भाजपा की जीत हिमाचल मेंपक्की


भाजपा की जीत हिमाचल मेंपक्की

मतदाता एक ना एक पार्टी को इस अंदाज में सत्ता की बागडोर थमा रहा है कि बाकी पार्टियां खेल के मैदान में नहीं बल्कि दर्शक-दीर्घा में बैठी नजर आ रही हैं वे विपक्ष न रहकर विपक्ष का नाम मात्र रह रही हैं

बीते तीन सालों में 20राज्यों में चुनाव हुए हैं. इनमें 8राज्यों में भाजपा/एनडीए को जीत हासिल हुई है. शेष 12 राज्यों में विपक्षी दलों की जीत हुई है. अगर भाजपा की जीत की झोली में हम गोवा और मणिपुर को भी जोड़ दें तो भी आंकड़ा 10-10 की बराबरी पर आ टिकता है. सो, प्रचलित धारणा के उलट बीते तीन सालों में भारत में हुए चुनावों का नतीजों के लिहाज से रुझान भाजपा और विपक्षी दलों के बीच 50:50 का रहा है.

जाहिर है, जीत एकतरफा भाजपा की नहीं हुई. लेकिन पंजाब को छोड़ दें (क्योंकि यहां कांग्रेस कैप्टन अमरिंदर सिंह की लोकप्रियता के कंधे पर सवार होकर सत्ता में लौटी. साथ ही, ऐन चुनावी वक्त में यह देखकर कि आम आदमी पार्टी खालिस्तान समर्थक कुछ तत्वों के साथ खिचड़ी पका रही है, आरएसएस के कुछ कार्यकर्ताओं ने जमीनी गणित को समझते हुए कांग्रेस की मदद की); तो बाकी राज्यों के चुनाव देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के लिए उस अपमानजनक हार का दुख बढ़ाने वाले ही साबित हुए जिसकी शुरुआत 2014 के लोकसभा चुनावों में हुई थी.

हिमाचल प्रदेश में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में कुछ ऐसा खास है तो जरूर है कि बात रोजमर्रा के एंटी-इनकंबेंसी की हदों में ना रहकर उससे कहीं आगे जाती लग रही है.

देश में बीते कुछ सालों से या कह लीजिए 2014 के बाद से चुनाव के नतीजों का मिजाज चौंकाने वाला रहा है. इसकी शुरुआत तेलंगाना में टीआरएस (तेलंगाना राष्ट्र समिति) की जीत के साथ हुई जहां कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया और वह एकदम से तीसरे स्थान पर जा पहुंची. वोटों को एकतरफा उड़ा ले जाने वाला ऐसा ही चुनाव कुछ तटवर्ती राज्यों मे नजर आया जब ममता बनर्जी और जयललिता ने दोबारा सत्ता की बागडोर संभाली, साथ ही पिनराई विजयन केरल में मुख्यमंत्री बने.

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई में भाजपा ने महाराष्ट्र, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में वोटों की  फसल काटी और यूपी तथा उत्तराखंड में तो उसने जीत ही हासिल नहीं की बल्कि एक तरह से पूरी बिसात पलट दी.

यह कहना तो खैर एक भूल है कि भाजपा को हर जगह और हर वक्त एक-सी भारी-भरकम जीत हासिल हो रही है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की भारी-भरकम जीत किसी भूकंप से कम नहीं थी और बिहार के चुनावी नतीजे भी भाजपा के लिए चौंकाने वाले रहे. साथ ही, पंजाब में कांग्रेस दस साल के बाद फिर से सत्ता पर काबिज हुई.

इनमें केरल को छोड़ दें तो किसी भी राज्य के बारे में नहीं कहा जा सकता कि वहां लोगों ने सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ (यानि एंटी-इनकंबेंसी) में मतदान किया. यह बात तो उत्तराखंड के बारे में भी नहीं कही जा सकती क्योंकि वहां भाजपा को जो भारी जीत मिली उसकी व्याख्या एंटी-इनकंबेंसी के जुमले के सहारे नहीं की जा सकती.

तो फिर सवाल बनता है कि इन चुनावों में अगर कुछ खास हैतो वो क्या है ? इस सवाल का जवाब छुपा है चुनावी जनादेश के मिजाज में, हर जगह पार्टियों को भारी-भरकम जीत हासिल हुई है. तथ्य ये है कि एक ना एक तरीके से ये जनादेश एकतरफा साबित हुए हैं. चुनावी लड़ाई में हार-जीत के बीच जितना बड़ा अंतर हमने बीते तीन सालों में देखा है वह अप्रत्याशित है. दिल्ली में 70में से 67 सीटें आम आदमी पार्टी ने झटक लीं. उत्तरप्रदेश में भाजपा को 300 से भी ज्यादा सीटें मिलीं.

मतदाता हर वह कुछ कर रहा है जिससे जनादेश निर्णायक साबित हो, वह किन्हीं पार्टियों के बीच अधर में डोलता हुआ ना नजर आए. बेशक जम्मू-कश्मीर मे त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनी लेकिन वहां भी जम्मू में भाजपा को एकतरफा कामयाबी मिली तो पीडीपी को घाटी में. महाराष्ट्र में जनादेश त्रिशंकु की सी स्थिति में दिखा लेकिन यह जनादेश अपने मिजाज के लिहाज से पूरा का पूरा कांग्रेस के खिलाफ था. तो, फिर कह सकते हैं कि भारतीय मतदाता जनादेश को लेकर ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट होता जा रहा है. वह अपना फैसला एक ना एक पार्टी की तरफ निर्णायक ढंग से सुना रहा है,


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