मेरी कुंभलगढ़ यात्रा

अपने किलों ओर महलों के लिए विख्यात कुंभलगढ़ किला अपने ऐतिहासिक महत्व ओर खूबसूरत जंगलो के लिए पर्यटकों मे लोकप्रिय है. उसका यात्रा संस्मरण महक लिए भेजा है – नेहा जैन

घूमने का मन हो तो सर्दी के मौसम से ज्यादा मजेदार क्या होगा और यात्रा का मजा दुगुना हो जाएगा जब घूमने के लिए चुना गया स्थल ऐतिहासिक हो. ऐसी ही एक खूबसूरत और यादगार यात्रा के लिए हमारा परिवार (मैं, मेरे माता पिता (आशा-दिनेश जैन) एवं मेरा छोटा भाई प्रवीण जैन) घूमने निकला. मूल रूप से हमारा परिवार राजस्थान के जोधपुर जिले से है. परंतु पिछले कई वर्षों से सूरत ही हमारे परिवार की कर्मभूमि बना हुआ है, परंतु जोधपुर आना जाना लगा ही रहता है. बात सन २०११ नवम्बर माह की है. हमारे परिवार को अत्यंत नजदीकी परिवार के यहां विवाह समारोह में शामिल होने जाना था. इसके लिए हमने ट्रेन का सफर ना चुनकर रोड का सफर चुना. हमने सफर अपनी गाड़ी से करना तय किया क्योंकि जोधपुर तक गाड़ी से जा रहे थे इधर दीपावली का अवकाश भी था, इस कारण पापा ने जोधपुर और रणकपुर के पास कुंभलगढ़ जाने का कार्यक्रम बना लिया. हम सभी की खुशी बढ़ गई थी. एक तो विवाह का आनंद, फिर परिवार के साथ घूमने का अवसर हमारे लिए बड़ा ही आनंद का अवसर था.

दो दिन जोधपुर में विवाह समारोह में शामिल होने के पश्चात १४ नवम्बर को सुबह तडक़े ६ बजे ही हम कुंभलगढ़ जाने के लिए निकल पड़े. ठंडी ठंडी हवाएं चल रही थीं, जिससे कि हम सभी के तन मन में स्फूर्ती भर गई. पापा ने यात्रा के प्रारंभ में गाड़ी में भजन चलाए जोकि थोड़ी ही देर में नए गानों में बदल गए. लगभग ३ घंटे के सफर के पश्चात हम रणकपुर पहुंच गए. रणकपुर अपने जैन मंदिरों के लिए विख्यात स्थल है. यहां का प्राकृतिक सौंदर्य, शांत वातवरण, मंदिरों से आती घंटियों की आवाजें, पक्षियों के कलरव सभी कुछ मिलकर एक अनोखा दृश्य उत्पन्न कर रहा था और वातावरण को और ज्यादा रमणीय बना रहा था.

रणकपुर के मंदिर तत्कालीन वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना हैं. मंदिर लगभग ५०० वर्ष पुराना और ऐतिहासिक है. मंदिर समूह में १४४४ स्तंभ हैं जिन पर की गई नक्काशी तत्कालीन कला का बोलता हुआ नमूना है. मान्यता है कि इन स्तंभों को गिनने में आज तक कोई सफल नहीं हो सका है. रणकपुर मंदिर से कुंभलगढ़ की दूरी ३५ किमी है. हम एक घंटे रणकपुर रूकने के पश्चात लगभग १० बजे कुंभलगढ़ के लिए निकले. हरी भरी घाटियों वाले रास्तों से होते हुए लगभग १२ बजे हम कुंभलगढ़ पहुंच गए. यहां पहुंकर हमने सर्वप्रथम कुंभलगढ़ किले में जाने का निश्चय किया. किले के बारे में पूरी जानकारी करने के लिए हमने एक गाइड किया. इतिहास को सुनते हुए किला देखने में यूँ लगा जैसे सभी कुछ हमारी नजरों के समक्ष जीवंत हो गया है. मेवाड़ क्षेत्र की ऊंची अरावली पहाड़ी श्रृंखला पर स्थित कुंभलगढ़ किले को महाराणा कुंभा ने १४५८ में बनवाया था, कहा जाता है कि इस विशाल किले के निर्माण में ७७ वर्ष लगे. कुंभलगढ़ को १९५१ मे भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया. अब इसके स्मारकों का संरक्षण, रासायनिक परिरक्षण एवं उद्यान विकास सभी कार्य प्रशासनिक तौर पर किए जाते हैं. कुंभलगढ़ न केवल अपने भव्य स्मारकों, वन्य जंतुओं के लिए प्रसिद्घ है अपितु महाराणा प्रताप की जन्मस्थली होने के कारण भी प्रसिद्घ है.

महाराणा प्रताप ने कुंभलगढ़ को मुगल शासक अकबर की सेना पर नियंत्रण करने के लिए अपनी दूसरी राजधानी के रूप में प्रयोग किया. किले को देखने के पश्चात हम सभी को तेज भूख लग रही थी.हम एक होटल में गए, वहां खाना खाकर विश्राम भी किया. ४ बजे हम सभी वन्य जंतुओं को देखने के लिए कुंभलगढ़ के प्रसिद्घ वन में जंगल सफारी के लिए निकले. इसमें मुझे और मेरे भाई को बहुत मजा आ रहा था. घने वृक्षों के बीच से गुजरते हुए अत्यंत रोमांचक महसूस हो रहा था. वन में बहुत सारी घाटियां और पहाडिय़ां थीं. यहां हमने बारहसिंघा भी देखा. जंगल में बहती नदी की आवाज और कच्चे रास्ते पर चलती हुई हमारी जीप ये सब अविस्मरणीय अनुभव था.

करीब शाम ६ बजे हम जंगल से बाहर आए. चाय नाश्ते के बाद हम सभी कुंभलगढ़ का नाइट शो देखने गए. ये एक लाइट एंड साउंड कार्यक्रम था. जिसमें किले के निर्माण से लेकर महाराणा प्रताप तक के इतिहास की जानकारी रोचक तरीके से दी गई. अगले दिन यानि १५ जून सुबह ही हम उदयपुर अहमदाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग से होते हुए वापस सूरत की ओर लौट पड़े. वह यादगार रोमांचक यात्रा आज भी मेरी स्मृति में ज्यूं की त्यूं ताजी है. हमारा गौरवपूर्ण इतिहास को अपने साथ लिए प्रकृति की रमणीय गोद में खड़ा कुंभलगढ़ दुर्ग जैसे हमें हर पल बुलाता है.

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