महक रिश्तों की

बात उन दिनों की है जब हम जयपुर में रहते थे और मेरी शादी नहीं हुई थी. मेरे परिवार में हम तीन बहनें और दो भाई हैं , मेरे छोटे भाई की शादी होने के बाद उनकी पोस्टिंग गुडग़ांव ( हरियाणा) में थी. कॉलेज की छुट्टियों के दिन थे भाई जयपुर आए हुए थे मैं उनके साथ गुडग़ांव चली गयी.लगभग बीस दिनों के बाद मेरा वापस लौटने का कार्यक्रम बना भाई ने मुझे बस में बैठा दिया बस सीधी जयपुर जाती थी, मेरी अटैची कंडक्टर ने सामने रख दी मैं रस्ते भर अटैची को देखकर ध्यान रख रही थी बीच में एक बार मेरी हल्की सी झपकी लग गयी जब आँख खुली तो देखा मेरी अटैची वंही जगह पर रखी थी मैं निश्चिन्त हो गयी , घर पंहुचने पर अटैची खोलने पर देखा उसमें सिर्फ कागज़ भरे हुए थे मेरा काफी नुकसान हो गया था मैं बहुत उदास हो गयी और थोड़ा डर भी गयी मुझे लगा अब सब मुझे डांटेंगे , लकिन मेरी माँ ने मुझे प्यार से कहा कोई बात नहीं ऐसी घटनाएँ सभी के साथ कभी न कभी होती हैं इनसे सबक सीखना चाहिए , हमें तो इस बात की ख़ुशी है की तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचा सामान का क्या है और आ जाएगा. आज मेरी माँ इस दुनिया में नहीं हैं लकिन उनकी ऐसी कितनी ही ढेरों बातें हैं जो उनकी सीख के रूप में हम अगली पीढ़ी को पंहुचा रहे हैं.

अलका गौतम ( अलीगढ़)

मेरे भाई की शादी कोटा राजस्थान में तय हुई थी ,मैं दिल्ली में रहती थी. हम तीनों बहनों में एक अकेला भाई होने की वजह से हम तीनों ही इस शादी के लिए बहुत उत्साहित थीं. उसकी शादी के बाद पता लगा कि लड़की इससे पहले भी एक शादी कर चुकी है जब इस बारे में उसके माता पिता से बात की गयी तो उसने हमारे पूरे परिवार के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज़ कर दी.

हमारे परिवार पर दहेज़ के लिए सताने का आरोप लगाया , लगभग दो साल तक हमारा पूरा परिवार इस स्थिति से गुज़रता रहा आखिरकार उनके परिवार को काफी रुपया देकर हमने इस मुसीबत से छुटकारा पाया.आज भी उस दुःख की त्रासदी के निशान हमारे परिवार पर लगे हुए हैं और हम सोचते हैं जो कानून महिला की सुरक्षा के लिए बने हैं उनका किस तरह दुरुपयोग हो रहा है ऐसे तो कोई किसी महिला का विश्वास भी कैसे करेगा ?

निधि सक्सैना (दिल्ली)

बच्चों की गर्मियों की छुट्टियां हो गईं हैं दो दिन में ही वे कहने लगे हैं हम बोर हो रहे हैं और पूरा दिन वे टीवी ,मोबाइल और कंप्यूटर पर गुज़ारते हैं उन्हें देखकर मुझे लगबघ तीस वर्ष पुराने अपने बचपन के दिन याद आने लगे हैं जब विद्यालय की वार्षिक परीक्षाएं समाप्त होते ही हम अपनी माँ के साथ अपने ननिहाल रुड़की (यू. पी.) चले जाते थे और पूरी छुट्टियां अपने ममेरे भाई बहनों के साथ मस्ती करते खेलते कूदते गुज़ारते थे , दिन भर गर्मियों की कड़क धूप में पेड़ों की छांव मैं गुल्ली- डंडा खेलना , नीचे बिखरे हुए जामुन और छोटी कच्ची कैरियां बीनना, ढेर सारे कॉमिक्स पढ़ना. छुट्टियां कँहा और कैसे गुज़र जातीं थी पता ही नहीं लगता था , नानाजी ढेर सारे आम लाते जिन्हें आँगन में पानी मैं भिगोकर रख देते थे और हम सब वंही बैठकर उन्हें मिलजुल कर खाते, अब सब कुछ बदल चुका है फ्लैट्स में रहने और वक़्त को टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर और कंप्यूटर गेम के साथ गुज़ारने वाले इन बच्चों को देखकर लगता है इनके जीवन का असली आनंद कँहा खो गया है ? 

हेमा गर्ग (अजमेर)

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