शरद जोशी : व्यंग्यकार

 

शरद जोशी : व्यंग्यकार

परले दर्जे का हठी,  अड़ियल समाज अपनी भौतिक लिप्सा और व्यक्तिगत स्वार्थों में इतना डूब चुका है कि बेहतरी और सुधारवादी कोई आवाज उसे सुनाई ही नहीं देती है तब जरूरत पड़ती है एक ऐसे शिक्षक की , जो कान के नीचे एक झन्नाटेदार रसीद करे और उसे पूरी तरह खोल दे और उससे कान क्या , आँखें भी खुल जाएँ लेकिन ऐसी क्षमता सिर्फ व्यंग्यकार में देखी जा सकती है. आत्मा से संवेदना , जीवन से मूल्य, समाज से सुधारक  व राष्ट्र से नायक इस तरह लापता हो रहे हैं लगता है देश से उसका चरित्र ही लापतागंज हो गया है खो चुके ऐसे लापता चरित्र को ढूढ़ने का कार्य प्रख्यात व्यंग्यकार शरद जोशी की कलम ही करती थी.

उनका साहित्य व्यक्तिगत स्वार्थों के गाल पर जमाया गया वह तमाचा है जो बेअसर हो ही नहीं सकता है. शरद यह बात बेहतर समझते थे इसलिए उनकी रचना जहां गुदगुदाती थी वहीं प्रहार भी करती थी वो भी कुछ ऐसे की बात करते करते अचानक उलटे हाथ से अप्रत्याशित कड़क थप्पड़ गाल पर पड़ा हो ! उनके व्यंग्य जीवन के रोज़मर्रा से लेकर राजनीति तक को छूते हैं उनकी दृष्टि गहरी थी, जिससे वे जीवन के उन पहलुओं को भी देख और छू पाते थे जिन्हें सामान्यतया लोग अनदेखा करके छोड़ देते हैं. जिन घटनाओं , स्थितियों की सामान्य व्यक्ति उपेक्षा कर देता है वे उन्हें विषय बनाकर उनके पीछे छिपे सत्य को नंगा करके समक्ष ला कर खड़ा कर देते थे  .

रोज़मर्रा की सामान्य और निर्जीव वस्तुंए भी उनके लेखन में सजीव बन जाती थीं. साबुन, आम, सुराही, लालटेन जैसी वस्तुओं को भी उन्होनें अपने व्यंग्य नश्तर से सजीव कर दिया है. अपने को अदना कहने वाले शरद सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे और बड़े हुए थे.

एक बार उन्होनें कहा था ” दरअसल मेरी पंद्रह बीस रचनाएं प्रकाशित होने के बाद किसी ने बताया की ये व्यंग्य हैं , माफ़ करें मैं व्यंग लिखता हूँ व्यंग्य नहीं, व्यंग्य बोलने में ही कठिन लगता है. मैं अपनी ओर से कहानियां और निबंध लिखता रहा हूँ ख़ैर, जब बात फैलने लगी है तो मैंने स्वीकार कर लिया है कि मैं व्यंग्यकार ही सही,  मेरी ओर से आग्रह कुछ भी नहीं, आप मुझे कुछ भी न मानें तो भी चलेगा” . जिस देश में गरीबी, भुखमरी,  अकाल और रोज़ का जीवन गुजारना ही समस्या हो वहाँ खालिस  मनोरंजन के लिए लिखना शरद को कभी भी नहीं रुचा और न ही समझ आया .

मध्य प्रदेश के उज्जैन में जन्मे शरद ने निबंध, नाटकों, कहानियों के साथ साथ फिल्मों और टेलीविज़न धारावाहिकों के लिए भी लिखा उन्होनें छोटी सी बात, गोधूलि,  उत्सव, दिल है की मानता नहीं और उड़ान जैसी फिल्मों के लिए संवाद और पटकथा लिखी, साथ ही मशहूर टेलीविज़न धारावाहिक ये जो है जिंदगी ,  वाह जनाब !  और लापतागंज भी उन्हीं की लेखनी और सोच से निकले हुए हैं. गज़ब का सेंस ऑफ़ हूयमर था शरद जी में.

जब उन्हें श्रद्धांजलि देने की बात आती है तो एक मंझे हुए व्यंग्यकार की रचनाएं पढ़ने और उन्हें समझने से ज्यादा बेहतर श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है ? 5 सितंबर, उनकी पुण्यतिथि पर शरद जोशी जी, को शत शत नमन .

 

    डॉ. किरन संजीव  

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