मैंने दसवीं पास कर ली

इन दिनों सभी जगह दसवीं एवं बारहवीं की  बोर्ड परीक्षा के परीक्षा परिणाम आने लगे हैं. इन परिणामों के विद्यार्थियों पर पड़ने वाले प्रभावों पर अक्सर सभी जगह चर्चा की जाती है लेकिन ऐसा नहीं है की इन परिणामों से केवल विद्यार्थी ही प्रभावित होता है इससे एक और शख्श अत्यधिक प्रभावित होता है यह उसके मां या पापा में से कोई एक या फिर दोनों हो सकते हैं .

कुछ ही दिन हुए बेटी की दसवीं की परीक्षा का परिणाम आया. परीक्षा परिणाम आते ही उसको जानने  वालों का फ़ोन पर, व्हॉट्स ऍप पर सन्देश आने शुरू हो गए भई क्या हुआ ? बिटिया का रिजल्ट क्या आया ?  कुछ लोगों के फ़ोन भी आ रहे थे भई 10 वीं का रिजल्ट आ गया है खुशखबरी तो बताइए ? सच कहूं तो इन मेसेजेस का आना या फिर लोगों का पूछना बिल्कुल भी परेशान नहीं कर रहा था बल्कि ये सब कुछ अच्छा ही लग रहा था शायद बहुत ज्याद अच्छा. ऐसा लग रहा था कि परीक्षा मैंने दी है और सभी उसका रिजल्ट मुझसे जानना चाहते हैं. बेटी के नब्बे की लाइन में आये हुए प्रतिशत मुझे गर्विणी बना रहे थे.

सच ही तो है हम बच्चे की सफलता और असफलता से खुद को इस कदर जोड़ लेते हैं की उसकी सफलता से हम स्वयं अंदर तक अभिभूत हो उठते हैं जबकि उसकी असफलता से हताश.  कितना भी लिखा या समझाया जाए की बच्चों पर अभिभावकों को अपनी इच्छाएं नहीं थोपनी चाहिए, बावजूद उसके हम हर बार, हर रोज़ यही करते हैं. अपनी हर वो इच्छा जो किसी रूप में अधूरी रह गयी है हम बच्चे से ही  उसे पूरा करने की उम्मीद करते हैं.

एक और मज़ेदार बात जिनके बच्चों के नंबर किसी वजह से काम आ जाते हैं या जानकारों के बच्चों से कम वो अभिभावक अपने आप को किसी बड़े अपराधी से कम नहीं समझते हैं यहां में सोच रही थी की बधाई लेने का लुत्फ़ वे क्यों खोते हैं कम या ज्यादा बच्चे ने कोशिश की और अपना सर्वोत्तम देकर जो भी अंक हासिल किये हैं उन्हें गर्व के साथ लोगों को बताएं और इन पलों को खोने न दें.

वैसे भी ये दसवीं की परीक्षा है जिसके परिणाम को, उसकी ख़ुशी को जीने का आपको दुबारा मौका मिला है ये मौका फिर मिले, न मिले इसे जी लें, भरपूर ख़ुशी के साथ.

सही गलत के दायरे से ऊपर उठ कर देखा जाये तो यह स्वाभाविक मानवीय गुण है. एक मध्यमवर्गीय परिवार अपने जीवन का उद्देश्य ही बच्चे का बेहतर पालन पोषण बना कर जीता है.  जिसके लिए  जीना है जीवन का उद्देश्य ही वही है तो अपनी आँखों के सपने उसकी आँखों से देखने को कैसे रोका जाए.

खैर सारी बात यही रही की उस पल का में पूरा आनंद उठाया. लगातार में महसूस कर रही थी कि अपने जीवन काल में द्वितीय श्रेणी से पास होने वाली में आज बीस साल बाद फिर से दसवीं कक्षा की परीक्षा देकर नब्बे प्रतिशत की लाइन वाली विद्यार्थी हो गयी हूँ और इसके लिए लोगों से बधाईयां लेने में मुझे कोई संकोच नहीं नज़र आ रहा था.

किरन

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