखने के बाद स्टेशन के लिए चल दिए. उनके स्टेशन पहुँचने के थोड़ी देर बाद ट्रेन आ गयी.

बच्चों को मौसी को परेशान न करने की ताकीद देकर ट्रेन में चढ़ा दिया. अब वे पति पत्नी सोच रहे थे कि एक दो दिन और आगरा रूका जाए. तभी संजय ने कहा “यहां तक आये हैं तो मथुरा भी घूम आते हैं. बांके बिहारी के दर्शन भी कर लेंगे”. उसने तुरंत ही अपनी सहमति दर्शा दी. टैक्सी से आगरा के लिए सफर कुछ लंबा भी नहीं था. लगभग डेढ़ घंटे में वे पहुँच गए.

मथुरा टैक्सी स्टैंड से बाहर आकर वे ऑटो देखने लगे, तभी एक कमजोर सा हाथ रिक्शा वाला उनके सामने आकर खड़ा हो गया “कहाँ चलोगे साहब ?” वह उसको देखने लगी, रूखे से छोटे छोटे बाल जो धूप ने सुनहरे कर दिए थे, आँखों में थोड़ा सा तिरछापन मौजूद था जिससे पता नहीं लग रहा था कि वह किसे देख रहा है. संजय ने पूछा “बांके बिहारी मंदिर चलोगे?” “चलुंगो साहब, चलुंगो.” “चलो, लेकिन उससे पहले किसी अच्छी चाट की दुकान पर ले चलो” कहते हुए संजय रिक्शे में चढ़ गए. वह भी सहारा लेकर रिक्शे पर चढ़ गई.

तभी संजय ने उसकी तरफ देखते हुए कहा “मथुरा की चाट बहुत प्रसिद्ध है यहां आये हैं तो खाएंगे जरूर !”
वह बाज़ार की रौनक देख रही थी शाम होने लगी थी. दुकानों में लाइटें जल चुकी थीं. लोगों की भीड़ लगभग सभी दुकानों पर थी. अग्रवाल चाट भण्डार के आगे रिक्शा धीरे करते हुए रिक्शे वाले ने कहा “साहब यहां के टिकिया छोले मशहूर हैं,” “यहीं रोक दो” कहते हुए संजय रिक्शे से उतर गया. रिक्शा रूकते ही वह भी नीचे उतर गयी. संजय ने दुकान पर पहुँच कर दो दोने टिकिया छोले के बनाने के लिए कहा, “तीन दोने” बीच में ही रिंकू ने कहा, एक दोना रिक्शे वाले के लिए. एक दोना रिक्शे वाले को देकर, दूसरा दोना हाथ में लेकर सड़क के किनारे रिंकू खड़ी हो गयी.

सड़क पर खूब रौनक हो रही थी. लोग इधर से उधर आ जा रहे थे. उसकी निगाहें सजी हुई दुकानों पर घूमने लगीं. अधिकाँश दुकानों के नाम कृष्ण के अलग अलग नामों पर थे.

उसने रिक्शे वाले की तरफ गर्दन घुमा कर कहा, “तुम तो रोज़ ही बांके बिहारी के दर्शन करते होंगे ?” “हाँ, रोजहिं हम जात हैं, सुबह से सांझ तक चार बार जात हैं” अपनी तिरछी दृष्टि से उसे देखते हुए वह बोला . “वाह ! तब तो तुम्हारी सब बात भगवान सुनते होंगे,” “नाहीं बहनजी, नाहीं सुनत ! हमार औरत बुलाई ली, हमरा दो बछवा भी उन् ने लइ ली, अब हम कहत हैं हमें दस हज़्ज़ार रूपया जुड़वा दे, हम अपनी चना दाना की दूकान कर लइ, पर नाहीं सुनत है पांच बरस होइ गवा, रुपया जुड़ता ही नाहीं, कबहुँ बुखार, कबहुँ कोई खरच, अब काह कहत ? हम तो रोजहिं ऊ से कहत रहें, अबहुँ तो लागत है बांके बिहारी बहरा होइ गवा,” वह अवाक रह गयी ! इतनी गंभीर बात, इतने सहज ढंग से ?

रिक्शे वाला लगातार अपनी बात कहता रहा “हम सुबह कबूतरों को दाना डालत हैं, चींटियों को बिसकिट भी खिलात हैं पर बहिनजी इ बांके बिहारी तो बहरा होइ गवा है हम गरीबों की बात ऊ तक नाही पहुँचत है,” वो और भी जाने क्या क्या कह रहा था लेकिन उसे अब कुछ सुनाई नहीं दे रहा था.

मथुरा से वापस अपने शहर तो आ गयी लेकिन एक सवाल भी उसके साथ आया क्या सच ही बांके बिहारी बहरे हो गए हैं ?

किरन संजीव 

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