बोर्ड परीक्षा : तनाव से रहें दूर

कई विद्यार्थी बोर्ड परीक्षाओं के तनाव को नहीं झेल पाते हैं  इससे बचने के लिए वे जीवन से पलायन का मार्ग ढूंढ लेते हैं. इसी विषय पर आधारित, इस अंक का यह शीर्ष लेख, लेकर आए हैं अविनाश मिश्रा .

अल्पेश (परिवर्तित नाम) ने बोर्ड परीक्षाओं के तनाव के चलते पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली थी. घर में सभी का रो रोकर बुरा हाल था. मां स्कूल पर आरोप लगा रही थीं, वहीं अल्पेश के दोस्त गगन का कहना था कि अल्पेश पर अच्छे अंक लाने का उसके पिता की तरफ से बहुत ज्यादा दबाव था इस वजह से वह काफी परेशान रहता था.

अल्पेश केवल एक ही नाम नहीं है, कितने ही विद्यार्थी प्रतिवर्ष बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी के दौरान तनाव को नहीं झेल पाते हैं  वे इससे बचने के लिए जीवन से पलायन का मार्ग ढूंढ लेते हैं. प्रत्यक्ष तौर पर इसके लिए विद्यार्थी ही जिम्मेदार नजर आते हैं लेकिन ये एक सामूहिक जिम्मेदारी है. बोर्ड परीक्षा के दौरान बच्चे पर पडऩे वाले मानसिक दबाव के लिए अभिभावक, शिक्षक, परिवार का माहौल, विद्यालय का वातावरण, विद्यालय के इस दिशा में विद्यार्थियों के लिए किए गए सामूहिक प्रयास, मित्रगण, कोचिंग क्लॉसेज का वातावरण सभी इसमें सामूहिक रूप से जिम्मेदार होते हैं. दसवीं और बारहवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं का तनाव सिर्फ विद्यार्थियों पर ही नहीं वरन उनके परिवार पर होता है. भारत में बोर्ड की परीक्षा केवल विद्यार्थी नहीं बल्कि उसका पूरा परिवार देता है. इसी विषय पर आधारित है हमारे इस अंक का यह शीर्ष लेख.
वेसु स्थित अग्रवाल विद्या विहार की सीनियर शिक्षिका सुजाता राव बताती हैं बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए विद्यालय को सत्र के प्रारंभ में ही विद्यार्थियों और उन के परिवार के साथ बोर्ड के पेपर, उन की विशेषता, बोर्ड परीक्षा के परिणाम आदि से संबंधित विस्तृत चर्चा करके उन सभी को मानसिक रूप से तैयार करना चाहिए. सामान्य तौर पर विद्यालयों को अपना पाठयक्रम सितंबर या अक्टूबर माह तक समाप्त कर देना चाहिए जिससे बाद में विद्यार्थियों को रिविजन करने एवं अपनी समस्यायों के समाधान कक्षा में जानने का भरपूर अवसर प्राप्त हो साथ ही विद्यालयों को वर्ष में कम से कम दो से तीन बार बोर्ड परीक्षा की तरह  डमी परीक्षा का आयोजन करना चाहिए जिससे विद्यार्थियों का डर निकल जाए.

विद्यार्थियों को भी  शॉर्टकट का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए. पाठयपुस्तकों से और अन्य पुस्तकों से पढ़ाई करनी चाहिए ताकि विषय वस्तु उन्हें अच्छी तरह समझ आ सके . विद्यार्थियों को उनकी समस्या के बारे में बातचीत के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए. शिक्षकों को धैर्यपूर्वक और सही तरीके से विद्यार्थी की समस्या का समाधान करने का प्रयास करना चाहिए. परिवार में वातावरण शांत होना चाहिए. पढ़ाई का वातावरण होना चाहिए. ज्यादा शोर या लोगों का आना जाना पढ़ाई को बाधित करता है.प्रत्येक विद्यार्थी को पढ़ाई के अतिरिक्त कम से कम आधा घंटा अपनी रूचि के कार्य को करने में व्यतीत करना चाहिए. चाहे वो मनोरंजन हो या खेल या घूमना. जिससे कि उसका तन और मन दोनों पुन: तरोताजा हो सकें और मानसिक दबाव भी कम हो सके.
विद्यालय एवं घर में भी बच्चों के आत्मविश्वास को बढ़ाने की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए. उन्हें लगातार प्रोत्साहित किया जाता रहना चाहिए.विद्यार्थियों को समझना चाहिए कि परिणाम कुछ भी हो लेकिन ये जीवन का एक छोटा सा भाग है जीवन इससे बहुत बड़ा और जरूरी है. उनमें जीवन के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करनी चाहिए.

