मेरी जापान यात्रा

बात सन् 2 0 1 3 सितम्बर की है, उन दिनों में अपने शोधकार्य में व्यस्त थी. शिक्षण और शोधकार्य दोनों के संतुलन में जिंदगी बेहद व्यस्त गुजर रही थी. शोध के सिलसिले में शोधपत्र प्रस्तुत करने के लिए जापान जाने का अवसर मिला. दरअसल जापान के नगोया शहर के विश्वविद्यालय नगोया में 13 सितम्बर को एसआईसीई की वार्षिक कॉन्फ्रेंस थी जिसमें मैंने अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया था.

13 सितम्बर को मुंबई से मैंने हवाई यात्रा शुरू की. मुंबई हवाई अड्डे से सुबह के समय की निगोया के लिए सीधी फ्लाइट थी. घंटों यात्रा के बाद नगोया हवाई अड्डे पर उतरे. जापान में पहुंचते ही पहली और शायद सबसे बड़ी समस्या (जिससे कि पूरे समय जापान में हमारा सामना हुआ) भाषा की समस्या से दो-चार होना पड़ा. मेरे साथ हमारे एक मित्र परिवार (जो कि टोक्यो शहर में रहते हैं) के लिए उनके परिवार नें गुड़ और चौलाई रख दिए थे परंतु जापानी सुरक्षा एजेंसी की सूची में इसका उल्लेख न होने व उनको मेरी और मुझे उनकी भाषा की जानकारी न होने से उन्होंने इसके लिए आपत्ति जताई. मैने उन्हें इशारों से काफी कुछ समझाने की कोशिश की, पर सब व्यर्थ गया और अंतत: उन्होंने ये सामान फेंक दिया और ले जाने नहीं दिया. होटल की बुकिंग भारत से ही करा ली थी, इसलिए जाते ही रुकने और रहने की समस्या का सामना नहीं करना पड़ा. वहां सभी जगह जापानी में ही लिखा था. जिसकी वजह से दुकानों या सड़कों के नाम समझ नहीं आ रहे थे. यहां पहुंचकर पहला कार्य मुद्रा परिवर्तन का कराया. यहां मुझे एक व्यक्ति मिला जो अंग्रेजी जानता था. उसने मुझे न केवल होटल पहुंचाया वरन् उसने मुझे इंटरनेट डेटा को बंद रखने की सलाह दी. खासतौर पर तब जब मैं रेलवे स्टेशन पर मौजूद रहूं. मैं विश्वविद्यालय पहुंची वहां सब कुछ बहुत ही अच्छा था, सभी एक दूसरे की मदद को तत्पर थे. विश्वविद्यालय बहुत ही खूबसूरत, साफ सुथरा और तकनीकी रूप से समृद्ध था. सभी प्रोफेसर और विद्यार्थी अपने कार्य में पूरी तरह व्यस्त थे. वहां मैं अपने गाइड के साथ पहुंची थी. विश्वविद्यालय के कॉन्फ्रेंस हॉल में काफी लोग मौजूद थे. शोधपत्र प्रस्तुत करने पर सभी ने मेरी प्रशंसा की और प्रोत्साहन दिया. सभी को मेरा कार्य सराहनीय लगा. यहां से उसी दिन शाम 7.30 बजे मैं टोक्यो के लिए रवाना हो गई. नगोया से टोक्यो जाने के लिए मुझे रेल से सफर करना था. यहां की सभी ट्रेने भूमिगत (सब वे) चलती हैं. और पब्लिक ट्रांसपोर्ट के तौर पर लोग ट्रेन का प्रयोग करते हैं. अनुशासन और इमानदारी का आश्चर्यजनक प्रतीक है कि वहां टिकट का कोई कांउटर नहीं होता है, रेलवे स्टेशन पर कम्ह्रश्वयूटराइज् ड बॉक्स होते हैं. जिसमें पैसे डालने पर टिकट व बकाया राशि वापस मिल जाती हैं. सलाह के अनुसार मैने यहां रेलवे स्टेशन पर पहुंचते ही अपना फोन बंद कर दिया. वहां सभी कुछ जापानी में लिखा था कुछ समझ नहीं आ रहा था. तभी एक लड़की से मैने इशारे में बात की, वह मेरा हाथ पकड़कर ह्रश्वलेटफॉर्म पर ले गई और इशारे से बताया कि आपकी ट्रेन आपको यहां मिल जाएगी. टोक्यो में रेलवे स्टेशन पर मेरी सहेली मुझे लेने आई.

