राखी

भैया कृष्ण , भेजती हूँ मैं
राखी अपनी ,यह लो आज.
कई बार जिसको भेजा है
सजा सजा कर नूतन साज.
लो आओ , भुजदंड उठाओ
इस राखी में बांध जाओ.
भारत भूमि की रजभूमि  को
एक बार फिर दिखलाओ.
वीर चरित्र राजपूतों का
पढ़ती हूँ मैं राजस्थान.
पढ़ते पढ़ते आँखों में
छा जाता राखी का आख्यान.
मैंने पढ़ा,शत्रुओं को भी
जब जब राखी भिजवाई.
रक्षा करने दौड़ पड़ा वह
राखी-बंद-शत्रु-भाई.
किन्तु देखना है यह मेरी
राखी क्या दिखलाती है.
क्या निस्तेज कलाई पर ही
बंधकर यह रह जाती है.
बोलो,सोच समझकर बोलो ,
क्या राखी बंधवाओगे.
भीर पड़ेगी मुझ पर ,
क्या तुम रक्षा करने दौड़े आओगे.
यदि हाँ ! तो यह लो मेरी
इस राखी को स्वीकार करो.
आकर भैया, बहिन सुभद्रा
के कष्टों का भार हरो.
                     सुभद्रा कुमारी चौहान

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