सूरत, सर्दी और घारी का अनूठा संयोग

सूरत, सर्दी और घारी का अनूठा संयोग है. इसी में एक नाम और जुड़ता है शाह जमनादास घारीवाला.
यूं तो सूरत में लोग घारी घर घर में बनाते हैं परंतु कुछ नाम शहर में घारी के पर्यायवाची बन चुके हैं. ये वो नाम हैं जो स्वाद और सेहत दोनों का संयोजन घारी प्रेमियों को परोसते हैं. इन्हीं में से एक प्रतिष्ठित होने के साथ साथ ऐतिहासिक नाम है शाह जमनादास घारीवाला का. इनके प्रतिष्ठान के आगे लगी घारी खरीदने वालें की लंबी लाइन इनके यहां के स्वाद की कहानी स्वयंमेव कह देती है. इनके नाम की प्रतिष्ठा सिर्फ इनके स्वाद और कारीगरी से ही नहीं, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से भी जुड़ी हुई है.हमारे इस बार के उड़ान के पृष्ठों का पंछी है शाह जमनादास घारीवाला प्रतिष्ठान.
यहां के मालिक बंधुओं में से एक मनोज हंसमुखलाल शाह घारीवाला से हमने उनकी उड़ान की गाथा जानी. मनोज बताते हैं इस दुकान की शुरूआत हमारे दादाजी स्व. श्री जमनादास चुन्नीलाल शाह घारीवाला ने स्वतंत्रता से लगभग पचास वर्ष पूर्व ९ जुलाई १९८८ में पकवान बेचने से की थी. जब भारत में गांधीजी का भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था उस समय जमनादास जी शहर के मिठाई व्यापारियों की एसोसिएशन के अध्यक्ष थे. इन सभी ने मिलकर इस आंदोलन में अपना सहयोग देने का निर्णय किया और इस आंदोलन के समर्थन में शहर भर के मिठाई के प्रतिष्ठानों को बंद रखने का निर्णय लिया. तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के काफी दबाव डालने के बाद भी जब इन्होंने अपने प्रतिष्ठान नहीं खेाले तब इन सभी को कारागृह में डाल दिया गया. उस समय जमनादास जी की आयु लगभग ८० वर्ष थी उनकी अवस्था का ख्याल करते हुए ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें आजाद करने का प्रस्ताव दिया गया जिसे उन्होंने यह कहकर ठुकरा दिया कि मैं अपने साथियों के साथ ही आजाद होना पसंद करूंगा अन्यथा नहीं. जिस दिन सभी व्यापारी कारागृह से बाहर आए, उस दिन चंदी पड़वा थी. आजादी की खुशी को सभी ने मिलजुलकर घारी खाकर मनाया. बस तभी से चांदी पड़वा, सूरत और घारी एक दूसरे से जुड़ गए.
पुरानी स्मृतियों को ताजा करते हुए मनोज बताते हैं शुरूआती समय में दुकान काफी छोटी थी जिसकी वजह से काम करने में काफी परेशानी होती थी. काम में कई अड़चनें भी आईं, उस समय अच्छे कारीगर भी नहीं मिलते थे. सबसे बड़ी समस्या मिठाईयों के रख रखाव की थी. कूलिंग की सुविधा न होने के कारण मिठाईयां जल्दी खराब हो जाती थीं. कई बार काफी मिठाईयां फेंकनी पड़ती थी जिससे काफी नुकसान होता था.
मनोज जी बताते हैं जमनादास जी की सभी नीतियों का हम आज भी पालन करते हैं. दादाजी कहते थे कुछ भी हो जाए घारी के स्वाद से कभी समझौता नहीं करना. तब भी घारी व सभी मिठाईयां हम लोग हाथों से बनाते थे. आज भी हम अपने हाथों से ही मिठाईयां बनाते हैं. तब और अब के अंतर पर वे बताते हैं पहले सिर्फ मिठाईयों का स्वाद देखा जाता था आज उसकी सजावट भी महत्वपूर्ण हो गई है. वे अपनी मिठाईयों को चांदी के वर्क और चॉकलेट की कोटिंग से सजाते हैं.
साथ ही आजकल स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग मिठाई खाना कम पसंद करते हैं. उनका ध्यान रखते हुए उनकी दुकान पर लो कैलोरी मिठाईयां, शुगर फ्री घारीी भी उपलब्ध है. वे घारी को स्वादिष्ट के साथ साथ सेहतमंद बनाए रखने के लिए उसमें सूखे मेवों का बहुतायत से प्रयोग करते हैं. घारी उनकी दुकान की विशिष्टता है. बादाम घारी, बादाम पिस्ता घारी, चॉकलेट घारी, इलायची घारी इनके प्रतिष्ठान की विशेषता है.
बातचीत समाप्त करके लौटते हुए उनकी दुकान पर सजी पचास से ज्यादा तरह की मिठाईयां, खूबसूरत स्वादिष्ठ महकदार मिठाईयां आंखों के आगे घूम रही थीं. सूरत के साथ उनके प्रतिष्ठान का स्वाद वर्षों से जुड़ा है लोग इस नाम के विश्वास पर मिठाईयां खाते और खिलाते हैं.
सूरत और ये स्वाद हमेशा जुड़ा रहे हमारी महक की इसी शुभकामना के साथ हमने उनसे विदा ली.

अविनाश मिश्रा

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