सद् कर्म से सद् भाग्य


सुशीला बहुत गरीब थी वह पूरी मेहनत और ईमानदारी से अपना कार्य करती रहती बूढ़े आदमी की साहयता करने की वजह से उसका जीवन ही बदल गया—डॉ. डी.एन. गुप्ता

एक गांव था वहाँ एक धनिक सेठ रहता था वह बड़ा ही कंजूस प्रवर्ती का व्यक्ति था उसकी पत्नी भी उसी की तरह की थी उन दोनों में किसी के प्रति दया और करुणा के भाव भी नहीं थे .

उनकी हवेली बहुत बड़ी थी घर में सदैव धन धान्य रहता था. उनके घर पर कई नौकर कार्य करते थे वे सभी उसी गांव के गरीब लोग थे जिन्हें सिर्फ थोड़े से अनाज के बदले कार्य पर रखा था. उनके घर में सुशीला नाम की एक स्त्री भी कार्य करती थी. जिसके दो छोटे बच्चे थे और उसकी झोंपड़ी हवेली के पीछे गांव की पगडंडी के पास बनी हुई थी. वह बहुत गरीब थी प्रात: काल से सांय काल तक वह सेठ के घर कार्य करती बदले में सेठानी उसे एक कटोरी अनाज देती, कभी सिर्फ चावल तो कभी आटा, जिससे वह रोटी पकाकर अपने बच्चों को खिला देती भोजन इतना कम होता था की वह उसके बच्चों का पेट नहीं भर पाता था, उनके पास पहनने को कपड़े और सोने को बिछावन भी नहीं था. झोंपड़ी जगह जगह से टूटी हुई थी लेकिन सुशीला इसके लिए ईश्वर से प्रार्थना के अलावा कुछ नहीं कर पाती थी वह पूरी मेहनत और ईमानदारी से अपना कार्य करती रहती .

एक दिन आसमान में काले बादल घिर आए. देखते ही देखते झमाझम बारिश होने लगी, बिजली कड़कने लगी. सुशीला अपना हवेली का कार्य समाप्त कर अपने घर चली गई. तभी एक बूढ़े फटेहाल गरीब से नज़र आने वाले व्यक्ति ने हवेली का दरवाजा खटखटाया . सेठानी ने दरवाजा खोला बूढ़ा आदमी बारिश में पूरी तरह भीग चुका था वह ठंड से काँप भी रहा था. सेठानी उसे देखते ही ज़ोर से बोली क्या काम है ? कौन हो तुम ? वह बूढ़ा आदमी हाथ जोड़ते हुए सेठानी से बोला, पथिक हूँ तीर्थ यात्रा पर जा रहा हूँ, बारिश की वजह से भीग चुका हूँ, रास्ते में रुकने की जगह नहीं मिल रही, बाहर तेज़ बारिश है. कृपया रात भर रुकने के लिए स्थान दे दें, सुबह होते ही चला जाऊंगा. ये सुनते ही सेठानी जोर से चिल्लाई ये धर्मशाला नहीं है जो आप यहाँ रुकने आ गए हैं कहीं और जाइये. इस अँधेरी और बारिश की रात में कहाँ जाऊंगा ? कृपया रात भर के लिए रुकने दें आप की बड़ी कृपा होगी , बूढ़ा विनती करते हुए बोला. नहीं , मुझे इस से कोई मतलब नहीं है आप कहाँ जायेंगे और कहाँ रुकेंगे ? लेकिन यहाँ ऐसे किसी व्यक्ति के लिए जगह नहीं है कहकर सेठानी ने दरवाजे को जोर से बंद कर दिया.

बूढ़ा व्यक्ति आगे बढ़ गया उसे सुशीला की झोंपड़ी नज़र आई उसने उसके कमजोर से दरवाजे को खटखटाया, कौन है ? एक यात्री ! बूढ़े ने कहा. तुरंत सुशीला ने दरवाजा खोला. बूढ़े ने सुशीला को अपनी तीर्थ यात्रा और रुकने के लिए जगह नहीं मिलने की बात बताते हुए रात भर रुकने के लिए जगह देने की प्रार्थना की.

सुशीला ने दरवाजे से एक तरफ हटते हुए उसे अंदर आने दिया, सुशीला ने उसे अंदर आने को कहकर जलते हुए चूल्हे के पास बैठने के लिए कहा जिससे उसके वस्त्र सूख जाएँ और उसकी ठण्ड भी दूर हो. बूढ़ा चूल्हे के पास बैठ गया उसने देखा चूल्हे पर एक हांड़ी में थोड़े चावल उबल रहे थे, सुशीला ने उनमें नमक डाल कर थोड़ा सा बूढ़े को दिया और थोड़ा सा अपने बच्चों को. बूढ़े ने पूछा, आप क्या खाएंगी ? मैंने दिन में ज्यादा खाना खा लिया था, अभी भूख नहीं है सुशीला ने बूढ़े आदमी से झूठ बोलते हुए कहा. सब के खाने के बाद सुशीला ने एक फटी गूदड़ी सूखे स्थान पर बिछाकर बूढ़े को सोने के लिए कहा बूढ़ा वहाँ सो गया . थोड़ी सी जगह में दोनों बच्चे भी सो गए झोंपड़ी में रात भर गर्माहट बनाए रखने के लिए सुशीला ने चूल्हा जलने दिया और वो झोंपड़ी के पूरी गीली हो जाने की वजह से चूल्हे के पास बैठे बैठे ही सो गयी.

बूढ़ा सुबह जल्दी उठकर जाने लगा जाते वक़्त उसने सुशीला को एक जादुई तूलिका और एक घड़ा देते हुए कहा इस पर कुछ चित्रकारी करो और बाजार में बेचो. सुशीला ने वैसा ही किया, उसने घड़े पर सुन्दर फूल और तितलियाँ बनायीं .जब वह उसे बाजार में बेचने गयी तो कई लोगों ने उसे खरीदना चाहा सुशीला ने उस घड़े को अच्छी कीमत में बेचा और पैसों से बच्चों के लिए खाने का सामान ख़रीदा और नए घड़े बनाने का सामान भी लिया.

अब उसने सेठानी के घर काम करना छोड़ दिया और उस जादुई तूलिका से खूबसूरत मिटटी के बर्तनों को बनाकर बेचने लगी जल्दी ही वह परिवार एक संपन्न परिवार बन गया. सुशीला अब भी सभी लोगों की मदद करती. उसने अपने बच्चों को भी यही शिक्षा दी. दया और करुणा यही उसके जीवन का मन्त्र था.

उधर बूढ़े व्यक्ति के जाने के बाद सेठानी के घर से सारा धन गायब हो गया. हवेली की जगह एक खंडहर रह गया, वे गरीब बन गए उन्हें पता लग गया था कि वह बूढ़ा सद् कर्म से बनने वाला सद् भाग्य था

डॉ. डी.एन. गुप्ता

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