लघु कथाएं

ये दो लघु कथाएं आपके लिए हैं रोज़ के जीवन से . आपके और हम सभी के जीवन में रोज़ घटती दिन प्रतिदिन की घटनाओं में दिखता, समाज की सोच का आइना , ये लघु कथाएं आपको  दिखायेंगी . ऐसी छोटी मोटी घटनाएं हमारे आस पास घटती रहती हैं यहां तक की कई बार हम भी उनका एक  हिस्सा होते हैं 
पति की ट्यूशन क्लॉस के प्रमोशन के लिए सिटी फेयर में स्टॉल लगाया था. पांच दिन के लिए लगा था , दो दिन के लिए और बढ़ गया था बहुत भीड़ आती थी. रोज़ के दस हज़ार लोग आते थे तरह तरह के स्टॉल थे पति सुबह ११ बजे जाते और स्टॉल खोल देते. पत्नी स्कूल में पढ़ाकर साढ़े बारह घर आती, जल्दी जल्दी दो रोटी के निवाले खा कर बच्चों का खाना , कपड़े  निकालकर और थोड़ा बहुत घर के छोटे छोटे काम करके धूप में स्कूटर से दो बजे तक स्टॉल पहुँच जाती. जाने से पहले ससुर तीन से चार बार कह देते  “बेटा भूखा होगा हमारा, जल्दी भेजना ” स्टॉल पहुँचते ही पति को घर जाने को कहकर खुद स्टॉल संभालती. हर आने जाने वाले को रोककर समझाती , छपे हुए पर्चे बांटती. 
रात दस बजे पति आते और तब वह निकलती.  घर ग्यारह बजे पहुँचती, पूरे दिन धूप में खड़े रहने से , काम करने से थकान से अति की चूर होती, जैसेतैसे हाथ मुँह धो कर सोने चली जाती. कोई नहीं कहता , “बेटा, तू बहुत थक गई होगी , खाना खा ले”  एक दिन जैसे ही ससुर बेटे से बोले “बेटा खाना खा ले “, छोटी सी बेटी जो थकी माँ को देखती थी बोली ” पापा, बाबा मम्मी को तो कभी खाने को नहीं पूछते “, पापा हंसकर बोले ” बेटा सब अपने अपनों  को ही पूछते हैं “, ” मम्मी उनकी अपनी नहीं है पापा “?———————————————-

कॉलेज के ज़माने की सहेली थी निधि. गहरी दोस्ती साथ में रहना और उस वय के सभी सुख दुःख को साझा करना. शादी के बाद वह दिल्ली चली गयी और मैं मुंबई. फ़ोन पर अक्सर बातचीत होती रहती थी कहती “जब भी दिल्ली आये घर जरूर आना, बहुत समय हो गया है मिले हुए”. कुछ समय बाद दिल्ली की एक शादी में जाने का अवसर मिला. निधि को भी बताया उसने कहा  “घर जरूर आना और कम से कम एक रात रूकने का कार्यक्रम भी बनाना जिससे खूब बातें करें” . 

पति से बातचीत करके विवाह समारोह से दो दिन पहले जाने का कार्यक्रम बनाया जिससे सहेली के साथ रहने का मौका मिल सके.  फोन से ये सारा कार्यक्रम निधि को बता दिया. ख़ैर, दिल्ली पहुंचे एक रिश्तेदार के यहां पहुंचकर निधि को फ़ोन किया, फ़ोन किसी ने नहीं उठाया. कई बार फोन करने पर भी उसने फ़ोन नहीं उठाया. इस तरह वे अतिरिक्त दो दिन उसी रिश्तेदार के यहां निकल गए. चलने से एक दिन पहले उसे दुबारा फोन किया तो उसने फोन उठाया और बोली कि “मैं तो तेरे आने की बात भूल ही गयी थी चल तू आज घर आजा लेकिन अपने पति को मत लाना. मेरे घर में इतनी जगह नहीं है”.  
ये थीं दो लघु कथाएं जो हम सभी के जीवन के इर्द गिर्द ,घटती रहती हैं इन लघु कथाएं का ताना बना काल्पनिक न होकर जीवन की सच्ची घटनाओं पर आधारित है. आप चाहें तो पत्रिका के मेल पर अपने जीवन से जुड़ी ऐसी कुछ कथाएं भेज सकते हैं.
————————————————————————

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *