मकर संक्राती

प्रत्येक वर्ष मनाई जाने वाली मकर संक्रांति को कॉलोनी के बच्चों ने अपनी सृजनात्कता और नए विचार के साथ सही मायने के पतंगोत्सव में बदल दिया.

‘निशा निशा’

“निशा तेरी मम्मी तुझे बुला रही है.” वंदना ने निशा से कहा. निशा खड़ी होकर इधर उधर देखने लगी. उसकी मां उन लोगों की तरफ ही आ रहीं थीं और उसे आवाज भी दे रही थीं. ‘‘हां मां.’’ निशा बोली.

‘‘घर चलो बेटा, आठ बजने वाले हैं, पापा घर आ गए हैं. खाना भी खाना है. चलो, बेटा घर चलो.’’

‘‘ओके फ्रैंड्स कल मिलते हैं.’’ कहकर निशा मां के साथ चल दी. बाकी सारे बच्चे भी खड़े होकर आपस में एक दूसरे को बॉय कहते हुए अपने घर की ओर चल दिए.

राजन, निशा, वंदना, मधु, रवि, शिना, आनंद, नीरज सभी बच्चे बहुत खुश थे.

ये सभी बच्चे शहर की एक कॉलोनी में रहते थे. रोज शाम को साथ में खेलने के लिए इकटठे होते और खूब मस्ती करते.

सभी उत्सवों को साथ में मनाते, सभी मिलजुलकर रहते थे. आज सभी बच्चे इकटठे होने पर आने वाले 14 जनवरी यानि की मकर संक्रांति को कैसे मनाना है, पर बातचीत कर रहे थे. सभी ने अगले दिन शाम छह बजे कॉलोनी के पार्क जोकि उनकी खेलने की निश्चित जगह थी पर मिलने का कार्यक्रम तय किया और निश्चय किया कि कल वहीं पर मकर संक्रांति को मनाने के तरीके पर निर्णय लिया जाएगा.

अगले दिन शाम छह बजने से कुछ पहले ही सभी बच्चे कॉलोनी के पार्क में इकटठे होने शुरू हो गए. थोड़ी देर में ही सभी बच्चे आ चुके थे. राजन ने सभी को गोल घेरे में बैठ जाने को कहा, इससे वे सभी एक दूसरे की बातें आसानी से सुन सकते थे. सभी के बैठ जाने पर समीर ने बात शुरू करते हुए पूछा ‘‘इस बार मकर संक्रांति पर हमें क्या करना है?’’

शिवा बोली ‘‘यही सोचने के लिए हम सब यहां एकत्रित हुए हैं.’’

मनु बोला ‘‘मां बहुत सारे तिल के लड्डू बनाने वाली हैं. हम सब मिलकर खाएंगे.’’

‘‘तुझे खाने के अलावा और कोई आइडिया आता है तो बता’’ रवि बोला.

सभी बच्चे हंसने लगे. मेघना बोली ‘‘मेरी मां भी दाल के गरमागरम बड़े बनाने वाली है मुझे तो

वही बहुत अच्छे लगते हैं चटपटे और स्वादिष्ट.’’ “फिर वही खाने की बात” ‘‘अंतरा झुंझलाकर बोली.

‘‘अरे, खाने की बात करनी ही पड़ेगी ना’’ रघु बोला.

राजन उन सभी में बड़ा था. वह आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था. वह सबसे समझदार भी था. उसने सभी को शांत करते हुए कहा ‘‘बिल्कुल खाएंगे भी, लेकिन मकर संक्रांति हम बच्चों के लिए पतंग का दिन होता है. पूरे दिन पतंगें उड़ाने का मजा हम सभी इसी दिन ले पाते हैं. एक तो स्कूल की छुट्टी, दूसरे घर में मम्मी पापा भी इस दिन के लिए हमें पतंगें दिलाते भी हैं और उन्हें पूरे दिन उड़ाने की छूट भी देते हैं’’, इस बात पर सबने सहमति जाहिर की.

वंदना बोली ‘‘ राजन मेरे पास एक आइडिया है, क्यूं न इस बार हम कुछ ऐसा करें जो हमारे लिए यादगार हो जाए.’’

‘‘ठीक कहा तुमने, पर ऐसा क्या करना चाहिए’’ निशा बोली.

‘‘हम पतंगें हर बार खरीद कर लाते हैं क्यूं ना इस बार हम उन्हें खुद बनाएं.’’ ‘‘ ग्रेट आइडिया ’’ नीरज तुरंत बोला.

‘‘इसमें तो बहुत मजा आएगा.’’ आनंद ने कहा ‘‘इस मजे को हम और बड़ा कर सकते हैं यदि ये पतंगें बनाकर हम इनका स्टॉल लगाएं और उन्हें बेचें. उन पैसों से कॉलोनी के पीछे बनी बस्ती के गरीब बच्चों को पढ़ाई करने का सामान खरीद कर दें.’’

‘‘वाऊ फिर तो सचमुच मजा आएगा’’ सौम्या बोली.

