महक रिश्तों की

मेरी मौसीजी का बेटा आशीष बहुत ही हाजिर जबावी है. एक बार मैं और वो किसी काम से बाजार जा रहे थे. तभी उसे याद आया कि उसके जूते का तला टूटा हुआ है तो उसने चप्पल पहन ली और रास्ते में जूते को ठीक करने को डाल दिया. जब हम अपने काम को खत्म कर वापस लौट रहे थे तब उसने स्कूटर मोची के पास रोका और ठीक किया हुआ जूता वापस मांगा. मोची ने जूते को देते हुए कहा दस रूपए हुए. भैया तुरंत बोला 10 रूपए काहे के काका? इसमें तुमने दो कीलें ठोंकी हैं दो रूपए बनते हैं पांच रूपए ले लो दस रूपए बहुत ज्यादा हैं. इस पर मोची अपने पास खड़े दूसरे व्यक्ति की तरफ मुंह घुमाकर उससे कहने लगा-दस रूपए कैसे ज्यादा हुए, कील आती हैं, ठोंकना पड़ता है, धागा लगता है, अब १० रूपए तो बनते ही है इस पर आशीष बोला- तुम उधर उनकी तरफ मुंह करके काहे बात कर रहे हो काका? पैसे वो देने वाले हैं क्या? ठीक है तो फिर हम चलते हैं. ये सुनते ही मोची और उस दूसरे व्यक्ति का चेहरा देखने लायक था.

श्वेता गुप्ता

बात मेरे विवाह के कुछ समय बाद की है. मैं व मेरे पति सूरत में रहते थे. मेरी ससुराल राजस्थान में है. उन दिनों हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी परतुं मुझे अपनी आर्थिक परेशानी किसी को बताना अच्छा नहीं लगता था.

उस समय मैं बरतन साफ कर रही थी मेरी ननद हेमा मुझसे बोली बरतन वाली बाई होनी ही चाहिए. मैंने कहा वो तो ठीक है पर वो अच्छे से बतरन साफ नहीं करती है इसलिए मैंने कामवाली नहीं लगा रखी है. अगले दिन हेमा ने अपने चाय के कप को छुपा दिया जब सारे बर्तन मैंने साफ कर दिए उसके कुछ समय बाद वे अपने कप को पानी से हल्का साफ करके लाई फिर बोली आप कहती हैं काम वाली गंदे बर्तन धोती हैं आपने भी कितना गंदा कप साफ किया है. मैं आश्यर्च से उसका चेहरा देखती रह गई.

रुचि मित्तल

बहुत पुरानी मेरे बचपन की एक याद है तब मैं इंदौर में रहती थी और हमारा स्कूल मनोरमागंज में था. ये बात सन १९८० की है. हमारे साथ एक लडक़ा पढ़ता था. उसका नाम विजय था. विजय बहुत शरारती था. हम सभी कक्षा के बच्चे लंच टाइम में खाते थे. वह अपना लंचबॉक्स चलती क्लास में खा लेता था और लंच टाइम में दूसरे विद्यार्थियों का टिफिन छीन कर खाता था. इससे हम भूखे रह जाते थे. ऐसे समय में जिनका टिफिन बच जाता था वे आपस में मिलजुलकर खाते थे. ये लंचटाइम आज भी याद आता है.

किरन गुप्ता

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