मुगल-ए-आजम

अपने समय में हिन्दी सिनेमा के सभी क्षेत्रों में नई ऊंचाईयां बनाने और सफलता के परचम लहराने वाली फिल्म मुगल ए आजम कलाकारों के बेजोड़ अभिनय, बेमिसाल गीत संगीत और अपने भव्य सैटस के लिए जानी जाने वाली, के आसिफ साहब का हिन्दी सिनेमा को दिया गया वो तोहफा है जो अमर कृति है और उन्हें पीढिय़ों तक जिंदा रखेगा.

हिन्दी सिनेमा के प्रारंभिक समय से लेकर वर्तमान तक एक से बढक़र एक कई फिल्में बनी हैं अनूठे अंदाज और नए प्रयोग किए गए हैं. लेकिन जब हिन्दी सिनेमा के इतिहास पर नजर डालते हैं तो बेजोड़े सिनेमा की श्रृंखला में सबसे आगे खड़ी प्रत्येक दृष्टि से उम्दा और बेहतरीन फिल्म नजर आती है मुगल ए आजम. मुगल ए आजम, के.आसिफ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित क्लॅासिक हिन्दी फिल्म है. हिन्दी सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई इस फिल्म ने रचनात्मकता और सृजनात्मकता के प्रत्येक क्षेत्र में नई ऊंचाईयां बनाई और विश्व सिनेमा पर अपनी कलात्मकता की छाप छोड़ी. इस फिल्म ने विभाजन से पूर्व के भारतीय समाज की एक नई छवि का निर्माण किया. निर्देशक आसिफ साहब द्वारा इस बात का पूरी तरह ख्याल रखा गया कि फिल्म के प्रत्येक क्षेत्र में कुछ भी कमी न रहे. यही वजह है कि मुगल ए आजम का प्रत्येक पक्ष चाहे कलात्मक हो या तकनीकी बेहतरीन नजर आता है और फिल्म को अव्वल दर्जे की फिल्मों की कतार में न केवल शामिल करता है वरन सबसे आगे खड़ा करता है.

आसिफ चाहते थे कि इस फिल्म में वे मुगल इतिहास को उसकी पूरी भव्यता और शान शौकत, तहजीब के साथ दर्शाएं.

१९२२ में उर्दू नाटककार इम्तियाज अली द्वारा लिखी गई सलीम अनारकली की इस नाट्य प्रेमकहानी को सबसे पहले आर्देशर ईरानी द्वारा १९२८ में मूक फिल्म अनारकली द्वारा और बाद में १९३५ में आवाज के साथ लाया गया.

१९४० में के.आसिफ ने इसी कहानी को अपनी फिल्म के लिए चुना और इसके लिए उन्होंने पहले चंद्रमोहन, डी के सप्रु और नरगिस को चुना. लेकिन फिल्म को निर्माण के प्रारंभिक समय में ही काफी रूकावटों का सामना करना पड़ा. फिल्म के प्रोडयूसर १९४७ के भारत पाक विभाजन के दौरान पाकिस्तान चले गए. १९४९ में चंद्रमोहन की मृत्यु हो गई. तत्कालीन मशहूर पारसी उद्योगपति शाहपोरजी पालोनजी ने इस प्रोजेक्ट में अपनी रूचि दर्शाते हुए के.आसिफ को इस फिल्म को पूरी भव्यता के साथ निर्मित करने के लिए कहा. के.आसिफ साहब के निर्देशन में यह प्रोजेक्ट पुन: प्रारंभ हुआ लेकिन नई स्टार कास्ट के साथ. रौबदार कद काठी और गंभीर आवाज और व्यक्तित्व के मालिक पृथ्वीराज कपूर को अकबर के ऐतिहासिक पात्र अर्थात मुगल ए आजम के लिए चयन किया गया. मेकअप रूम में जाते वक्त वे स्वयं बोलते पृथ्वीराज कपूर जा रहा है और रूम से बाहर आते वक्त बोलते शहंशाह अकबर आ रहे हैं. दूसरे मुख्य किरदार सलीम के लिए कालातीत अभिनेता, ट्रैजडी किंग दिलीप कुमार का चयन किया गया जबकि अनारकली के किरदार के लिए चुनी गई सौंदर्य सम्राज्ञी मधुबाला. फिल्म के एक और मुख्य पात्र जोधाबाई के किरदार के लिए दुर्गाखोटे का चयन किया गया.