‘‘परंतु क्या हमारे माता पिता हमें इसकी इजाजत देंगे?’’ मनु बोला. ‘‘बिल्कुल हर अच्छे काम के लिए मम्मी पापा हां ही करते हैं’’ आनंद बोला. ‘‘तो तय रहा कि हमारा इस बार की मकर संक्रांति का उद्देश्य यही रहेगा’’ राजन बोला.

‘‘पर ये सब होगा कैसे?’’ रवि ने पूछा.

‘‘इसके लिए हमें अपने समूह बनाने होंगे जो अलग अलग कार्य करेंगे, प्रत्येक ग्रुप का एक लीडर होगा, बाकी बच्चे उसकी बात मानेंगे. हमें ये कार्य दस जनवरी तक खत्म करके स्टॉल लगाना होग राजन ने सभी को बताया. इसके बाद उसने अलग अलग कामों के लिए बच्चों के समूह बना दिए.

घर लौटते समय सभी बच्चे बहुत खुश थे. उन्होंने घर जाकर अपने मम्मी पापा को सारी बातें बताई और उन्हें अगले दिन कॉलोनी के क्लब हाउस में सुबह पहुंचने के लिए कहा. अगले दिन सुबह सभी लोग ग्यारह बजे कॉलोनी के क्लब हाउस में पहुंच गए वहां सभी बच्चे पहले से ही मौजूद थे. राजन ने सभी बड़ों को बिठाया और फिर उन्हें विस्तार से बच्चों के द्वारा मकर संक्रांति को मनाए जाने के बारे में बताया.

सभी लोग बहुत खुश हुए और सभी ने बच्चों को पूरा सहयोग देने का वायदा किया. बस फिर क्या था. बच्चे काम में जुट गए.

घरों से रंगीन पेपर, लकडिय़ां, सैलोटेप, गोंद, लेई, कैंची वगैरह लाकर क्लब हाउस में काम में जुट गए. सभी बच्चे समूह में काम कर रहे थे . एक समूह लकडिय़ों को छीलकर पतली कर रहा था. एक समूह कागजों को अलग अलग डिजाइनों में काट रहा था. एक समूह उन कटी हुई पंतगों पर डिजाइन बना रहा था. कोई चित्र बना रहा था, एक समूह पतंगों पर लकडिय़ाँ चिपका रहा था. इस तरह देखते देखते पांच दिनों में पांच सौ से ज्यादा पतंगें बनकर तैयार हो गई. बड़े लोग, बच्चों के मम्मी पापा उनका लगातार उत्साहवर्धन कर रहे थे. वे उनके खाने पीने का पूरा ध्यान रख रहे थे. मकर संक्रांति से कुछ दिन पहले बच्चों ने पतंगों का स्टॉल लगाया, लोगों ने उनसे खूब पतंगें खरीदीं. राजन ने सभी चीजों का हिसाब किताब संभाला. बारह तारीख की रात को बैठकर सबने पैसों का बक्सा देखा उसमें ८००० रूपए आ चुके थे. मनु ने सीटी बजाई. रवि बोला ‘‘हिप हिप हुर्रे’’

अगले दिन सभी बच्चों ने बड़ों से सलाह करके गरीब बस्ती के बच्चों के लिए पेंसिल, रबर, पेन, स्केल, कॉपी, किताब, नक्शे खरीदे और साथ में अपने हाथों से बनाई पतंगे भी रखीं. मकर संक्रांति के दिन सुबह सभी बच्चे तैयार होकर अपने कुछ बड़ों के साथ बस्ती में गए. वहां जाकर उन्होंने बच्चों में इन सभी सामान को बांटा. गरीब बच्चे इस सामान के मिलने से बेहद खुश थे. फिर सभी ने साथ मिलकर थोड़ी देर पतंगे भी उड़ाई.

बच्चों ने बस्ती के बच्चों को अपने हाथों से बनाई पतंगें भी भेंट की. दोपहर तक बच्चे वापस चल दिए. थके हारे बच्चे भूखे थे. बच्चों ने देखा कॉलोनी में शामियाना लगा हुआ है. वहां से संगीत की आवाजें आ रही थीं. कालोनी के कुछ बड़े लोग उन्हें कॉलोनी के शुरू में ही मिल गए. उन्होंने बच्चों को अपने पीछे आने को कहा. वे बच्चों को शामियाने में ले गए. बच्चों ने देखा वहां व्यंजनों की खुशबू आ रही थी. बड़ों ने सभी बच्चों को बैठाया और उन्हें गर्मागर्म पूरी, सब्जी, बड़े, चटनी और तिल के लड्डू परोसे, बच्चों की खुशी का ठिकाना न था. वे खाने पर टूट पड़े. राजन ने पूछा ‘‘अंकल ये सब आप लोगों ने कब? कैसे?’’

अंकल ने सभी बड़ों की तरफ देखा और हंसकर बोले ‘‘हमारे बच्चे इतना अच्छा काम करें तो बड़ों का भी तो उनको कुछ सरप्राइज देने की बात बनती है ना.’’

मनु जोर से बोला ‘‘अंकल पार्टी तो बनती है.’’ सभी ठहाका मारकर हंस दिए. सभी बच्चे बहुत खुश थे. उनकी आज की मकर संक्रांति उन्हें जीवन भर याद रहने वाली थी.
श्वेता गुप्ता

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