महिला आजादी के मायने…


आजादी एक ऐसा शब्द है जो इस धरती पर आने वाला हर प्राणी चाहता है चाहे वह जंगल में रहने वाला कोई जानवर हो या आसमान का पंछी, फिर मनुष्य का तो ये पूरा अधिकार है कि वो आजादी के साथ अपना जीवन जी सके .ये भी अवश्य है कि एक सभ्य समाज के निर्माण के लिए आजादी के साथ कुछ अनुशासनबद्धता भी आवश्यक होती है .सवाल इस अनुशासन और उसके नियमों का है ये कितने , किस रूप में होने चाहिए ? ये नियम समाज के हर व्यक्ति के लिए समान होने चाहिए या नहीं ? ये समानता किस आधार पर होनी चाहिए ? क्या ये नियम, जाति, धर्म, भाषा और उससे भी अलग लिंग के आधार पर बनने और लागू होने चाहिए ?

श्रीमती विमला साबू

अखिल भारतीय माहेश्वरी मंडल की पूर्व अध्यक्षा श्रीमती विमला साबू ने “महक ” को बताया कि महिलाएं भी पुरुष की तरह समाज का अभिन्न अंग हैं .परिवार में बेटी का जन्म भी उतनी ही खुशी का मौका लाता है जितना बेटे का. आज समाज लड़कियों के महत्व को समझने लगा है, लड़कियों को शिक्षा का पूरा अधिकार मिलना चाहिए. लड़कियों की शिक्षा अत्यंत आवश्यक है. उनके शिक्षित होने से पूरे परिवार का वे सही ढंग से , वैज्ञानिक सोच से, परिवार का पालनï-पोषण कर पाती हैं . नई पीढ़ी की सही और सच्ची मार्गदर्शक बन सकती हैं . रही बात वस्त्रों और अन्य पारंपरिक नियमों की, तो वे तो स्वंय ही काफी ढीले हो चुके हैं. वस्त्र चाहे स्त्री के हों या पुरुषों के, शरीर की सुरक्षा के लिए बने हैं उन्हें आरामदायक और देखने वालों की निगाहों में अच्छे लगने वाला होना चाहिए.

गांवों में महिलाएं लहंगा पहनती हैं, ओढऩी से सिर ढकतीं हैं तो पुरुष भी धोती कुर्ता पहनकर सिर को पगड़ी से ढकते हैं. असमानता की कोई बात ही नहीं है. व्यवसाय में भी यही सोच हैं मेरी ,यदि आर्थिक आवश्यकता हैं तो महिला के कार्य पर किसी तरह की पाबंदी नहीं होनी चाहिए. आज लड़कियां पढ़-लिखकर ऊंचे-ऊंचे पदों पर कार्य कर रही हैं. देखकर अच्छा लगता है.

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माहेश्वरी महिला मंडल की वर्तमान अध्यक्षा श्रीमती लक्ष्मी मालपानी कहती हैं कि शिक्षा हमें लोगों को समझने में , उनको जानने में सहायता करती है. शिक्षित लड़की सामान्य कार्य को औरों से बेहतर तरीके से कर सकती है.

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अग्रवाल महिला मित्र मंडल की भूतपूर्व अध्यक्षा श्रीमती स्नेहलता अग्रवाल के अनुसार महिला की आजादी अत्यंत आवश्यक है इसी से समाज का पूरा विकास हो सकता है. आज महिला पुरुष के बराबर कार्य कर रही है. हर रोज आगे बढ़ रही है. आप कोई भी क्षेत्र देखें, व्यवसायिक क्षेत्र में तो महिलाएँ आगे आ ही रही हैं लेकिन इससे भी पहले वो सामाजिक क्षेत्र में पुरुषों से आगे हैं, समाज हो, पारिवारिक कार्यों को संपन्न करना हो, उत्सवों को मनाना हो, सभी कार्य महिलाएँ पूरी सफलता के साथ संपन्न करती हैं. रात को बाहर निकलने की बात का सीधा संबंध सुरक्षा से है. महिलाओं को शिक्षा देने से वे परिवार को सही ढंग से चला पाती हैं अपनी संतान को सही ढंग से मार्गदर्शन दे सकती हैं. महिला की आजादी का अर्थ मेरी नजर में उनको सही और अच्छी शिक्षा मिलना ही है.


श्रीमती मधु अग्रवाल
अग्रवाल समाज महिला मंडल की वर्तमान अध्यक्षा श्रीमती मधु अग्रवाल के विचारों में शिक्षा का अधिकार सभी का अधिकार है चाहे वह लड़की हो या लड़के, शिक्षा कोई फैशन नहीं जीवन की आवश्यकता है. महिलाएं और पुरुष आज दोनों ही घर से बाहर के क्षेत्रों में भी बराबरी से कार्य कर रहे हैं. कोई छोटा या बड़ा नहीं है घर में लड़कियां और लड़कों दोनों में  किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं किया जाता है.जितना खर्चा लड़कों की शिक्षा ओर अन्य पर होता है उतना ही लड़कियों पर. समान आरामदायक स्थितियों और जीवन के साधन मिलते हैं और मिलने भी चाहिए. हां, बाहर घूमने फिरने की एक निश्चित समय के बाद  जाने की अनुमति न देने का कारण सिर्फ उनकी सुरक्षा है और ये तो आजकल लड़कों के ऊपर भी लगाया जाने वाला नियम है.