फिल्म के नाम यानि की मुगल ए आजम का किरदार निभा रहे पृथ्वीराज कपूर ने अकबर के किरदार को जीवंत करके दिखाया.वे कुछ इस तरह से अभिनेता से शहंशाह अकबर बने कि दर्शकों की स्मृति में आज तक अकबर के चरित्र में पृथ्वीराज कपूर की कल्पना ही उभरती है.

हिंदुस्तान के शहंशाह होने और एक भावुक पिता के चरित्र को पृथ्वीराज कपूर ने कुछ इस प्रकार निभाया कि दर्शक एक शहंशाह की मन: स्थिति को पढ़ सकें और उससे स्वयं को जोड़ सकें. एक ऐसे शहंशाह जो राजनीतिक तौर पर दृढ़, सामाजिक तौर पर अविचलित, भावुकता के स्तर पर अपनी भावनाओं को प्रकट होने से रोकने में सक्षम अकबर का चरित्र पर्दे पर जीवंत कर सके यही थे पृथ्वीराज कपूर और के.आसिफ के मुगल ए आजम.

फिल्म में दिलीप कुमार ने बेहद संतुलित अंदाज में ट्रेजडी और रोमांस को निभाया. सलीम और अनारकली का एक दूसरे को देखने के दृश्य परदे पर इतने रोमांटिक बन पड़े कि उन्होंने रोमांस की नई परिभाषाएं लिख दी. अनारकली के किरदार में मधुबाला का चयन उनके फिल्मी कैरियर के लिए मील का पत्थर बन गया. यह वह दौर था जब मधुबाला को एक ऐसी फिल्म की जरूरत थी जो उनके कैरियर को नई ऊर्जा दे सके. ऐसे में मुगल ए आजम ने उनके कैरियर को नई दिशा भी दी और उनके फिल्मी कैरियर को ऊंचाईयां भी. उनकी खूबसूरती फिल्म में बेमिसाल थी वे खूबसूरत प्रतिमा की तरह नजर आ रही थीं. उनके अनोखे रोमांटिक अंदाज, उनकी प्रेम में डूबी आंखें और थरथराते होंठ प्रेम के इतिहास में नए पन्ने लिख रहे थे. आज भी उनके और दिलीप साहब के प्रेम के अंदाज की कॉपी कई फिल्मों में की जाती है.

दुर्गाखोटे के सशक्त अभिनय ने जोधाबाई के पात्र को परदे पर जीवंत कर दिया. उन्होंने पात्र के सभी रंगों के साथ न्याय करते हुए एक भावुक मां और एक शहंशाह की रानी होने की भूमिका को सशक्त तरीके से निभाया. के.आसिफ की सृजन कल्पना अपने आप में अद्वितीय थी. अकबर और सलीम के दृश्यों, महलों, युद्घों के सैटस बेहद भव्य और कलात्मक थे. विशेष तौर पर फिल्म के नृत्यों का फिल्मांकन एवं सलीम अनारकली के प्रेमदृश्य बेहद खूबसूरत बन पड़े थे. इनमें नए प्रयोग किए गए. फव्वारों की कतारों के साथ, शाही अंदाज और मुगलकालीन भव्यता में फिल्माई गई कव्वालियां एवं मोमबत्ती की रोशनी के साथ सलीम अनारकली के प्रेमदृश्य पर्दे पर सम्मोहन पैदा करने में कामयाब रहे.

