भारतीय सिनेमा के रंग विदेशों में – २

भारतीय फिल्मों का जादू विदेशी धरती पर भारतीय फिल्में जिन्होनें हॉलीवुड तक अपना प्रभाव छोड़ा. विदेशी धरती और उसके दर्शक भी भारतीय सिनेमा के आकर्षण से बंधे इन फिल्मो देखते रहे हैं –  नदीम परमार.

80 के दशक में भारतीय सिनेमा करवट ले रहा था. एक तरफ अमिताभ, धर्मेन्द्र के तेवरों से सजा व्यवसायिक सिनेमा, दूसरी तरफ अति यर्थाथवादी कला सिनेमा जिसे ओमपुरी, नसीर, शबाना और स्मिता पाटिल जैसे कलाकार अपने अभिनय से नई पहचान दे रहे थे. ऐसे में एक और धारा का सिनेमा बीते एक दशक से न केवल अपनी जगह बना रहा था वरन अपनी पहचान और लोकप्रियता भी स्थापित कर चुका था. सादगी, स्वस्थ हास्य के साथ जीवन के हल्के फुल्के पहलूओं पर बनी ये फिल्में कम बजट की और खासी लोकप्रिय हो रहीं थीं.
बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित ऐसी ही एक फिल्म थी ‘‘छोटी सी बात’’ जो कि 1975 में प्रदर्शित हुई थी, भारत में दर्शकों द्वारा काफी सराही गई थी. फिल्म की कहानी एक सीधे सादे व्यक्ति द्वारा अपने प्रेम का इजहार और उसमें सफलता पाने के लिए एक कोच की सहायता लेने पर आधारित थी. फिल्म में सीधे-सादे शर्मीले अरूण का किरदार निभाया था अमोल पालेकर ने जबकि विद्या सिन्हा ने उसकी प्रेमिका यानि प्रभा का पात्र जिससे अरूण अपने प्रेम का इजहार करना चाहता है निभाया था. इसमें एक सहकलाकार भी थे असरानी जो कि इसमें सहज मौजूद थे फिल्म में अमोल, नागेन्द्र नाथ यानि अशोक कुमार का सहारा अपने प्रेम का इजहार करने के लिए लेते हैं और फिल्म एक खट्टे-मीठे हास्य के साथ दर्शकों के समक्ष आती है फिल्म की कॉपी की, हॉलीवुड निर्देशक एंटी डेनांट ने फिल्म ‘‘हिच ’’ के द्वारा.
2005 में आई ‘‘हिच ’’  फिल्म में डेटिंग कोच एलेक्स हिच यानि विल स्मिथ अपने क्लाइंट अलबर्ट की मदद करते हैं एलेगरा को पाने में, हालांकि अशोक कुमार वाले रोल को विस्तार देने के लिए युवा विल स्मिथ को लिया गया और बताया कि लव डेट कोच बनने के कारण न सिर्फ उसकी पसंदीदा लडक़ी सारा उससे बात करना बंद कर देती है बल्कि उसकी कोई भी ट्रिक सारा पर काम नहीं करती, जबकि छोटी सी बात फिल्म में अमोल पालेकर द्वारा अशोक कुमार का सहारा लेने की खबर जब प्रभा को होती है तो वह उसे छोड़ देती है फिर दौर शुरू होता है मानने-मनाने का और फिल्म एक हल्के फुल्के स्वस्थ मनोरंजन के साथ खत्म होती है और भारतीय फिल्मों की भावना प्रधान कहानियों की सार्थकता को साबित करती है.
डर(1993) – फीयर (1996)
       भारतीय नाट्य शास्त्र के नवरस में से एक रस ‘‘डर’’ पर आधारित थी 1993 में आई फिल्म ‘‘डर’’ यश चोपड़ा द्वारा निर्देशित डर एक ऐसी प्रेमकहानी पर आधारित थी जो त्रिकोणीय थी और एक त्रिकोण एक तरफा तो था ही साथ ही मनोरोगी भी था. जेम्स फोले द्वारा निर्देशित फिल्म ‘‘फीयर’’ में  ‘‘डर’’के राहुल यानि की शाहरूख खान का पात्र ‘‘ मार्क ’’ ने निभाया है और फिल्म में इस पात्र का नाम है डेविड. अभिनेत्री जूही चावला के द्वारा निभाए गए किरन के किरदार को निकोल नाम से विदरस्पून ने निभाया है फर्क सिर्फ इतना है कि निकोल किसी और के प्रेम में पडऩे के बजाए डेविड के करीब आ जाती है पिता स्टीफन डेविड की मानसिक बीमारी और उसके पागलपन को देखते हुए उसे निकोल से दूर रहने के लिए बार बार कहते हैं.
फिल्म में सनी देओल यानि सुनील का किरदार नहीं है बल्कि सिर्फ डर है. फिल्म का नाम भी डर का अंग्रेजी तर्जुमा फीयर है. यही नहीं डर फिल्म की तरह न सिर्फ डेविड निकोल के लिए पागल है बल्कि वैसे ही अपने सीने पर निकोल गुदवाता है जैसे डर के राहुल ने किरन नाम गुदवाया था फिल्म के अंत में निकोल के पिता स्टीफन बेटी को डेविड के डर से बचा लेते है ‘‘डर’’ यश चोपड़ा की साइकोलॉजिकल थ्रिलर है जिसे जेम्स फॉले ने अपने अंदाज में कॉपी किया है.
रंगीला (1995)- तिन अ डेट विद (टैड हैमिल्डन 2004)
रंगीला फिल्म की मिली की तरह ‘‘öतिन अ डेट विद (टैड हैमिल्टन) की अभिनेत्री रोजले भी हीरो टैड की दीवानी है रोजले स्वंय एक छोटे कस्बे की लडक़ी है. रोजले के बचपन का दोस्त पेते भी रोजले को प्यार करता है लेकिन रोजले इसे समझ नहीं पाती है. कुछ घटनाओं के साथ फिल्म आगे बढ़ती है. फिल्म के रोमांटिक दृश्य रंगीला की तरह हॉट हैं. अंत में रोजले, पेते के प्यार को पहचान जाती है दोनों एक हो जाते हैं. फिल्म हुबहु रंगीला का हॉलीवुड अवतार है.
ऐसी ही कुछ और फिल्मों के बारे में हम बात करेगें अगले अंक में, ऐसी भारतीय फिल्मों के बारे में जिन्होनें भारत की सीमा से आगे हॉलीवुड तक अपना प्रभाव छोड़ा. विदेशी धरती और उसके दर्शक भी भारतीय सिनेमा के आकर्षण से बंधे इन फिल्मो की नकल करते और देखते रहे हैं .

नदीम परमार.

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