विवाह : वैभव प्रदर्शन नहीं

भारतीय संस्कृति में विवाह जीवन के सबसे बड़े उत्सव के तौर पर गिना जाता है, वैदिक काल में जहां ये परंपरा नए गृहस्थि और उससे होने वाली नई वंश बेल के तौर पर देखी जाता थी और इसमें पवित्रता एवं मंत्रों का महत्व होता था वहीं बदलते स्वरूप में आज ये वैभव प्रदर्शन और परंपराओं की लीक पीटने का नाम रह गया है. वर्तमान में विवाह बड़े उत्सव की तरह धूमधाम से किया जाता है कितने ही शाही विवाहों की लकदक और उनमें किए गए खर्चों के बारे में अक्सर समाचारों से जानने को मिलता रहता है. लेकिन इस प्रकार के विवाह संपन्न, शाही लोगों द्वारा किए जाते हैं जिन्हें न तो किसी से उधार लेना पड़ता है न ही कर्जा, लेकिन इस प्रकार के दिखावे का असर मध्यम वर्ग पर पड़ता है. जो अपना पूरा जीवन उन सपनों को पूरा करने की दौड़ में लगा देता है जो उसकी क्षमता में कभी आते ही नहीं हैं. वह इसमें न केवल अपनी जमा पूंजी खर्च कर देता है वरन कई बार तो वह कर्जदार भी बन जाता है.

इससे भी अधिक मुश्किल में है वह वर्ग जो रईसी का दिखावा निजी जीवन में करता ही रहता है. यह है उच्च मध्यम वर्ग. मित्तल साहब की बेटी की शादी में विदेशी फलों का स्टॉल था. चाट के 20 स्टॉल थे खाने के 40 तो बंसल साहब कैसे पीछे रहते. यह दिखावे की दौड़ खाने से लेकर, साज सज्जा, मंडप आदि सभी जगह नजर आती है.

सामान्य तौर पर व्यक्ति 400 से 500 ग्राम के मध्य भोजन करता है ज्यादा वैरायटियां होने पर चखने के चक्कर में भेाजन की बरबादी ही होती है इस सभी में फायदा होता है कैटरर का.

तब और अब

आज से 40 वर्ष पूर्व बरात आती थी तो कई दिन रूकती थी उसमें भोजन में एक सूखी और एक गीली सब्जी जोकि मौसमी हुआ करती थीं साथ में बूंदी का रायता, पूरी, कचौरी और मिठाई के तौर पर लडडू या बालूशाही न चाट, न सूप, न सलाद, न ढेर सब्जियां न मिठाईयां. सब कुछ बजट में हो जाता था साथ ही लडक़ी का परिवार ही नहीं मोहल्ले भर के लोग बारातियों की खातिरदारी में लगे रहते थे. न केटरर न स्टॉल न वेटर.

घर परिवार और मोहल्ले के युवा ही परसदारी संभालते थे. घर की महिलाएं या एक हलवाई रखकर सभी मिलजुलकर भोजन बनाते थे. अब इसमें काफी फर्क आ चुका है. विवाह में बराती हो या घराती कोई भी काम नहीं करना चाहता है. सभी सजधज कर उसको एन्जॉय करना चाहते हैं. इसलिए केटरर अनिवार्य हो गया है. जो कि बेहद खर्चीला होता है.

पहले बराती हों या घराती, घर में या आस पड़ोस में ठहरा दिए जाते थे. अधिकतम किसी विद्यालय या सामुदायिक केन्द्र या मंदिर में मंडप लगवाकर ठहरने, रहने का इंतजाम कर दिया जाता था. आज ये होटलों में चला गया है साथ ही लोगों को अलग अलग कमरे चाहिए अपने अपने परिवार के लिए. ये एक अनावश्यक खर्च शादी के खर्चे में जुड़ गया है जिसे बचाया जा सकता है. किसी एक या दो हाल में सभी के एक साथ रहने का इंतजाम करके. इसमें सभी सही मायने में साथ रहकर हंसेंगे बोलेंगे, विवाह का आनंद उठाएंगे और फालतू का खर्च बचेगा सो अलग.

इसी प्रकार पहले गीत संगीत घर मोहल्ले, परिवार की महिलाओं के बीच ढोलक की थाप पर होता था. सभी तरह के गीतों को उसमें स्थान मिलता था इससे घर में रौनक हो जाती थी.

ये विवाह से कई दिन पूर्व शुरू हो जाता था. इससे विवाह का घर रोज ही अपनों की मीठी आवाजों से गुंजायमान रहता था. साथ ही नए नए गीतों को गाने का गायकों में उत्साह भी बना रहता था. आज इसे लेडीज संगीत में बदल दिया गया है जिसमें ऑरकेस्ट्रा की धुन पर फिल्मी संगीत और डीजे की धुन पर लडक़े लड़कियां थिरकते हैं न घर की सभी महिलाएं इसमें शामिल होती हैं न ही वे गाती हैं साथ ही गीत संगीत का ये कार्यक्रम एक दिन में ही सिमट कर रह गया है और अतिरिक्त खर्चे का कारण भी बन चुका है.

एक गरीब कन्या का विवाह हो जाए इतना खर्च तो सिर्फ लेडीज संगीत की तैयारी कराने वाला कोरियोग्राफर और एंकर ही ले लेता है. यहाँ सहज ही ये सवाल उठते हैं क्या विवाह का खर्चा लैंगिक असमानता का जिम्मेदार नहीं है? क्या केवल दहेज ही सामाजिक लैंगिक भेदभाव का मुख्य कारण है? ये वैभव प्रदर्शन नहीं? क्या ये प्रदर्शन दहेज की ही एक और शाखा बनकर नहीं उभर रहा है.

इसमें दो मत नहीं है कि कलात्मकता अच्छी लगती है लेकिन अब ये भी व्यापारिक मानसिकता का प्रतीक बनती जा रही है. ढेरों साज सजावट को एक क्षण में तोडक़र कोने में ढेर लगा दिया जाता है. तब ये लगता है कि यदि इतने मूल्य की कोई उपयोगी वस्तु दी जाती या बचाया जाता तो उपयोगी होता. अब तो वरमाला के सैट फिल्मी सैटों की तरह भव्य और आधुनिक साज सज्जा से भरपूर बनाए जाने लगे हैं. हाल ही एक विवाह में जाने का अवसर मिला वहां वरमाला के लिए दूल्हा दुल्हन ऊपर से फूलनुमा लिफ्ट से उतरे और उनके खड़े होने के स्टेज जो कि अलग अलग थे संगीत की धुन पर घुमते हुए नजदीक आए, तब वर वधू ने एक दूसरे को वरमाला पहनाई. ये अपव्यय नहीं तो क्या है?

ये रस्म कम मनोरंजन का तमाशा ज्यादा लगती हैं. बिजली की बेहिसाब जगमगाहट, विशाल खुले और बंद पंडाल, टनों फूलों की सजावट, डिजाइनर थीम पर सजे, बने शामियाने अनावश्यक दिखावा ही तो है कितना अच्छा हो इस रूपए को बचा कर वर वधू को उनके भविष्य की आर्थिक मजबूती में सहायता प्रदान करने में खर्च किया जाए. यदि इन अनावश्यक खर्चों को बचाकर वर वधू के भविष्य के लिए संचित निधि के तौर पर उन्हें दिया जाए तो ये सही मायनों में विवाहोत्सव होगा सिर्फ वैभव प्रदर्शन नहीं.


संपादक : मंजु मित्तल

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