भारतीय सिनेमा के रंग विदेशों में

अक्सर भारतीय फिल्मों ,उनके निर्देशकों ,संगीतकारों पर विदेशी फिल्मों कि नक़ल का आरोप लगता रहता है,लकिन ऐसा सिर्फ भारतीय सिनेमा के साथ हो ऐसा नहीं है कई विदेशी फ़िल्में भी हैं जो भारतीय फिल्मों कि या तो फ्रेम दर फ्रेम नक़ल हैं या फिर उनसे प्रभावित .ऐसी ही कुछ विदेशी फिल्मों से हम आपका परिचय कराने जा रहे हैं प्रस्तुत है उसकी पहली किश्त —नदीम परमार 

27 वर्षीय जापानी युवा मोतोकि जब भारत पहुँचा तो भारतीय आबोहवा की महक के साथ तरह तरह के रीति-रिवाजों, संस्कारों की हवा भी उसकी नज़रों से बहती हुई मस्तिष्क और ह्रदय की धमनियों में बहने लगी. लगातार दस वर्षों के अध्ययन के पश्चात उसने पारम्परिक संस्कार विधियों पर फिल्म बनाने के बारे में सोचा.

अंततः परिणाम के रूप में बड़े पर्दे पर आई ” द डिपार्चर्स ” जो की जापान की लगभाग लुप्त प्रायः हो रही दाह संस्कार विधि नोकांशी पर आधारित थी और जिसने इस प्रथा को पुर्नजीवित करने में निर्णायक भूमिका अपनाई . फिल्म में चरित्र एक दूसरे से ज्यादा बातचीत नहीं करते.

उनकी अंतरंगता न कहने में ही होती है. फिल्म के दृश्यों में अंतिम विदा के दृश्य रिश्तों को पुर्नजीवित करते हैं नई ज़िन्दगी देते हैं दरअसल व्यवहारिक ज़िन्दगी में भी कुछ ऐसा ही होता है. हम किसी भी रिश्ते को दिल के करीब तभी सबसे ज़्यादा महसूस कर पाते हैं जब वे हमसे कभी न लौटने जितना दूर चले जाते हैं वर्ष 2008 में आई इस फिल्म के मुख्य नायक ” दाइजो ” की भूमिका स्वयं मोतोकी ने निभाई है.

81 वें अकादमी अवॉर्ड में इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषाई फिल्म का पुरस्कार मिला . मोतोकी ने फिल्म से संबंधित दिए गए साक्षात्कारों में बताया कि भारत में गंगा घाट पर देखे दाह संस्कारों से उन्हें इस फिल्म को बनाने की प्रेरणा मिली थी.

संगम (1964) – पर्ल हार्बर (2001)

1964 में भारतीय सिनेमा में हलचल मचाने वाली राज कपूर द्वारा निर्देशित संगम दो दोस्तों , गोपाल और सुंदर , की कहानी है जो वक़्त के अलग अलग हिस्सों में एक ही लड़की से प्यार करते हैं वर्ष 2001 में आई अमेरिकन फिल्म पर्ल हार्बर संगम से पूरी तरह प्रेरित है रैफ और डैनी दो दोस्त बचपन एक साथ ही बिताते हैं वे एक साथ कबाड़ के सामान में रखे हवाईजहाज पर चढ़कर दुश्मन को मार गिराने का खेल खेलते हैं .

यही खेल आगे चल कर दोनों का पेशा बन जाता है. वे दोनों वायुसेना में कर्नल बन जाते हैं तभी रैफ एवलिन नायिका से मिलता है और प्रेम भी करता है रैफ को जापान द्वारा पर्ल हॉर्बर पर हमले के दौरान मिशन पर भेजा जाता है रैफ वापस नहीं आता है रस्ते में ही प्लेन क्रैश होने पर उसके मारे जाने की सूचना मिलती है ठीक संगम के सुन्दर के मारे जाने की सूचना की तरह. इसके बाद डैनी और एवलिन की नज़दीकियां बढ़ जाती हैं संगम के गोपाल और राधा के दृश्यों की तरह. तब अचानक, एक दिन रैफ वापस आ जाता है, दोस्ती टूटती है, लड़ाइयों के शोर में खामोशियां बढ़ जातीं हैं

इस बार जापान के साथ युद्ध में रैफ और डैनी दोनों ही मिशन पर जाते हैं जहाँ डैनी अपनी जान पर खेलकर रैफ को बचाता है मरते समय डैनी, रैफ से अपने और एवलिन के बच्चे का पिता बनने का वादा ले लेता है. रैफ और एवलिन फिर एक हो जाते हैं संगम के सुन्दर और राधा की तरह.

दो आँखें बारह हाथ (1957)- द डर्टी डजन (1967)

व्ही. शांताराम की क्लॉसिक भारतीय सिने इतिहास की मील का पत्थर फिल्म दो आँखें बारह हाथ बनने के दस साल बाद अमेरिकन फिल्म निर्देशक रॉबर्ट एल्ड्रिन ने उसी मूल कथानक पर द डर्टी डजन फिल्म बनाई. एक फिल्म में बारह हाथ हैं तो दूसरी में बारह लोग.

सज़ायाफ्ता अपराधियों को सुधारकर समाज की मूल धारा में शामिल करने की कहानी को व्ही. शांताराम ने पूरी तरह जी कर बनाया था. फिल्म के अंतिम दृश्य की शूटिंग के दौरान बैलों से लड़ते समय व्ही. शांताराम बुरी तरह घायल हो गए थे. इसी प्रकार द डर्टी डजन में मेंजर रीसमन को बिगड़ैल और फांसी की सजा का इंतज़ार कर रहे सेना के बारह सिपाही मिलते हैं उन्हें एक सीक्रेट मिशन के लिए रीसमन के हवाले किया जाता है दोनों फिल्मों में फांसी की जगह सुधार की बात की गयी है दोनों ही फिल्मों अपने अपने देश की क्लॉसिक फिल्में बनीं.

नदीम परमार.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *