महक रिश्तों की

जनवरी का महीना था सर्दियों के दिन थे. मैं अजमेर से बस द्वारा टौंक जा रही थी. मेरे साथ मेरा डेढ़ वर्षीय पुत्र और सामान का एक बड़ा बैग था सुबह पौने छह बजे की बस थी. ठण्ड और कोहरे की वजह से लोग जैकेट पहन कर और कम्बल ओढ़ कर बैठे थे. सारी सीटें भरी हुईं थीं मुझे बच्चे और बैग के साथ देखकर भी किसी ने भी जगह नहीं दी ना ही कोई अपनी सीट से उठा. मैं बहुत परेशान हो रही थी बस के धचकों के कारण खड़ा नहीं हुआ जा रहा था बस के फर्श पर नीचे बैठने की कोशिश की तो ठण्ड और धचकों के कारन वह भी संभव नहीं हो पाया. मेरा बेटा भी काफी रो रहा था. तभी एक सज्जन जो की सीट पर बैठे थे उन्होंने अपना एक बैग जो कि कम्बलों से भरा हुआ था ( शायद वे व्यापारी थे ) मुझे देते हुए कहा “आप इस पर बैठ जाएँ.” मैं धन्यवाद देते हुए उस पर बैठ गयी गर्म के साथ नरम होने के कारण ही मैं अपने बच्चे के साथ उस पर  बाकी बचे सफर को  आराम से तय कर सकी. उतरते समय मैनें ह्रदय से उन्हें धन्यवाद दिया. आज भी जब वो घटना याद आती है तो मेरे मन से उनके लिए स्वयंमेव धन्यवाद निकलता है   —– श्वेता गुप्ता

बात तब की है जब मैं मेरे भाई की शादी में शामिल होने के लिए जा रही थी चूंकि हम सूरत गुजरात में रहते हैं इसलिए गणगौर एक्सप्रेस से मेरा आरक्षण था. रात ग्यारह बजे की ट्रेन थी मैं विवाह से एक माह पूर्व जयपुर जा रही थी. मेरे पास ग्यारह हो गए थे और साथ मेँ डेढ़ वर्षीय मेरी बेटी थी. मैं अकेली ही जा रही थी, पति बाद मेँ आने वाले थे वे स्टेशन छोड़ने आए थे सारा सामान ट्रेन मेँ व्यवस्थित रा दिया था मेरी बर्थ नीचे की थी मैं अपनी बेटी के साथ वहाँ बैठ गयी. पूरा कोच आरक्षित था वे सभी खाटू श्यामजी जा रहे थे. ट्रेन चलने पर वे भजन करने लगे गानों के शोर से मेरी बेटी रोने लगी, ये देखकर उनमें से एक सज्जन ने कहा दूसरी बोगी मेँ हमारी एक सीट है आप वहाँ आराम से बैठ सकती हैं इस पर मैनें सहमति दे दी. सभी लोग इस बात से सहमत नज़र आए वे बोले बूढ़े, बच्चे और महिलायों का हम विशेष तौर पर ध्यान रखते हैं आप चिंता न करें हम आपका सामान आपके पास बर्थ पर पहुंचा देंगे. इस पर मैं उन्हें अपना सामान दिखाने लगी एक ये ,एक ये, मैं ये बता ही रही थी तभी एक युवा लड़के ने हँसते हुए पूछा दीदी आप के कितने नग हैं मैनें कहा ग्यारह , बस फिर क्या था उसने मस्त मौला अंदाज़ मेँ नारा लगाया “एक सीट ग्यारह नग, दीदी जातीं अपने घर” सभी लोग मस्ती मेँ ये नारा दोहराने लगे मुझे भी खूब हंसी आई .आज भी रेल यात्रा मेँ किसी के पास ज्यादा सामान देखती हूँ तो वह घटना याद आ जाती है और बरबस ही चेहरे  पर हंसी आ जाती है —  रजनी जैन

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