रंग भरा रुपहला पर्दा

” अरे जा रे हट नटखट , तू छू न मेरा घूँघट, पलट के दूंगी आज तोहे गारी रे ”

रंगों से भरे इस गाने को संध्या के ऊपर फिल्माया गया था,होली के रंगों, मीठी छेड़छाड़ और उत्तर भारतीय पृष्टभूमि के बोलों पर आधारित इस गीत में भरत व्यास के बोलों ने होली के भावों को जँहा परदे पर उजागर किया था वंही सी.रामचन्द्र के संगीत ने दृश्य को जीवंत कर दिया, व्ही शांताराम के निर्देशन में बनी इस फिल्म में इस गाने ने फिल्म को कलात्मक बनाने मैं अपना पूर्ण योगदान दिया. रुपहले परदे और होली का रिश्ता काफी पुराना है.महबूब खान की मदर इंडिया का शमशाद बेगम की आवाज , नौशाद के संगीत और शकील बँदायूनी के बोलों से सजा ” होली आई रे कन्हाई ” गीत इस की मिसाल है ग्रामीण पृष्टभूमि पर फिल्माए गए इस फिल्म के दृश्य दर्शकों के जेहन में हमेशा के लिए रच बस गए हैं

फिल्मों के प्राम्भिक दौर में परदे पर होली का त्योहार लगभग हर दूसरी फिल्म में दिखया जाता था. प्रेम और खुशियों का प्रतीक होली का त्योहार रुपहले परदे को रंगों से सराबोर कर देता था नायक और नायिका की मीठी छेड़छाड़, पृष्टभूमि में समूह नृत्य, होली के रंगों से सजा पर्दा एक जीवंत पेंटिंग का रूप ले लेता था. दर्शकों ने इसे हाथों हाथ लिया.साठ से सत्तर के दशक मैं जब हिंदी फिल्मों का सुनहरा दौर चल रहा था होली के गीत सिने प्रेमियों को लगभग हर दूसरी फिल्म मैं लुभाते रहे .

1970 के दौर का राजेश खन्ना के अंदाज़ से सजा , किशोर कुमार की मस्ती भरी आवाज़ , पंचम दा के सुपरहिट संगीत से सजी फिल्म कटी पतंग का ” आज न छोड़ेंगे हमजोली , खेलेंगे बस होली ” ने आज भी विशेष जगह बना रखी है 1975 में बनी शोले ने अपने प्रत्येक अंदाज़ के लिए फिल्म उद्योग में मुकाम बनाया , उसका गाना ” होली के दिन दिल खिल जाते हैं ” जिसे पंचम दा ने अपने संगीत में लता और किशोर की आवाज़ों से सजाया था जैसे ही परदे पर आता दर्शक उसकी मस्ती में झूम उठते . इस गीत ने परदे पर होली को एक शरारत भरी छेड़छाड़ के रूप में दिखाने का सिलसिला प्राम्भ किया .

इसके बाद आया होली का एक यादगार गीत ” रंग बरसे भीगे चुनर वाली ” ,ऐसी कोई जगह नहीं जँहा होली खेली जाये और ये गीत न बजे . रोमांस के निर्देशक कहे जाने वाले यश चोपड़ा की 1981 मैं आई फिल्म सिलसिला के इस गीत को संगीत बद्ध किया था शिवहरि ने. अमिताभ बच्चन की आवाज़ से सजा ये गाना रेखा की दिलकश अदाओं की वज़ह से हमेशा के लिए अमर हो गया. उन दिनों आई कई फिल्मों जिनमें कामचोर फिल्म का ” मल दे गुलाल मोहे “, आखिर क्यों का ” अपने रंग मैं रंग दे मुझे “, जख्मी का ” आइ रे होली आई ” जैसे गानों ने फिल्मों में होली के रंगों को लगातार बिखेरा .

बदलते वक़्त के साथ फ़िल्मी परदे से त्योहारों के रंग उड़ने लगे तो होली के रंग भी इससे अछूते नहीं रहे और फिल्मों में होली के दृश्य और गाने दोनों ही कम होते चले गए . नए दौर की फिल्मों की बात करें तो डर फिल्म में सन्नी देओल और जूही चावला पर फिल्माया गया ” अंग से अंग लगाना ” ने एक बार फिर परदे को होली के रंगों से भिगो दिया .

फिर आया अरबन यूथ को लुभाता हुआ वक़्त द रेस अग़निस्त टाइम ‘ डू मी फेवर लेटस प्ले होली ” ने होली को नए आधुनिक जामे के साथ दर्शकों के समक्ष परोसा . राजेश खन्ना और अमिताभ के समय की होली की ठिठोली को अंग्रेज़ी शब्दों के साथ फिर से दोहराया गया . वर्ष 2003 में आई रवि चोपरा की फिल्म बगवान में दर्शकों को एक बार फिर से होली का गीत और उसमें अमिताभ की आवाज सुनाई दी ” होली खेले रघुवीरा गाने को ” और आकर्षिक बनाया हेमामालिनी और साथियोंकी अदाओं ने .2013 में आई फिल्म ये जवानी है दिवानी में रणवीर कपूर और दीपिका पादुकोण पर फिल्माया गया ” बलम पिचकारी ” ने आज के दौर की पीढ़ी को लुभाया .

सिर्फ गाने ही नहीं भारतीय सिने इतिहास की कुछ फ़िल्में भी होली की पृष्टभूमि पर बनी है जिनमें फाल्गुन , होली, और दामिनी का नाम उल्लेखनीय हे . आज फिल्मों से होली के दृश्य या तो गायब हो चुके हैं या उनका उपयोग द्धि अर्थी अश्लील बोलों पर नायिका के अंगों को दिखाने के कार्य में लिया जाता है लोगों का अंदाज़ बदल चुका है ” अब कोई गब्बर नहीं पूछता की होली कब है “

नदीम परमार.

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