मुगल ए आजम अपने भव्य निर्माण के लिए आज भी अद्वितीय मिसाल के तौर पर स्थान रखती हैï. फिल्म की कॉस्टयूम उस समय दिल्ली से तैयार होकर आती थी जबकि कॉस्टयूम पर होने वाली कारीगरी, दिल्ली और सूरत के कारीगरों द्वारा करवाई जाती थी. फिल्म के कलाकारों द्वारा पहने गए आभूषण हैदराबाद से तैयार कराए जाते थे. फिल्म में प्रयोग किए गए हथियारों का निर्माण राजस्थान के लोहारों द्वारा करवाया गया था. फिïल्म में युद्घ के दृश्यों को फिल्माने के लिए ८००० सैनिक, ४०० घोड़े और २००० ऊंटों का प्रयोग किया गया था. फिल्म का गीत संगीत फिल्म का मजबूत और खूबसूरत पक्ष रहा. फिल्म के संगीतकार नौशाद थे, जो संगीतकारों में आज भी मुगल ए आजम के नाम से जाने जाते हैं. नौशाद ने मुगलेआजम में वो संगीत तैयार किया जिसने फिल्म और नौशाद दोनों को अमर कर दिया. फिल्म के एक एक गीत का संगीत बेजोड़ है. फिल्म में कव्वालियों, ठुमरी का प्रयोग किया गया है जो फिल्म को क्लॅासिक बनाता है. फिल्म की दो कव्वालियां प्रेम जोगन बन के, और शुभ दिन आयो रे उस्ताद बड़े गुलाम अली खान साहब के स्वर से सजी है, फिल्म में चार चांद लगाती हैं नौशाद जी का इस फिल्म में दिया गया संगीत उनके और के.आसिफ साहब की मेहनत और शोध को दर्शाता है. जो कि उन्होंने फिल्म को मुगलकालीन दर्शाने के लिए किया. सैटस से लेकर संगीत तक से फिल्म को मुगलकाल में पहुंचा दिया. फिल्म में दिलीप कुमार पर कोई भी गीत नहीं फिल्माया गया था. इसी ख्याल को जेहन में रखते हुए नौशाद जी ने मोहब्बत जिंदाबाद गीत रफी साहब की आवाज में फिल्म में रखा जो कि दर्शकों को फिल्म में रफी साहब की आवाज सुनाने के साथ साथ मोहब्बत में विद्रोह के स्वर को भी आवाज देता है. नौशाद साहब के संगीत की खासियत फिल्म का कोरस होता था इस फिल्म के लिए उन्होंने १०० खूबसूरत, मीठे स्वरों को कोरस में शामिल किया. बिना कोरस गहरे आश्चर्य में डाल गया फिल्म का मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोए गीत जिसमें कोरस का प्रयोग बिल्कुल भी नहीं किया गया था.

ये वो दौर था जब शमशाद बेगम से हटकर लोगों को लता मंगेशकर की आवाज खींच रही थी. लेकिन इस दौर में भी नौशाद इस ऐतिहासिक फिल्म में अपनी पसंदीदा गायिका शमशाद के गायन को जगह देने से स्वयं को रोक नहीं पाए और तेरी महफिल में किस्मत आजमा के हम भी देखेंगे लता के साथ उनका भी स्वर श्रोताओं को सुनने को मिला. लता मंगेशकर ने इस फिल्म से अपने लिए तत्कालीन गायिकाओं से आगे मंजिल बनाई. उन्होंने साबित किया कि उनकी आवाज सभी तरह के गायन के लिए बेमिसाल हैï. फिर चाहे वह ठुमरी हो, कव्वाली हो, या अन्य कोई बंदिश. लता की आवाज में नौशाद के संगीत से सजे फिल्म के गीत हिन्दी सिनेमा के इतिहास का सुनहरा पन्ना बन गए.

फिल्म के गीतों ने शकील बदायूनी के बोलों में आत्मा डाल दी थी. गीत मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोए का आखिरी मिसरा देखिए..खबर क्या थी होठों को सीना पड़ेगा, मोहब्बत छुपा के भी जीना पड़ेगा, जिए तो मगर जिंदगानी पे रोए.

फिल्म के तकनीकी पक्ष की बात की जाïए तो फिल्म पहले श्वेत श्याम बनाई गई थीï. इस फिल्म में फिल्म के निर्माता शाहपोर जी फिल्म को रंगीन प्रदर्शित करना चाहते थे.परंतु डिस्ट्रीब्यूटर इसके लिए और इंतजार नहीं करना चाहते थे. अत: फिल्म को ब्लैक एंड व्हाइट में ही रीलीज किया गया. बाद में वर्ष २००२ में मुगल ए आजम रंगीन बनाकर पुन: प्रदर्शित की गई और आधुनिक काल में भी सफल हुई.


nadim parmar
नदीम परमार.

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