 

मेरा अगला तीन दिवस का टोक्यो प्रवास उसी के घर पर था. वहां के मॉल बहुत खूबसूरत हैं, वहां हमने मोनोरेल, रोबोट देखे, पुरानी कारों की स्ट्रीट, जो अमेरिका से प्रेरित थी वह भी देखी. वहां सभी सामान एक ही भाव पर (99 डॉलर शॉप की तरह) मिल रहा था ,बहुत खरीदारी की. वहां मैने बहुत सारी तस्वीरें खींची. जापान में बहुत कुछ घूमने लायक है. तीन दिन के पश्चात 18 सितम्बर को मैं हॉंगकॉंग होते हुए वापस भारत आ गई. उस देश की खूबसूरत यादें और मधुर स्मृतियाँ आज भी मन में समायी हुई हैं

डाउन टू अर्थ
जापानी लोगों की विनम्रता और सभी की सहायता के लिए तत्परता काबिले तारीफ है. जब मैं रेलवे स्टेशन पर थी तब वहां एक आदमी मुझे मिला. जो कि वहां की घरेलू एयर लाइन्स का मालिक था. उसने मेरी काफी सहायता की और बहुत ही विनम्रता से पेश आ रहा था. जबकि भारत में घरेलू एयर लाइन्स के मालिक (विजय माल्या, सहारा आदि) सिर्फ बड़े उद्योगपतियों या राजनीतिज्ञों से ही बात करना और सिर्फ एयर लाइन्स से या कारों से ही सफर करना पसंद करते हैं.
देशहित
जापानी जनता देश भक्ति की बात करती ही नहीं बल्कि देश का ख्याल सही मायने में रखती है. सफाई और स्वच्छता तो हैं ही तारीफ की बात, इसके अतिरिक्त वहां के लोग पर्यावरण का ख्याल रखने हेतु अधिकांशतया लोग साइकिल का प्रयोग करते हैं. सभी सार्वजनिक स्थल हमारी कल्पनाओं से भी ज्यादा साफ- स्वच्छ रहते हैं. वहां के पार्क, रेलवे स्टेशन, यहां तक कि ट्रेनों के टॉयलेट्स भी अत्यंत साफ सुथरे रहते हैं.
टोक्यो
टोक्यो दुनिया कें सबसे महंगे शहरों में से एक हैं. वहां घर बहुत ही महंगे होते है. इमारतों में व्हीकल पार्किंग नहीं होती है. इसकी जगह पर जगह-जगह सार्वजनिक पार्किंग की व्यवस्था होती है. जो कि स्वचालित और बहुमंजिला होती हैं. वहां आप किराया देकर अपना वाहन पार्क कर सकते हैं.वहां सब्जियां और फल बहुत ही ताजे, बड़े होते हैं, अच्छी बात ये है कि वहां की फसलें आर्गेनिक होती हैं, खाने का स्वाद बहुत ही बढ़िया होता है.जापान में सर्वाधिक ‘सुशी’ नामक व्यंजन खाया जाता है. जो कि मछली और चावल से बना होता है.

जापानी लोग हमेशा स्वस्थ और तरो ताजा नजर आते हैं. काम से लौटते हुए वे इस तरह लगते हैं जैसे कि काम पर जा रहे हैं. इसका एक बड़ा कारण वहां की खेती का आर्गेनिक होना एवं दूसरा पर्यावरण का अत्यंत साफ सुथरा होना है. जिससे त्वचा स्वस्थ व चमकदार रहती है और एक और महत्वपूर्ण कारण है वहां के लोगों का अपने मेकअप और ब्यूटी पर खर्च करना. वहां पांच दिन में मैंने सिर्फ जवान और बच्चे ही देखे. वहां त्वचा से कोई 40 वर्ष से ऊपर नजर नहीं आ रहा था. टोक्यो शहर जापान की राजधानी और वहां का सबसे बड़ा शहर है. यहां जापान के राजा और सरकार दोनों ही के घर और कार्यालय हैं. टोक्यो आइलैण्डों पर बसा हुआ शहर है. टोक्यो शहर दुनिया के शहरों में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का शहर है यहां 51 विश्वस्तरीय कंपनियां हैं. इलैक्ट्रोनिक सामान बनाने वाली कई कंपनियां यहां से संबंध रखती हैं. टोक्यो शहर अपनी सहायता के लिए ,तत्परता, नाइट लाइफ, खरीदारी, स्थानीय ट्रांसपोर्टेशन और साफ-सुथरी सड़कों के लिए जाना जाता है.

टोक्यो शहर बहुत ही खूबसूरत ढंग से बसा हुआ योजना बद्ध शहर है. यहां के आर्किटैक्चर को टोक्यो इंटरनेशनल फोरम, रेन बो ब्रिज में देखा जा सकता है. टोक्यो फिल्म उद्योग के लिए मशहूर शहर है. ‘ डोरेमोन ’ मशहूर कार्टून धारावाहिक यहां पर निर्मित किया जाता है. शायद इसीलिए वह गैजेट पर आधारित धारावाहिक है, क्योंकि जापान तकनीकी दृष्टि से अत्यंत विकसित देश हैं. यहां के संग्रहालय बेहद खूबसूरत और अपने बेहतर संकलन के लिए जाने जाते हैं.

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