श्रीमती संध्या राठौड़


स्केट इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर श्रीमती संध्या राठौड़ के अनुसार महिलाओं को शिक्षित होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से स्वावलंबी अवश्य होना चाहिए. उनमें जो भी योग्यता है उसका उपयोग करें. इससे न केवल पहचान बनती है वरन आत्मविश्वास भी कई गुना बढ़ता है

श्रीमती कल्पना काबरा
फैशन इंस्टीट्यूट निफ्ट की संचालिका एवं प्रोफेसर श्रीमती कल्पना काबरा के अनुसार महिलाओं को शिक्षा,व्यवसाय की आजादी तो आवश्यक है ही साथ ही सबसे बड़ी आवश्यकता है उनके निर्णय का सम्मान करने की, उन्हें निर्णय लेने की आजादी देने की, उनके निर्णय को मानने की. जब महिला शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो सिर्फ तभी उसे निर्णय लेने का अधिकार हो ऐसा नहीं होना चाहिए. वरन गृहणियों को भी उनके जीवन के निर्णय लेने की पूरी आजादी होनी चाहिए. साथ ही परिवार के मुख्य निर्णयों  में भी उनकी सक्रिय भूमिका होनी चाहिए.
दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की कॉर्डिनेटर एवं एसोसिएट प्रोफेसर  डॅा. कल्पना राव इस सिलसिले मे पूछने पर कहती हैं कि  सही मायने में आजादी का अर्थ क्या है? यह समझना समाज, देश के विकास के लिए जरूरी है. सतही तौर पर देखा जाए तो किसी भी इंसान को पूरी तरह आजादी मिलना संभव ही नहीं है. देश के कुछ नियम होते हैं जो कि देश के सही संचालन के लिए आवश्यक होते हैं. इसी तरह बेहतर जीवन के भी कुछ कायदे होते हैं.
   
डॉ.कल्पना राव
 हम सभी अपने उन प्रतिदिन के कर्तव्यों से किसी न किसी रूप में बंधे हुए हैं जो कि अभिभावक पत्नी, पति, बच्चों और अन्य संबंधियों से संबंधित हैं लेकिन समाज में पुरुषों के बनिस्पत महिलाओं के जीवन की एक निश्चित अवधारणा बनी हुई है. माना जाता है कि महिला का जन्म ही घर की सार संभाल  एवं विवाह के पश्चात पति, बच्चों और सास-ससुर की देखभाल करने के लिए ही हुआ है. उसको पूरी तरह अपने कार्यों और मन दोनों से ही अपनी गृहस्थी या विवाह पश्चात परिवार के लिए समर्पित होना ही चाहिए. यही उम्मीद उसकी भाभी से उसके माता-पिता के परिवार के लिए की जाती है कोई भी महिला एवं परिवार इसका अपवाद नहीं है.
    घर एक ऐसी जगह है जिसकी नियमित देखभाल होनी चाहिए, खाना रोज बनना चाहिएबाजार से सामान आना चाहिए, बच्चों की देखभाल होनी चाहिए. फिर इस कार्य  को करने में गलत क्या है? सामान्य तौर पर लोग यहीं कहेंगे, गलत इन कार्यों को करना नहीं है वरन इन कार्यों का योग्यता के आधार पर न होकर ,लिंग के आधार पर होने वाला वर्गीकरण है. इन कार्यों को सिर्फ महिला की ही जिम्मेदारी मानना गलत है.
    समाज की अवधारणा है कि महिला की पहली प्राथमिकता अपने परिवार की सारसंभाल की तरफ होनी चाहिए. उसकी शिक्षा, व्यवसाय, शौक, करियर सभी दूसरे नंबर पर होते हैं. ऐसे में एक लड़की जो खेलों में अपना भविष्य देखती हो, जिसे गीत-संगीत में आगे बढऩा हो, या वह पर्वतारोही बनना चाहती हो, सेना में जाना चाहतीï हो, एक पायलट के रूप में आसमान छूना चाहती हो, एक सशक्त पुलिस अधिकारी या प्रशासनिक अधिकारी के रूप में अपनी कार्यक्षमता सिद्ध करना चाहती हो ,तो उन्हें ये सभी कार्य जीवन में दूसरे नंबर पर रखने होते हैं.
     एक महिला पूरी तरह आजाद मानी जाएगी यदि उसे अपनी ऐसी इच्छाओं को पूरी करने के लिए सार्वजनिक एवं सहज अनुमति हो.परिवार की देखभाल महत्वपूर्ण है, इस तथ्य से न तो इनकार किया जा सकता है न ही इसकी अवहेलना की जा सकती है. लेकिन परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी परिवार के सभी सदस्यों की बराबर होनी चाहिए. योग्यता और क्षमता के अनुसार कार्य का निर्वाह किया जाना चाहिए. परिवार के सभी सदस्य मिलजुल कर परिवार के कर्तव्यों का निर्वाह करें, ऐसी धारणा समाज में विकसित होनी चाहिए.जिस दिन यह सोच हमारे समाज में परिलक्षित होगी वह महिलाओं की आजादी का पहला और सबसे बड़ा कदम होगा.
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इस लेख का सारांश यही सामने आता है किï सभी महिलाएं चाहे वे किसी भी क्षेत्र से संबंधित हों, चाहे वे नौकरी करती हों या व्यवसाय या वे गृहिणी हो, परंतु सभी एकमत से महिला आजादी, उसके अधिकारों और समाज के समान नियमों की पक्षधर हैं.

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