हिंदी फिल्मों में कॉमेडी


सालों से हिंदी फिल्मों में कॉमेडी का ज़ोनर काफी हद् तक लोगों को लुभाने में असरदार रहा है और फिल्म में कॉमेडी के लिए कलाकार भी अनोखा रंग प्रदान करते रहे हैं. ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने में, चार्ली चैपलिन ने दुनिया भर को कॉमेडी की समझ दी. हिंदी फिल्मों में कॉमेडी का इतिहास काफी सुनहरा रहा है, भगवान दादा पहले ऐसे कॉमेडियन थे जिन्होंने हिंदी फिल्मों में कॉमेडी का दौर शुरू किया और उनके बाद काफी कलाकारों ने फिल्मों में इस को आगे चलाया.फिल्मों में साफ़ सुथरी कॉमेडी का भी एक दौर था. उस समय ऐसे कॉमेडियन्स आये जिन्होनें बहुत ही सहजता से अपने काम को किया. वे अपना नाम और छाप छोड़ गए. इनमें जॉनी वॉकर, केशटो मुखर्जी, ओम प्रकाश, अशोक कुमार, मुकरी, के नामों को फिल्मी कॉमेडी में आदर के साथ लिया जाता है.

ये हिन्दी सिनेमा का वो दौर था जब हास्य कलाकार फिल्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते थे फिल्म की कहानी में इनके लिए विशेष तौर पर जगह रखी जाती थी. मुख्य कहानी के साथ पेरेलल एक हास्य कहानी भी चलती थी कई बार कलाकारों के हास्य की विशेष अदा को ध्यान में रखकर कहानी लिखी जाती थी इन कलाकारों पर परदे पर गाने भी फिल्माए जाते थे, सभी को याद होगा फिल्म प्यासा का जॉनी वॉकर पर रफी साहब की आवाज़ में फिल्माया गया “मालिश ,तेल मालिश सर जो तेरा ” जॉनी वॉकर पर ही फिल्माया गया ” जाने कँहा गया मेरा जिगर गया जी” भगवान दादा पर फिल्माया “खाली डब्बा खाली बोतल” भी ऐसे ही कई गानों को इन हास्य कलाकारों पर फिल्माया गया है उस वक़्त कई महिला हास्य कलाकारों ने भी अपनी उपस्थिती हिन्दी सिनेमा में दर्ज़ कराई जिनमें टुनटुन , शोभा खोटे के नाम मुख्य हैं इन सभी कलाकारों ने अपनी कॉमिक टाइमिंग से सिनेमा के हर दौर में लोगों को हँसाया है. हर एक की अपनी अलग पहचान थी, जैसे ओम प्रकाश साहब सिर्फ अपनी आवाज़ के दम पर लोगों को हँसा सकते थे, जबकि केशटो मुखर्जी साहब की अपनी अनोखी अदा थी. जॉनी वॉकर साहब तो गुरुदत्त के बहुत करीबी रहे. इनकी अगली पीढ़ी में मुख्य रूप से अपनी पहचान बनायी उत्त्पल दत्त, कादर खान, असरानी, परेश रावल, लष्मीकांत बर्डे और बोमन ईरानी ने. एक दौर ऐसा चला जिसमे लीड कलाकारों ने खुद ही कॉमेडी कर ली और जो सह कलाकार कॉमेडी के लिए फिल्में करते, उनके काम में कमी आने लगी जैसे किशोर कुमार,अमिताभ बच्चन, अमोल पालेकर. किशोर कुमार एक उम्दा कलाकार थे जो फिल्म से जुड़े हर पहलू को गहराई से समझते थे. एक बेहतरीन गायक के साथ वे एक बड़े कलाकार भी थे और उनका अभिनय ज़्यादातर लोगों को हँसाने के लिए ही होता था, वे मानते थे “लोगों को रुलाना बड़ा आसान है, लेकिन हँसाना बेहद मुश्किल.” उन्होंने पड़ोसन फिल्म में ” गुरु ” के किरदार को इतना बखूबी निभाया कि आज तक लोग उन्हें याद करते हैं लेकिन उस से भी पहले उनकी एक फिल्म आई ” हाफ टिकट “. एक छोटे बच्चे का किरदार किशोर कुमार साहब ने ऐसा निभाया की आज भी कलाकार उन्हें कॉमेडी में अपना गुरु मानते हैं. किशोर कुमार साहब के साथ ही एक ऐसे मशहूर कॉमेडियन हिन्दी सिनेमा मेँ आये, जिन्होंने फिल्म जगत में न सिर्फ अपनी अमिट छाप छोड़ी बल्कि कॉमेडी के बादशाह माने जाने लगे. उनका नाम था महमूद, जी हाँ! ये वही महमूद साहब हैं जिन्होंने ६० और ७० के दशक में हमेँ हँसाया तो सिर्फ और सिर्फ अपने अभिनय की काबीलियत पर. महमूद साहब शुरू से ही बड़े एक्सपेरिमेंटल रहे . महमूद साहब की कुछ बेहतरीन फिल्मों में शामिल हैं, 1965 की गुमनाम और भूत बंगला, 1966 में आई प्यार किये जा, और 1968 की यादगार फिल्म पड़ोसन को हम कैसे भूल सकते हैं. 70 के दशक की “मैं सुंदर हूँ, हमजोली, कुंवाराबाप और बॉम्बे टू गोवा” कुछ ऐसी फिल्में हैं, जिनकी वजह से लोगों ने उन्हें कॉमेडी का बादशाह माना. इसके बाद अभिनेता के तौर पर फिल्मों मेँ कॉमेडी करने वाला एक बड़ा नाम रहा अमिताभ बच्चन का. उनकी कुछ फिल्मों मेँ उन्होने बेहतरीन कॉमेडी की जिन मेँ याराना, अमर अकबर एंथोनी जैसी फिल्मों के नाम मुख्य तौर पर लिए जा सकते हैं काफी सालों तक ये दौर चला, इस समय कई कलाकारों ने हास्य में अपना योगदान दिया. जिनमें संजीव कुमार, “चुपके चुपके” में धर्मेन्द्र, हेमा मालिनी “सीता गीता” और “शोले”, राजेश खन्ना “आनंद” में, अनिल कपूर “किशन कन्हैया” में आदि इनमें से कुछ नाम हैं इस समय कुछ और बेहतरीन हास्य कलाकार भी रुपहले पर्दे पर आए, जिनमें देवेन वर्मा का नाम खास तौर पर लिया जा सकता है “अंगूर” जैसी फिल्म उन के कार्य का नमूना है आज कॉमेडी का स्तर इतना नीचे गिर गया है कि कॉमेडी के नाम पर सेक्स और द्विअर्थी बातों को परोसना ही सही समझा जा रहा है अब हिन्दी सिनेमा में हास्य कलाकार के लिए कोई भूमिका नहीं लिखी जाती है उन्हें कहानी में ठूँसा जाता है कई बार तो वे पर्दे पर आ कर अनावश्यक हरकतें करते और चले जाते हैं जरूरत है कि दर्शक आधुनिकता की आड़ में परोसे जा रहे इस अश्लील हास्य को सिरे से नकार दें जिससे स्वस्थ हास्य को फिर से हिन्दी सिनेमा के पर्दे पर जगह मिल सके और फिर से जीवित हो सके एक और जॉनी वॉकर.

नदीम परमार.

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