रक्षाबंधन : पर्व तथ्य

स्नेह व प्रेम के धागों का बंधन रक्षाबंधन, धागों से बंधने वाला लेता है रक्षा का संकल्प , यही है रक्षाबंधन के त्यौहार में निहित भारतीय दर्शन .

ऊपरी तौर पर वर्तमान सामजिक व्यवस्था में त्यौहार सिर्फ मौज मस्ती व खाने-पीने तक सीमित नजर आते हैं परंतु इन त्यौहारों के निर्माण के पीछे का दर्शन पूरी तरह वैज्ञानिक और तार्किक होता है. सिर्फ अंतर उसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने में व्यवहार और विचार दोनों के तालमेल की कमी का है आज जब भी कोई त्यौहार मनाया जाता है तो सभी सिर्फ उसके मनाने के ढंग की , तरीकों की , रीती रिवाजों की बात करते हैं और उन्हें निभाने में ही सारी ऊर्जा खर्च कर देते हैं यहाँ तक की ये रीती रिवाज रूढ़िवादिता की हद तक हमारे समाज में घुलमिल चुके हैं. 

इन त्यौहारों के निर्माण का मूल उद्देश्य इनके माध्यम से जीवन में नवचेतना के प्राण फूंकने का प्रयास है , नई ऊर्जा का संचार है लोगों को एक दूसरे के साथ प्रेम और सौहार्द के साथ रहना सिखाना है. रक्षाबंधन के पर्व पर हम परंपरागत मूल्यों से ऊर्जा ग्रहण करते हैं उनसे अपने जीवन को अनुप्राणित करते हैं यह पर्व हमें अधिकारों के साथ कर्तव्यों को निभाने की प्रेरणा देता है  

सतही तौर पर ये त्यौहार सिर्फ बहन के राखी बाँधने और भाई के द्धारा उसकी रक्षा के वचन तक सीमित नज़र आता है लेकिन इस त्यौहार में एक व्यापक सन्देश दिया गया है रक्षा का दायित्व,जो कि सिर्फ एक बहन से ही जुड़ा हुआ नहीं है वरन ये परिवार , समाज , देश , पृथ्वी और पर्यावरण से जुड़ा हुआ भाव है इनकी रक्षा करके ही हम राखी के धागे का मान रख सकते हैं  
                                 किरन संजीव 

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