इस संबंध में मुंबई के अग्रणी कोचिंग सेंटर यूनिवर्सल टयूटोरियल की सूरत शाखा के शिक्षक महेश पंड्या बताते हैं वर्तमान में स्पर्धा का माहौल है जिससे कि विद्यार्थी पर उम्मीदों का दबाव बढ़ जाता है. ये दबाव पारिवारिक ज्यादा होता है. अभिभावक विद्यार्थी की काबिलियत समझे बिना उसे उसके स्तर से ऊंची प्रतियोगी परीक्षा की स्पर्धा में धकेल देते हैं. प्रत्येक विद्यार्थी के अभिभावक उसे आई आईटी या जेईईई में प्रवेश दिलवाना चाहते हैं.जबकि प्रत्येक विद्यार्थी का मानसिक स्तर एवं कौशल अलग प्रकार का होता है. आवश्यक नहीं है कि जो विद्यार्थी आईआईटी नहीं कर पा रहा है वह अन्य क्षेत्र में सफल नहीं होगा. हो सकता है कि उसका कौशल उसे किसी अन्य क्षेत्र में सफलता दिलाए. जरूरत है उन पर बिना दबाव डाले उनकी रूचि और कौशल पहचानने की. तब बोर्ड परीक्षा का दबाव अपने आप ही कम हो जाएगा. दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य है घर में पढ़ाई का माहौïल तैयार करना. घर के सभी सदस्य टेलीविजन देखें, आपस में मजाक मनोरंजन करें और विद्यार्थी से पढऩे की उम्मीद करें, ये असंभव है.
बोर्ड परीक्षा के तनाव को लेकर प्रसिद्घ मनोचिकित्सक डॉ. मुकुल चौकसीते हैं प्रतिवर्ष ऐसे केसों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है . विद्यार्थी पर बढऩे वाले इस मानसिक दबाव का मुख्य कारण हमारा सामाजिक वातावरण है जहां प्रत्येक विद्यार्थी की क्षमता का आंकलन उसके बोर्ड परिणाम से किया जाता है. बोर्ड के परिणाम के आते ही प्रत्येक विद्यार्थी से इस तरह पूछताछ की जाती है जैसे उसने कोई पराधिक कार्य किया है. यदि उसके अंक कम आते हैं तो उसे तुलनात्मक रूप से नीचा दिखाया जाता है. यही कारण हमारे समाज में दिन प्रतिदिन बढ़ती विद्यार्थियों की आत्महत्या या घर से भागने जैसे कारणों के मूल में है.
केवल परिवार ही नहीं, समाज को भी अपनी सोच परिवर्तित करनी होंगी. जीवन अमूल्य है परीक्षा और उसका परिणाम जीवन का एक छोटा सा अंग है. इसमें सफल होना अच्छी बात है. असफल रहना बुरी बात नहीं है. यह एक कार्य है इसमें असफलता के कारण ढूंढकर पुन: प्रयास करना ही इसका उपाय है.
देखा जाए तो हम एक विचार पर पहुंच सकते हैं कि विद्यार्थी का जीवन या घर से पलायन उसकी हताशा और परिवार की उम्मीदों पर खरा न उतर पाने का दुख, समाज का सामना न कर पाने का कारण है. अत: उसे घर में एक शांत, उत्साहपूर्ण शैक्षिक वातावरण प्रदान करने के साथ साथ जीवन का मूल्य समझाना भी अभिभावक और शिक्षक दोनों का उद्देश्य होना चाहिए.

                                                     अविनाश मिश्रा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *