सपनों की बात है

सपनों की बात है


खुश नसीब हूँ मैं, सपने आते हैं मुझे आज भी.
यही मेरे ज़िंदा होने की पहचान है,
मुर्दे क्या खाक सपने देखेंगे,
ऊँचे पहाड़ हैं, नीली नदियाँ हैं,
हरे खेत हैं फूलों के मैदान हैं,
मेरे पास सपनों में.
चुनौती हैं सपने, कुछ पाने की,
पहचान बनाने की,
जीवन की गति हैं सपने,
नहीं आती हैं सपनों भरी नींदें,
उन्हें जो थम गए हैं,
ठहरे पानी में लहरें नहीं बनतीं, भंवर बनते हैं,
जो भ्रम देते हैं आगे बढ़ने का,
घूमते हैं चक्र में,
उसी चक्र में उलझता है, उनका जीवन.
नदी नहीं बन पाते,
किसी खेत को, किसी मैदान को,
पानी नहीं पिला पाते.
नहीं ठहरते हैं सपने उनके पास,
जो हैं आलसी, निकम्मे और नकारा,
जो आते हैं सपनों को छूने,
फिर दौड़ नहीं पाते हैं उनके साथ.
यूँ ही नहीं मिलते हैं सपने,
कीमत होती है उनकी,
जिन्हें साकार करने होते हैं सपने,
खोते हैं अपना आराम,
भूल जाते हैं, नाच गाने, मौज मज़े,
भरने हैं उन्हें सपनों में रंग,
तो जिंदगी रखते हैं बदरंग,
सजना, संवरना, स्वाद, सुगंध,
याद नहीं रहते,
रहते हैं याद सिर्फ सपने.
अपने सपने आपको ही पूरे करने हैं,
नहीं आएगा कोई और उन्हें पूरा करने,
ये खीर पूड़ी नहीं है,
जिसे कोई दान में दे जायगा.
रातों को जगना होगा,
जलती सड़क पर,
घिसी चप्पलों में भी चलना होगा,
सिर पर सूरज हो, बदन जलता हो,
पसीना बहता हो, स्नहे की छांव न हो फिर भी जलना होगा,
चलना होगा, व्यंग के शब्द होंगे, उपहास की आवाजें होंगी ,
आरोप होंगे, अवहेलना होगी,
फिर भी चलना होगा, सपने तेरे पूरे होंगे,
खुश नसीब हूँ मैं, सपने आते हैं मुझे आज भी
मैं ज़िंदा हूं यह मुश्तहर कीजिये…’

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