लघु कथाएं

लघु कथाएं

ये तीन लघु कथाएं आपके लिए हैं रोज़ के जीवन से. आपके और हम सभी के जीवन में रोज़ घटती दिन प्रतिदिन की घटनाओं में दिखता, समाज की सोच का आइना , ये लघु कथाएं आपको दिखायेंगी. ऐसी छोटी मोटी घटनाएं हमारे आस पास घटती रहती हैं यहां तक की कई बार हम भी उनका एक  हिस्सा होते हैं.
शर्मा साहब को घर का काम करवाना था गाड़ी भी पास में नहीं और ज्यादा काम कभी किया ही नहीं. दूर के रिश्तेदार गुप्ताजी अपनी कार ले आये. अवस्था में उनके ही जितने लेकिन दूसरों के काम के लिए सदैव तैयार. मदद को अपने आप आगे बढ़े. दिन भर उनके यहाँ होने वाले काम को देखते, उन्हें बाज़ार ले जाते, मकान बनवाने का सारा सामान दिलातेदो महीने लगे मकान बनने में.
एक रोज़ शर्मा साहब की बहू बोली, “गुप्ताजी ने आपका इतना सहयोग किया, आपको उन्हें धन्यवाद के साथ साथ अपने पूरे परिवार के सामने उनका सम्मान करना चाहिए”. “हमें तो कोई उनके साथ देखकर कह रहा था कहाँ फंस गए हैं आपशर्मा साहब बोले.  तभी शर्मा साहब का लड़का बोला ये तो गुप्ता जी का शौक हैकहकर वे सभी सम्मिलित हंसी हंस दिए  और घर के दरवाजे से अंदर आते गुप्ताजी ये सुनकर लौट चुके थे. उन्हें बहुत थकान लग रही थी वे किसी के काम में सहयोग करते हुए कभी थकान को महसूस नहीं करते थे लेकिन आज अपने दिए सहयोग के बारे में सुनकर अति थकान महसूस कर रहे थे.
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बच्चों की पेरेंट्स मीटिंग चल रही थी. एक चिल्ड्रन एक्सपर्ट आये हुए थे जो समझा रहे थे बच्चों को टीवी देखने और खेलने का समय निर्धारित करना चाहिए, इस आयु में खेलना अति आवश्यक है वह भी आउटडोर गेम. पति ने पत्नी की तरफ देखकर कहा तुम बहुत टीवी चलाती हो कल से घर में तुम्हारा टीवी देखना बंद. इससे बच्चे भी  नहीं देखेंगे. ठीक है, पत्नी ने कहा.
घर आते ही टीवी बंद किया ही था की सास बोली , अरे हम सीरियल कैसे देखेंगेपत्नी ने कहा इन्होनें टीवी बंद करने को कहा है  ससुर की आवाज आई ये तो तुम जानो हम तो टीवी देखेंगे , जिसे जो करना है कर ले. तभी पति बोले अरे पापा, आप को किसने मना किया है आप जो चाहेंगे वही होगा.
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ऑटो का इंतज़ार करते काफी समय हो गया था. दफ्तर पहुँचने के लिए देर हो रही थी. तभी एक ऑटो वाला सामने आकर रूका. उसने तुरंत पूछा, “सिटी सर्कल चलोगे ? हाँ, का इशारा पाते ही वह ऑटो में बैठ गया. स्टॉप पर रूकते ही उसने सौ रूपये का नोट दिया. ऑटो वाला बोला खुल्ले नहीं हैं. अब क्या करें उसने पूछा ? “आप जहां से बैठे थे वहीं रहते हैं क्या? “ हाँ जवाब दिया.  मैं भी वहीं पीछे बस्ती में रहता हूँ” . “ जहां कई ऑटो खड़े रहते हैं उसने पूछा.  हाँ आप मेरा नंबर नोट कर लें. कल बचे पैसे वापस कर दूंगा,विश्वास कीजियेठीक है कहकर नंबर नोट कर लिया.
 कई दिन वह ऑटो वाला नहीं मिला सोचा वहीं जाकर पता किया जाये पूछने पर दूसरे ऑटो वालों ने नंबर  पूछा , बताने पर हँसते हुए बोले चूना लगा गया साहब ये ऑटो इस एरिया का नहीं है. ऐसे ही विश्वास कर लिया साहब ?”
ये थीं तीन लघु कथाएं जो हम सभी के जीवन के इर्द गिर्द ,घटती रहती हैं इन लघु कथाएं का ताना बना काल्पनिक न होकर जीवन की सच्ची घटनाओं पर आधारित है. आप चाहें तो पत्रिका के मेल पर अपने जीवन से जुड़ी ऐसी कुछ कथाएं भेज सकते हैं.

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