लिव इन रिलेशनशिप

भारतीय संस्कृति में विवाह केा एक संस्कार का दर्जा दिया गया है. संस्कार अर्थात जीवन मूल्य, जीवन जीने का तरीका.


लिव इन रिलेशनशिप

किसी भी देश और समाज की संस्कृति का अभिन्न अंग है: विवाह. बदलते परिवेश और आधुनिकता में जीवन का प्रत्येक मूल्य बदल रहा है. जीवन जीने का तरीका भी बदल रहा है. आज विवाह शब्द अपने अस्तित्व के खतरनाक मोड़ पर आ खड़ा हुआ है. जीवन में बढ़ती भौतिकता ने सामाजिक, आध्यात्मिक मूल्यों पर हमला बोल दिया है. विवाह , भारतीय परंपरा का अटूट हिस्सा है. विवाह केवल दो व्यक्तियों के शारीरिक मिलन की स्वीकृति नहीं है वरन समाज की मूल इकाई परिवार के निर्माण का पहला कदम है.

यहां विवाह दैहिक स्तर से आगे मानिसक और आध्यात्मिक विकास और शांति का मार्ग है. विवाह के द्वारा समाज मनुष्य को जानवर के दर्जे से ऊपर उठाकर मनुष्यत्व की ओर ले जाता है. जहां शारीरिक संबंध एक बंधन में बंधे होते हैं. इससे आगे की सोच भी शामिल है इस विवाह के नाम के संस्कार में. विवाह के द्वारा दो व्यक्ति नहीं वरन दो परिवार आपस में बंधते हैं. उनके सांस्कृतिक एवं वैचारिक मूल्यों का आपस में आदान प्रदान होता है. विवाह के द्वारा जन्मी नई पीढ़ी को पूर्ण जीवन सभी तरह का संरक्षण प्राप्त होता है जो कि आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप में दिया जाता है. बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा, स्वाबलंबन सभी जिम्मेदारियों को पूरा परिवार मिलजुलकर निभाता है. विवाह जीवन को न केवल एक दिशा और उद़देश्य प्रदान करता है वरन सुरक्षा और निश्चिंतता भी प्रदान करता है.

परंतु जैसे कि जीवनï के हर क्षेत्र में बदलाव नजर आ रहा है इससे विवाह जैसा संस्कार भी अछूता नहीं रहा है. पाश्चात्य सभ्यता में विवाह की मैरिज एन इंस्टीटयूट वाक्य से पहचान की जाती है. यहां विचारणीय तथ्य है कि जिस संस्कृति में विवाह को एक संस्था की तरह मानाजाता है वहां विवाह निज होकर रह जाएगा जैसा कि एक संस्था में होता है उसमें काम करने के कुछ नियम और शर्तें होती हैं उनके पूरे न होने पर संस्था और उससे जुड़े व्यक्ति एक दूसरे का साथ छोड़ सकते हैं. यही आधार है आज पनप रही सम्बंधों की नई परिभाषा लिव इन रिलेशनशिप का.


इस सम्बंध में रहने वाले युवा अपनी जरूरतों जों कि पूर्ण रूप से भौतिक और दैहिक होती है को पूरा करने के लिए साथ में रहते हैं. यदि ये जरूरतें आवास समस्या या आर्थिक समस्या तक हों तो इनसे सामाजिक मूल्यों की नींव पर कोई असर नहीं होगा वरन ये सही मायने में आधुनिकता की पहचान होगी परंतु जब ये रिलेशनशिप कार्य से आगे शारीरिक सम्बंधों तक पहुंच जाती है तब इसके ऊपर कई सवाल उठते हैं. हालांकि उच्चतम न्यायालय द्वारा इन सम्बंधों को स्वीकृति प्रदान की गई है. परंतु सामाजिक स्तर पर इन्हें अस्वीकृत ही किया गया है. इसके कई कारण हैं जिसमें सबसे बड़ा कारण है इन सम्बंधों से उत्पन्न संतान का, उसके पालन पोषण और भावनात्मक सुरक्षा का. न्यायालय के आदेशानुसार बच्चे के पालन पोषण की जिम्मेदारी उसके पिता को उठानी होगी परंतु यहां विचारणीय है कि जिस रिश्ते को व्यक्ति बंधन मानता है, उसे सिर्फ जरूरत पूरा करने का माध्यम मानता है उससे उत्पन्न संतान की आर्थिक जिम्मेदारी वह ईमानदारी से निभाएगा? और इससे भी ज्यादा क्या वह उसे भावनात्मक और सामाजिक सुरक्षा दे पाएगा?

क्या यह सम्बंध समाज और उसके सम्बंधों को संपूर्ण जीवन की आयु दे पाएगा. साथ ही उस लडक़ी को जो इस रिश्ते में बंधी थी समाज स्वीकार कर पाएगा. उसका भविष्य क्या होगा? क्या बच्चों के पालन पोषण की जिम्मेदारी उसे अकेले ही उठानी होगी? ऐसे ढेरों सवालों पर समाज के विभिन्न वर्गों के विशिष्ट व्यक्तित्व से हमारी महक ने की चर्चा…..

