रुक नहीं रहे जुल्म

छत्तीसगढ़ में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार की कहानी उन्हीं की जुबानी
मेरा जन्म एक गांधीवादी परिवार में हुआ है पिताजी ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में हमारे शहर मुज़्ज़फरनगर के रेलवे स्टेशन को आग लगा दी थी उसके बाद पिताजी घर से फरार हो गए बाद में उन्होंने गांधीजी को पत्र लिखा और गांधीजी ने मेरे पिताजी को अपने आश्रम बुला लिया उसके बाद मेरे पिता ने पूरा जीवन सर्वोदय और ग्रामस्वराज्य द्वारा देश की सेवा में लगाया.  मेरी पत्नी वीणा के पिता की मौसी डॉक्टर सुशीला नय्यर थीं जो गांधीजी की डॉक्टर थीं और बाद में भारत की स्वास्थ्य मंत्री भी बनीं थीं.
 मैनें और वीणा ने शादी से पहले ही फैसला कर लिया था कि हम लोग अपना जीवन देश के लोगों की सेव में लगाएंगे शादी के एक महीने बाद मैं और वीणा छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा जिले चले गए और वहां के एक आदिवासी गांव में  आदिवासियों के साथ रहने लगे हम लोग आदिवासियों के साथ 18 साल रहे. अब छत्तीसगढ़ में मेरे प्रवेश पर पाबन्दी ( अघोषित ) है मुझे बताया गया है कि मेरे खिलाफ एक सौ गिरफ़्तारी वारंट जरी हुए हैं ताकि मैं कभी वापस छत्तीसगढ़ जाकर आदिवासियों के बीच काम न कर सकूँ.
 जब हमनें बस्तर में रहना शुरू किया था तो हम भी एक कल्याणकारी एन. जी. ओ. की तरह सरकार के सभी कामों में मदद करने का काम करते थे हम शिक्षा, वाटरशेड ,स्वास्थ्य , महिला ,स्वच्छ्ता आदि सरकारी कामों को जनता के बीच लागू करते थे. सरकार हमसे बहुत खुश थी हम लोग हर सरकारी सलाहकार समिति में सदस्य बनाए जाते थे. कलक्टर , जिला पंचायत के मुख्य अधिकारी और अन्य बड़े सरकारी अधिकारी हमसे राय लिया करते थे क्यूंकि हम आदिवासियों के बारे में बहुत अच्छी तरह से जानते थे हम आदिवासियों की भाषा बोलते थे हमें अदालतों द्वारा लोगों तक क़ानूनी जानकारी पहुँचाने के लिए नियुक्त किया गया. मैं लोक अदालत की सीनियर बेंच का मेंबर बनाया गया मुझे राष्ट्रीय विधिक सहायता अभिकरण का सदस्य बनाया गया.
 मदद करना भारी पड़ा
हमारा काम गरीब आदिवासियों को जागरूक बनाने का था ताकि वे अत्याचारों के खिलाफ कानून की मदद लें . लेकिन हमारी मदद की यही कोशिश हम पर भारी पड़ने लगी . हमारा आश्रम, जो आदिवासियों को खेतीबाड़ी, जंगल बचाने, स्वास्थ्य आदि का प्रशिक्षण देने का काम करने का एक केंद्र था ,बुलडोजेर से तोड़ दिया गया . दंतेवाड़ा जिले में साढ़े छ्ह सौ गाँव जला दिये गए ताकि उन गांवों के आदिवासी अपनी ज़मीनें छोड़ कर चले जाएँ और उनकी ज़मीनें बड़ी कंपनियों को खनन के लिए मिल सकें. बड़े पैमाने पर इसलिए हमले किए गए जिससे कि आदिवासियों के दिलों में खौफ पैदा हो और वहाँ कोई भी आदिवासी भूमि अधिग्रहण का विरोध करने के बारे में सोच भी ना सकें, इसे सलवा जुड़ूम अभियान का नाम दिया गया. बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया . इस अभियान में आदिवासियों के हजारों घर ,फसल,पशु जला दिये गए ,  आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ , को मार डाला गया . हजारों आदिवासियों को जेलों में ठूँसा गया. बिनायक सेन ने इसके बारे में जांच रिपोर्ट प्रकाशित की तो सरकार ने उनको जेल में डाल दिया .
दर्द बढ़ता ही गया    
हम उजड़े हुए गाँव को बसाने का काम करने लगे .सरकार को लगा कि हम खाली कराई गई जमीन को वापस इन आदिवासियों को सौंप रहे हैं मेरे साथी कोपा कुंजाम और सुखराम ओयामी को जेल में डाल दिया गया. मैं दिल्ली में तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदम्बरमसे मिला. उन्होंने दंतेवाड़ा आकर आदिवासियों से मिलने और जनसुनवाई के लिए 7 जनवरी 2010 का दिन दिया . मैनें उन्हें एक सीडी भी दी जिसमें छ्ह आदिवासी लड़कियों की कहानी थी जिनके साथ पुलिस ने सामूहिक बलात्कार किया था . मेरे दिल्ली से लौटने से पहले ही उन लड़कियों का अपहरण कर लिया गया और उनके साथ थाने में दोबारा पाँच दिन तक बलात्कार हुआ . पुलिस थाने में उन लड़कियों को पीटा गया और भूखा रखा गया . मैनें इस सब के बारे में चिदम्बरम से बात की तो उन्होंने कोई भी मदद से मना कर दिया . मैनें तत्कालीन गृहसचिव से बात की लेकिन किसी ने भी उन लड़कियों की मदद नहीं की. मैं आज तक नहीं समझ पा रहा हूँ कि पुलिस ने किसके कहने से उन लड़कियों का अपहरण किया जिनके बारे में सिर्फ चिदम्बरम जानते थे कि उन्हें मेरे द्वारा जनसुनवाई में पेश किया जाएगा.आप पर कोई हमला करे तो आप पुलिस के पास जाएंगे लेकिन वही आप पर हमला करे तो आप किसके पास जाएंगे ? आज आदिवासियों पर हमला किया जा रहा है, उनकी जमीन और जंगल के लिए . उनके पास आजीविका और सम्मान को बचाने का कोई जरिया ही नहीं छोड़ा है. अदालतें आदिवासियों के मामलों में उदासीन हैं

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