सांत्वना ओलम्पिक से …

सवा सौ करोड़ की जनसँख्या वाला भारत एक कांस्य और एक रजत स्वर्ण के मिलने भर से झूम उठे हैं, इसका क्या मतलब माना जाये कि हमें अपने देश से ऐसी ही उम्मीद थी या शायद ये पदक भी हमारी उम्मीदों से कहीं ज्यादा हैं छः सौ से ज्यादा पदक बाँटने के बाद भारत की झोली में आती है दो या फिर शायद तीन या चार पदकों की खनक और इसी पर देश राखी पर दिवाली मना बैठता है लगातार निराशाजनक प्रदर्शनों के बाद साक्षी और सिंधु के पदक देश के लिए सांत्वना पदकों की तरह हैं चमत्कार ही होगा जो भारत को एक, दो पदक और मिल जाएं.

प्रधानमंत्री से लेकर खेल मंत्री तक ने बधाइयों के दौर चालू कर रखे हैं सभी इन दो पदकों से चकाचौंध हैं लेकिन इस शोर में भारत को अपना आईना जरूर देखना चाहिए, खेल संघों पर बरसों से जमे पदाधिकारियों को इस असफलता के लिए अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए अपने पदों पर बने रहने का निर्णय करना चाहिए.

खेलों में घुसी राजनीति ने खेलों का पूरी तरह बंटाधार करके रख दिया है बेशर्मी इतनी की विश्व मंच पर इतनी शर्मनाक हार के बावजूद एक भी नेता या खेल पदाधिकारी ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली है और लेंगे ऐसी भी कोई उम्मीद नहीं है नई प्रतिभाओं को निखारने की बात समय समय पर होती रहती है लेकिन ये प्रयास भी सड़ी, स्वार्थी राजनीति का शिकार हो जाता है.

जरूरत है कि खेल संघों से राजनीती को पूरी तरह दूर रखा जाये , लंबे समय से जमे असफल पदाधिकारियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाये , खेल संघों में नेताओं का कोई काम नहीं है लगे हाथ उनकी भी छुट्टी की जाये पुराने अनुभवी खिलाडियों को संघों से जोड़ा जाये पैसा सही जगह पर खर्च किया जाये पूरी तैयारी से मैदान में उतरा जाये नहीं तो ओलंपिक को भारत भूल जाये.



स्नेह के साथ,किरन संजीव

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