कोमल दीपक मिस्त्री


वेब डेवलपर युवा कोमल दीपक मिस्त्री के अनुसार इस रिलेशनशिप में कुछ भी गलत नहीं है. इसïमें रहने से आपसी समझ बढ़ती है और जानने समझने में मदद मिलती है कि हम पूरी जिंदगी एक दूसरे के साथ रह पाएंगे या नहीं और अब तो देश के न्यायालय ने भी इसे जायज ठहराया है. समाज को अपनी सोच में परिवर्तन करना चाहिए.


आरिफ अंसा


पेशे से वकील आरिफ अंसारी जो कि सेशन कोर्ट में वकालत करते हैं का इस संदर्भ में कहना है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस रिलेशनशिप को सही ठहराया है और मैं देश का नागरिक होने के नाते न्यायालय का पूरा सम्मान करता हूं, परंतु निजी तौर पर मैं इस प्रकार के रिश्तों के विरोध् में हूं. विविधता में एकता वाले इस देश की संस्कृति प्रेम, सम्मान और मानवता पर टिकी हुई है और ये रिलेशनशिप प्रेम की तो बात करती है परंतु सिर्फ शारीरिक और कुछ समय के लिए, प्रेम की इसमें शाश्वतता और सम्मान दूर- दूर तक नहीं है. ऐसे रिश्तों से समाज की नींव कमजोर होती है.


मशहूर उद्योगपति और अग्रवाल विद्या विहार ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रमोद

प्रमोद चौधरी 

चौधरी के अनुसार विवाह पवित्र सामाजिक बंधन है जो पूरी तरह से परिवार और समाज के हित के लिए बनाया गया है. लिव इन रिलेशनशिप से समाज आगे नहीं वरन पीछे की तरफ जाएगा. सभ्यता व संस्कार तो पीछे ही रह जाएंगे. जब पुरानी व्यवस्था यानि विवाह संस्कार इतना बेहतर है तो कुछ नया करने की चाहत में ऐसा नया क्यूं किया जाए जो हमें आदिम व्यवस्था की ओर ले जाए.



सुनील जैन



पारिवारिक न्यायालय के कन्सीलीडर सुनील जैन कहते हैं हमारे समाज की संरचना कुछ नियमों के अंतर्गत की गई है जिसमें विवाह का अपना एक महत्वपूर्ण भाग है.मेरे अनुसार लिव इन रिलेशनशिप बिल्कुल भी उचित नहीं हैं.ये समाज के लिए अत्यंत हानिकारक है. इस रिश्ते से होने वाले बच्चे की जिम्मेदारी किसकी होगी? और पितृत्व का निश्चय कौन करेगा? और समाज, मानव समाज न होकर पाशविक समाज हो जाएगा.ये एक ऐसा बेलगाम रिश्ता है जिसमें सिर्फ तबाही है फिर परिणाम बेहतर कहां से आएंगे?

स्नेहा प्रसाद

इस संदर्भ में एक और युवा स्नेहा प्रसाद जोकि पेशे से इंजीनियर हैं युवा और आधुनिक होने के बाद भी इस प्रकार की रिलेशनशिप से पूरी तरह असहमति दर्शाती हैं. वे कहती हैं हमारी संस्कृति की बुनावट कुछ इस प्रकार की है जिसमें विवाह में दो व्यक्तियों नहीं बल्कि पूरे परिवार के विचारों को देखा जाता है. इस प्रकार की रिलेशनशिप समाज पर न केवल बुरा प्रभाव डालेगी वरन आने वाली पीढ़ी भावनात्मक सुरक्षा के अभाव में बड़ी होगी जिससें कि वह गलत मार्ग पर भटक सकती है.


        पदमा तुलस्यान

सूरत अग्रवाल महिला मैत्री संघ की संरक्षक पदमा तुलस्यान इस बारे में बात करने पर कहती हैं किसी भी रिश्ते की मजबूती उसके कमिटमेंट से होती है यदि इस रिश्ते में भी कमिटमेंट हो तो इसमें भी कुछ गलत नहीं है. वैसे भी परिवर्तन समय की मांग है. न्यायालय ने भी इस रिश्ते को मान्यता तो दे दी है फिर समाज को भी इसे अपनाना चाहिए.



लिव इन रिलेशनशिप क्या है?

विवाह के लिए सक्षम जोड़ा बिना विवाह के साथ रहे, वे वयस्क हों, मानसिक रूप से स्वस्थ हों. विवाहित या तलाकशुदा न हों.

सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा…

वर्ष २००८ में सर्वोच्च न्यायालय ने लिव इन से जन्म लेने वाले बच्चों को, कानूनी शादी से जन्म लेने वाले बच्चों जैसे अधिकार दिए. जैसे कि गुजारा भत्ता, पिता की संपत्ति में अधिकार. इस फैसले से औरतों को जीवन निर्वाह भत्ता पाने का हक, सुरक्षा और घर में निवास का अधिकार मिला.

कानूनन नुकसान…

क्रिमिनल प्रोसिजर कोड की धारा १२३ के तहत विवाहिता को जो आजीविका के अधिकार मिलते हैं वैसे लिव इन में नहीं मिलते हैं. क्योंकि लिव इन में कोई कानूनी बंधन नहीं होता है इसलिए तलाक की कार्यवाही नहीं होती है.


सह-संपादक : मंजु मित्तल

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