महक प्रवाह

प्रिय पाठको , 
अगस्त का महीना समाप्त हो चुका है लेकिन बारिश का दौर जारी है. बारिश यानि की उम्मीद ! लेकिन वर्तमान की समभावनाओं पर नज़र डाली जाए तो ये बारिश उम्मीद की जगह मौत और तबाही का पर्याय बन रही है. कितने ही लोग इस की चपेट में आकर काल के ग्रास बन चुके हैं. इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? मनुष्य या प्रकृति ? प्रकृति का प्रत्येक रूप अपने सामान्य रंग में प्राणिमात्र के लिए तोहफा है परन्तु सीमा से अधिक या कम होते ही यह विपदा में परिवर्तित हो जाता है.  

प्रकृति का एक चक्र बना हुआ है. प्रत्येक प्राणी को इस चक्र में चलना होता है, प्रकृति के साथ चलना होता है प्रकृति सदैव कार्य का परिणाम ही देती है. प्रकृति के पास अपना कुछ नहीं है मनुष्य को देने के लिए, जो भी है वह मनुष्य के किए कार्यों का परिणाम ही है. ठीक न्यूटन के क्रिया प्रतिक्रिया के नियम की तरह, यह प्रकृति का मूल और वास्तविक नियम है. सीधी सी बात है इसे कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है, नदियों में लगातार डाली गयी गंदगी और उसके बहाव की राहों में खड़े किये गए अवरोध, उसके बहाव को अवरूद्ध करते हैं और थोड़ी सी बारिश आते ही वह मनुष्य के द्वारा उसमें डाली हुई गंदगी उसे वापस दे देती है यानि हिसाब किताब बराबर . 

प्रकृति के इस संतुलन को हमें समझना होगा और अपने प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष सभी प्रयास इस संतुलन को बनाये रखने के लिए ही करने होंगे बेहतर होगा. हम अभी संभल जाएँ और प्रकृति के मूलभूत तत्वों के साथ छेड़ छाड़ न करें. अपनी आगामी पीढ़ियों को भी इस उद्देश्य के साथ जीना सिखाएं. मनुष्य को मिली ये धरती और प्रकृति अनुपम और आश्चर्यजनक तोहफे हैं, जिनको उसे संभाल कर रखना है. जीवन के अंतिम और मुख्य उद्देश्य को मानव मात्र और इस प्रकृति की भलाई ही बनाना है तभी मनुष्य जीवन की सार्थकता होगी. गणपति की विदाई के साथ प्रकृति के संरक्षण की शपथ लें .
शुभ कामनाओं के साथ, 





  स्नेह के साथ,किरन संजीव 

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