संथारा, सल्लेखना : प्रतिबंध कितना उचित?

३१ अगस्त २०१५ की दोपहर को सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के साथ ही जैन समाज में खुशी की लहर दौड़ गई और उन्होंने चैन की सांस ली. सर्वोच्च न्यायलय ने राजस्थान उच्च न्यायालय के उस फैसले पर रोक लगा दी थी जिसमें सल्लेखना को आत्महत्या बताते हुए अवैध करार दिया गया था. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय द्वारा उच्च न्यायालय के फैसले पर चार वर्षों तक की रोक रह सकती है.

दस अगस्त २०१५ को दिए अपने एक निणर्य में राजस्थान उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता निखिल सोनी की याचिका पर निर्णय सुनाते हुए जैन धर्म की संथारा और संल्लेखना की पद्घति को आत्महत्या की परिभाषा में सम्मिलित कर दिया. न्यायालय ने इसे जीने के मूल अधिकार के तहत मानने से इंकार कर दिया. न्यायालय ने कहा सरकार व प्रशासन संथारा व संल्लेखना प्रथा को खत्म करे. ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा ३०६ व ३०९ के तहत आत्महत्या व उकसाने के मामलों में कार्यवाही करे. इस प्रकार की शिकायत आने पर अपराधिक मामला दर्ज किया जाए.न्यायालय ने कहा इसे धार्मिक आस्था बताने वाले पक्ष में धर्मग्रंथ, लेख व मुनियों की मान्यता का दस्तावेज पेश नहीं किया गया साथ ही कहा मोक्ष या अमरत्व के लिए ये आवश्यक नहीं है. न्यायालय ने कहा जैन धर्म के शास्त्रों में, अभ्यास अथवा प्रचवनों में कहीं भी संथारा या संल्लेखना का उल्लेख नहीं है न ही यह पाया गया कि मोक्ष प्राप्ति के लिए संथारा एक अनिवार्यता है न ही किसी ऋषि मुनि द्वारा लिखा गया है कि संथारे के अभाव में मोक्ष प्राप्ति नहीं हो सकती है, न ही इसके प्रमाण सामने आए हैं कि जैन धर्म के अनुयायियों में इस सिद्घांत का प्रचुरता में पालन किया जाता है. संथारा को स्वैच्छिक कृत्य कहकर आत्महत्या न मानना एक बात है तथा इसे संविधान की धारा २५ और २६ में स्वीकृत करना दूसरी बात है, न ही धारा २१ के अंतर्गत जीवन समाप्त करने का अधिकार दिया जा सकता है.

धार्मिक स्वतंत्रता अधिकार में भी स्वयं मृत्यु मार्ग के चयन की स्वीकृति नहीं दी जा सकती है अत्यंत विकट परिस्थितियों में भी नहीं. अत: सरकार इस परंपरा को बंद कराए तथा धारा ३०९ के अंतर्गत आत्महत्या का दर्जा दिया जाए.

इसी संदर्भ में संथारा का दूसरा पहलू इसका अर्थ अर्थात बिछौना. यह श्वेतांबर परंपरा में प्रचलित है जबकि दिगम्बर परंपरा में इसे सल्लेखना कहते हैं. सल्लेखना का अर्थ है कृश कर देना. क्रोध, मान, माया, लोभ जोकि मोक्ष मार्ग के मुख्य बाधक हैं को कृश करना. जब तक भौतिक शरीर धर्माचरण में सहायक है उसका पोषण किया जाता है. याचिकाकर्ता निखिल सोनी का मत कि सती प्रथा और सल्लेखना समान हैं. इस संदर्भ में पूरी तरह अनुचित है. सल्लेखना असमर्थ शरीर का अंत करती है जबकि सती प्रथा स्वस्थ शरीर का अंत करती है. भारतीय दर्शन के अनुसार जीवन खाना खाने के लिए नहीं वरन मोक्ष प्राप्ति के लिए है. जैन धर्म के प्राचीनतम ग्रंथ आयारो जिसे तीर्थंकर महावीर की वाणी माना जाता है का अनुवाद आचारांग के नाम से उपलब्ध है. इसमें संथारा और सल्लेखना को मृत्यु और अहिंसा का दर्जा दिया गया है.

संथारा क्या है :
जैन समाज की वह धार्मिक प्रथा है जिसमें व्यक्ति मृत्यु होने तक भोजन और जल का त्याग कर देता है. जैन मतावलंबीयों के अनुसार यह मोक्ष प्राप्ति का जरिया है. एक व्यक्ति संथारा तब लेता है जब उसे लगता है कि उसने अपने जीवन का उद्देश्य प्राप्त कर लिया है. इस प्रथा को सामान्यत: वृद्घ लोग ही अपनाते हैं. न्यायालय के निर्णय के विरोध में जैन धर्म के चारों संप्रदायों श्वेतांबर, मूर्तिपूजक, श्वेतांबर स्थानकवासी, दिंगबर एवं तेरापंथ समाज के लोगों ने देश भर में मूक रैली निकाली. इस रैली में देश भर में लाखों जैन धर्मावलंबियों ने हिस्सा लिया और शांतिपूर्ण रैली द्वारा अपना विरोध प्रकट किया. सूरत में भी इस रैली में हजारों लोग शामिल हुए. क्योंकि निर्णय एक धर्म और उसकी मान्यताओं से संबंधित है. इसका ध्यान रखते हुए हमने इसे अपने शीर्ष लेख के तौर पर चुना और विभिन्न क्षेत्रों के लोगों, धर्मगुरूओं से इस पर उनके विचार जाने :

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