मैं क्यों परदेश जाऊँ

कैसे देश की धरती को आखिर छोड़ दूं मैं ?
थोडे़ धन के खातिर अाज क्यों मुख मोड़ लूं मैं ?
तन में जो मिट्टी रक्त बनकर बह रही है,
उस रक्त के बंधन को क्योंकर छोड़ दूं मैं।

जन्म से पावन धरा की गोद पाई,
माँ ने ही तब संस्कार की घुट्टी पिलाई।
वारिस बनाया था मुझे इस सभ्यता का,
सदियों से जिसको पूर्वजों ने थी बनाई।

उन पूर्वजों का है बहुत उपकार मुझपर,
भौतिक सुख के खातिर भूल जाऊँ आज क्योंकर।
मेरी आत्मा भी पूछती है आज मुझसे,
चुका सकता हूँ क्या ऋण इनका मैं परदेश जाकर।

यह देश जिसमें समय ने भी अर्थ पाया,
जन्मी सभ्यता और ज्ञान की समवेत काया।
जिसे परमात्मा ने भी चुना वेदों को रचकर,
संस्कृति के आधारों को वेदों ने बनाया।

इस पावन धरा की धूलि लेने राम आए,
मानव मात्र के कल्याण हेतु राम आए।
की संस्थापना आदर्श , मूल्यों कि यहाँ पर,
इस भूमि पर कई स्नेह के सेतु बनाए।

यह देश जिसमें कृष्ण ने गीता कही थी,
समूचे विश्व में तब ज्ञान की गंगा बही थी।
सारे ज्ञान की शाखाओ का आधार भारत,
विज्ञान की हर खोज का आधार भारत।

ऋषी-मुनियों के तप का तेज भी इसमें समाहित है,
गौतम बुद्ध और जिनेन्द्र की वाणी से प्लावित है।
गुरू नानक की भक्ति ने है सींचा इस धरा को,
इस धरा के कण-कण में स्वयं ईश्वर विराजित है

इसको मिटाने हेतु कई तूफान आए,
कभी तुर्क, अौर कभी हूण, कभी अफ़गान आए।
कभी यूरोप से आई थी सेना सिकंदर की।
कभी फ्रांस और इंगलैंड के बेईमान आए।

संकट का बादल जब कभी हम पर था छाया,
देशभक्तों ने इसे तब-तब बचाया।
कभी जयगान गाकर और कभी बलिदान देकर,
हर एक ने था कर्ज माटी का चुकाया।

क्या होता अगर इस देश में राणा न होते,
गुरु गोविंद सिंह, रणजीत सिंह राजा न होते।
क्या होता अगर संग्राम न करते शिवाजी,
तो अाज अपने देश से हम राष्ट्र खोते।

तलवार न लेती अगर झाँसी की रानी,
मंगल, कुँवर सिंह ने न दी होती जवानी।
जब तात्या और पेशवा न जंग लडते,
तो मिट ही जाती सभ्यता की भी निशानी।

अगर गाँधी कभी परदेश से वापस न आते,
सरदार भी मद-मस्त होकर धन कमाते।
चूमा न होता मौत का फंदा भगत सिंह,
तो आज भी न देश को आजाद पाते।

कई साल हो गए देश को आजाद होकर,
बडी मुश्किल से उठ पाया है यह बरबाद होकर।
हर क्षेत्र में आगे बढा़ है देश अपना,
जरूरत है कि पूरा करना है आगे का सपना।

मैं चाहता हूँ एक दिन भी आए ऐसा,
सौ डाॅलर बराबर हो हमारा एक पैसा।
अध्यात्मिक और आर्थिक उत्कर्ष भी हो,
संसार में कोई न हो इस देश जैसा।

फिर क्यों इसे मैं आज अखिर छोड़ जाऊँ,
मेरे सपनो के भारत को न क्यों मैं खुद बनाऊँ।
परदेश जा क्या कर सकूँगा देश का
इस देश में रहकर परम वैभव बनाऊँ

डाॅ कमलेन्दु कुमार पान्डेय,
सूरत

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