राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर:हाथों में शंख है तो वीणा कैसे बजाऊं

आज रामधारी सिंह दिनकर का जन्मदिन है. सब उन्हें उनकी ओजमयी कविताओं के माध्यम से याद कर रहे हैं. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितम्बर देशभक्त और राष्ट्रवादी थे राज्यसभा के लिए तीन बार चुने गए वर्ष 1952 से 1964 तक राज्यसभा में सदस्य रहे नए स्वाधीन राष्ट्र में वे कांग्रेस पार्टी में थे और बाद में उनके वीर रस का उपयोग कांग्रेस द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान हुआ .

सिहांसन खाली करो की जनता आती है “

              दिनकर’ स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से जाने गये। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो विपरीत प्रवृत्तिय का चरम हमें उनकी कुरुक्षेत्र और उर्वशी नामक कृतियों में मिलता है.
12 वर्ष लगातार राज्यसभा सदस्य रहकर दिनकर ने इस्तीफा दे दिया समाचारपत्र और लेखनी की पूरी आज़ादी का समर्थन करते हुए कहा था अगर हम सच्चे मन से प्रजा सत्ता चलाना चाहते हैं तो पहला काम यह होना चाहिए की लेखकों और अखबारों को अधिक से अधिक स्वाधीनता दी जाए और उचित रूप से वे जिसकी पग़डी चाहे उछाल सकें जिसकी आलोचना चाहें कर सकें तब प्रजा सत्ता बढ़ेगी .
हिंदी के लिए सदन में 20 से ज्यादा बार भाषण दिए एक बार उन्होनें कह था जिस भाषा में नेता फ़ाइल पर नोट लिखते हैं उस भाषा में वोट मांग कर देखें पता लगेगा कि नतीजा क्या होता है.

 

परिवार चलाने के लिए ब्रिटिश सरकार की नौकरी करते 4 साल में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर को 22 बार तबादले झेलने पड़े लेकिन लेखनी अन्याय गरीबी , शोषण , गुलामी के खिलाफ गरजती दिखी.
जब मनुष्य अपने ही बनाए इस जाल में फंस जाता है. तो गांधी जैसे संतो-महात्माओं की ओर दौड़ता है. कवि कहता है –
मानवता का इतिहास, युद्ध के दावानल से छला हुआ,
मानवता का इतिहास, मनुज की प्रखर बुद्धि से छला हुआ।
मानवता का इतिहास, मनुज की मेधा से घबराता सा,
मानवता का इतिहास, ज्ञान पर विस्मय-चिह्न बनाता सा।
मानवता का इतिहास विकल, हांफता हुआ, लोहू-लुहान;
दौड़ा तुझसे मांगता हुआ, बापू! दुःखों से सपदि त्राण।
उन से किसी ने कहा आप रस श्रृंगार की कवितायें लिखें तो उन्होनें कहा देश ने हाथों में शंख थमा दिया है तो वीणा कैसे बजाऊं ?
कुंकुम लेपूँ , किसे सुनाऊँ किसको कोमल गान,
तड़प रहा है आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान,
मनमोहन सिंह ने सरकार ने वर्ष 2001 में दिनकर जन्मशती वर्ष मनाया था दिनकर हिंदी की मुख्य धारा के अंतिम कवि थे जो विपरीत ध्रुवों की बात लिखते थे. कवि दिनकर ने कुरुक्षेत्र , रश्मिरथी ,उर्वशी जैसे महाकाव्य लिखे उनका महाकाव्य कुरुक्षेत्र विश्व के सर्वश्रेष्ठ संग्रहों में ७४ वां स्थान रखता हैउन्हें भारत रत्न देने की मांग अनेक बार हो चुकी है.
उर्वशी को भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार जबकि कुरुक्षेत्र को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ काव्यों में 74 वाँ स्थान दिया गया. पद्म विभूषण की उपाधि से भी अलंकृत किया गया उनकी पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा उर्वशी के लिये भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया अपनी लेखनी के माध्यम से वह सदा अमर रहेंगे.

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