महक रिश्तों की

बात तब की है जब हमारा परिवार राजस्थान के पाली जिले के एक गांव में रहता था. पिताजी चिकित्सक हैं इसलिए उनकी पोस्टिंग सामान्यत: गांवों में होती थी. हमारे ताऊजी एवं बुआजी का परिवार अलीगढ़ उत्तरप्रदेश में होने के कारण हम अपनी अधिकांश छुट्टियां वहीं बिताते थे.

ऐसी ही एक गर्मियों की छुट्टियों में हम सभी अलीगढ़ गए हुए थे. हम अपनेï ताऊजी के घर पर रूके थे. एक दिन हमसे मिलने हमारे फूफाजी आïए. उन्होंने अगले दिन हम तीनों भाई-बहनों को मिठाई और चाट खाने के लिए दुकान पर आने को कहा.

अगले दिन हम तीनों भाई बहन जिनकी आयु १२ वर्ष, १० वर्ष एवं ६ वर्ष थी. सुबह जल्दी तैयार होकर उनकी दुकान पर जाने को चल दिए. घर से निकलने से पूर्व ही हम तीनों भाई बहन आपस में योजना बना रहे थे कि हम क्या क्या खाएंगे.मुझे समोसे खाने थे भाई को जलेबी छोटी बहन को गोलगप्पे. ऐसी ही योजनाओं परï बातचीत करते हुए हम फूफाजी की दुकान पर ९.३० बजे पहुंच गए. फूफाजी ने हमें दुकान में बैठाया और पूछा क्या खाओगे? हमने जोर से अपनी अपनी मांग उनके सामने रख दी. फूफाजी बोले पहले समोसे मंगा लेते हैं एक एक करके सब कुछ मंगाएंगे मिलजुलकर खानाï. हम ने सहमति दर्शाई. थोड़ी देर तक जब फूफाजी ने समोसे नहीं मंगवाए तो हमने कहा, फूफाजी समोसे. वे बोले अरे, मैं सोच रहा हूं पहले गर्मागर्म जलेबी मंगाते हैं. हमने कहा ठीक है. इस बीच १०.३० बजे चुके थे हमें भूख लग रही थी. हमने फूफाजी को याद दिलाया तो वे बेाले अरे पहले याद दिलाना चाहिए था. अब तो जलेबी खत्म हो गई होंगी. चलो कोई बात नहीं समोसे मंगाते हैं. कहकर वे दुकान से बाहर चले गए. हम फूफाजी और समोसों दोनों का इतंजार करते रहे. लगभग आधा घंटे बाद फूफाजी खाली हाथ वापस आए और बोले भई समोसों में बहुत मिर्ची है और बाकी गर्म नाश्ता भी खत्म हो चुका है. ऐसा करो तुम लोग कल जरा जल्दी आना. तुम्हें समोसे और जलेबी खिलाऊंगा. हम तीनों भाई बहन चेहरा लटकाकर उदास मन से घर की ओर लौट पड़े.

घर पहुंचने पर हमने सबको अपनी आपबीती सुनाई. सब जोर जोर से हंसने लगे. ताईजी ने ठंडा सत्तु और आलू के परांठे खाने को दिए. हम सोच रहे थे कि लौट के बुद्घू घर को आए. आज फूफाजी हमारे बीच नहीं हैं परंतु जब भी ये घटना याद आती हैï बरबस ही हंसी फूट पड़ती है.

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बात उन दिनों की है जब हम ग्वालियर मध्यप्रदेश में रहते थे. मैं उस समय ७ वर्ष की आयु की थी और मेरा छोटा भाई आशीष ३ वर्ष की आयु का था. बारिश के दिïन थे. हल्की हल्की बारिश हो रही थी. नियमित रूप से सब्जी बेचने वाला आया हुआ था. मेरी मां भी उससे सब्जी खरीदने बाहर सडक़ पर आई हुई थी. तभी उनके पीछे मेरा छोटा भाई भी आ गया. जब सब्जी वाला सब्जी बेच रहा था तभी वहां एक कुत्ते का पिल्ला आ गया. मेरा भाई उसके पीछे पीछे चल दिया उसी समय बारिश भी तेज हो गई. सामने रोड पर मेनहोल का ढक्कन खुला हुआ थाï. भाई बिना देखे चलता जा रहा था इससे पहले कि कोई उसे रोकता वो खुले हुए मेनहोल में गिर गया. सभी चीखने लगे. सब्जी वाला तेजी से मुड़ा और उसने भागकरï मेनहोल में डूबते हुए भाई के बालों को पकड़ लिया. फिर ताकत लगाकर उसके सिर को खींचा और भाई को बाहर निकाल लिया. तुरंत भाई को पास के अस्पताल में ले गए जहां प्राथमिक चिकित्सा के पश्चात उसे छुट्टी दे दी.

आज भी उस अनजान सब्जी वाले की याद करके पूरे परिवार के मुंह से उसके लिए हृदय से उदगार निकलते हैं.

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मेरे मामाजी बड़े ही शांत प्रकृति के एवं सुलझे हुए इंसान थे. वे प्रत्येक बात को बहुत ही आसान तरीकों से समझाते और समस्याओं को आसानी से सुलझाते थे. बात उन दिनों की है जब मेरे छोटे मामाजी की शादी तय हुई. शादी दिल्ली से होनी थी और हम सभी रायबरेली उत्तरप्रदेश से दिल्ली रेल यात्रा के द्वारा जाने वाले थे.

सफर पूरे दिन का था. हम सभी ट्रेन में बैठ गएï. ट्रेन चल पड़ी थी. सभी बच्चों में सीट को लेकर झगड़ा होने लगा. झगड़ा काफी लंबा हो गया और बच्चे जोर जोर से शोर कर रहे थे. मामाजी तैयारियों की वजह से काफी थके हुए थे इसलिए वे ट्रेन में आते ही सो गए थे. इतने शोर में हमने इसका ख्याल नहीं रखा तभी अचानक मामाजी उठे और बिना कुछ कहे, बिना कुछ सुने उन्होंने सभी बच्चों को एक एक चांटा लगा दिया. बच्चे हतप्रभ रह गए, कोई कुछ समझ ही नहीं पाया.इसके बाद मामाजी वापस सो गए. बच्चे अब एकदम चुप थे. डब्बे में बिल्कुल शांति थी. ये देखकर हमारे बाकी रिश्तेदार हंसने लगे.

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