बॉर्बी की छतरी

रानी को बार्बी की छतरी चाहिये थी लेकीन ललिता आर्थिक तंगी के कारण अपनी बच्ची की ईच्छा पूरी नहीं कर पा रही थी. एक दिन अपना बचपन याद करते हुए ललिता ने अपनी बच्ची की इच्छा पूरी कर बार्बी वाली छतरी उसे दिलाने का ïनिश्चय कर ही लिया.  -डी.एन.गुप्ता

बारिश के छींटों से उसका चेहरा पूरी तरह भीग गया था चेहरे पर हाथ घुमा कर उसने मुंह साफ किया और फिर से खिडक़ी से बारिश देखने लगी. बचपन से ही उसे बारिश का मौसम बहुत पसंद है घर के सामने से निकलती हुई काली खुरदुरी सडक़ भी भीग कर चिकनी सुन्दर नजर आ रही थी सडक़ पर बच्चों के झुण्ड के झुण्ड नजर आ रहे थे कुछ बच्चे रेनकोट पहने हुए थे कुछ ने रंगबिरंगी खूबसूरत छतरियों में खुद को छुपा रखा था हँसते खिलखिलाते, बारिश के पानी को जूतों से उछालते, बच्चे बारिश का पूरा आनंद उठा रहे थे.
वो भी खिडक़ी से देखती हुई रानी के स्कूल से लौटने का इंतजार कर रही थी बारिश में भीग ना जाए इससे बचने के लिए उसने रानी को एक रेनकोट दिया था पिछले हफ्ते ही दुकान मालिक ने सभी काम करने वालों को एक एक रेनकोट मुफ्त में दिया था. ललिता ने उसे संभालकर रख लिया था स्वयं के लिए उसे इस्तेमाल करने का तो वो सोच भी नहीं सकती है वही रेनकोट उसने रानी को दे दिया था.
सडक़ पर लड़कियों का एक छोटा समूह गुजरा उसमें से रानी निकली और घर के दरवाजे की और भागी रानी थोड़ा भीगी हुई थी ललिता रानी पर थोड़ा नाराज हुई तुम भीग कैसे गईं, तुम्हें रेनकोट दिया है उसे पहनना चाहिए था
ऊँ हं, रेनकोट, महिलाओं वाला काला कलूटा बेकार सा रेनकोट, मुझे नहीं पहनना, मेरी सारी सहेलियां मुझे चिढ़ाती हैं इसमें चिढ़ाने की क्या बात है भीगने से बचने के लिए रेनकोट तो पहनना ही पड़ेगा न? मुझे रेनकोट पहनना अच्छा नहीं लगता है आपसे कितनी बार कहा है मुझे बार्बी वाली गुलाबी रंग की छोटी बटन वाली छतरी चाहिए और आप ले आईं ये काला कलूटा रेनकोट. रानी की आँखों में पानी आ गया जो उसके बारिश से भीगे गालों पर मिल गया . रानी अन्दर चली गयी.
ललिता ने रानी के लिए थाली में 2 रोटी और सूखे मूंग की सब्जी रखकर उसे खाने को आवाज दी . थाली को देखते ही रानी धीरे से बोली आज फिर वही खाना. बेटा सब्जी दालें सब इतनी महंगी हैं ठीक है यही खा लुंगी.रोटी का कोर तोड़ते हुए रानी बोली माँ मेरी सब सहेलियां सुंदर सुंदर छतरी लाती हैं आप मुझे कब दिलाओगी? ललिता ने रानी की बात का कोई जवाब नहीं दिया. वो उठकर जमीन पर बिछी गुदड़ी पर लेट गई आंखों को बाहों से ढक़कर चुपचाप सोच में डूब गई रानी बहुत ही प्यारी सीधी सी बिटीया है उसे जो खाने को दो वो खा लेती है उसकी आयु के अनुसार वो कुछ विशेष माँग नही करती पिछली वर्ष की बारिश से वो बार्बी वाला छाता माँग रही है उसने एक दिन काम पर से लौटते समय दुकान पर पूछा था 400 रुपये का है ये उसके लिए बहुत ज्यादा था सो उसने वो छाता नही लिया.
उसकी आमदनी भी ज्यादा नही है. पूरे महीने काम करती है तब मालिक 3000 रुपये देता है छुट्टी ले लो तो पगार काट लेता है. सुबह 10 बजे दुकान पर पहुंचना पड़ता है लेकिन  उससे पहले जाकर थोड़ा माल ठीक से देखना करना पड़ता है कपडे की दुकान है सो दिन भर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती है कभी- कभी वह सोचती है इन लोगो पर इतना रुपया आता कहाँ से है जो अपने बच्चों के लिए दो- दो हजार के कपड़े एक बार में ही खरीद ले जाते हैं रात को 9 बजे दुकान बंद हो जाती है सामान समेटते रखते घर पहुंचते दस बज जाते हंै न तो बच्चों के पास बैठ पाती है थके हारे शरीर के साथ बिस्तर पर गिरती है तो उसे कुछ दिखाई सुनाई देना बंद हो जाता है बेहोश व्यक्ति की तरह सुबह तक बेसुध पड़ी रहती है.
पाँचवी कक्षा में पढऩे वाली उसकी बेटी रानी सुबह उठकर घर की सफाई और बर्तन  का काम करके स्कूल जाती है. ललिता का पति रमेश भी एक दुकान पर उसी की तरह काम करता है दोनों मिलाकर घर में सात हजार रुपए लाते हैं जिसमें से खोली का किराया ही पंद्रह सौ रूपये जाता है पाँच सौ रूपये बिजली पानी का, बाकी बचे पाँच हजार रुपयों में से रानी की स्कूल फीस और घर का गुजर बसर ही मुश्किल से हो पता है. एक एक रुपया संभाल कर खर्च करना पड़ता है जिस पर कोई मेहमान या त्यौहार आ जाएँ तो उधारी सिर पर चढ़ जाती है जो कभी उतरती ही नहीं, चढ़ती ही जाती है. पति रमेश कब से पुरानी स्कूटी लेने की सोच रहा है वो भी संभव नही हो पा रहा है उसे साइकिल से जाना पड़ता है ललिता को पैदल क्या करे? महगाई बढ़ती जा रही है पर उनकी पगार तो बढ़ती नहीं है.
आज ललिता को सुबह से ही बुखार हो रहा था इसलिए वो घर पर ही थी.
उसका मन पीछे की और दौड़ चला रानी की आयु की ही थी जब वो अपनी माँ से गुलाबी-नीली फूलों वाली छतरी मांगा करती थी उसकी माँ खेतों में मजदूरी करती थी पिता  थे नहीं 3 बहनों और एक भाई को रोटी मिल जाती थी वही बहुत था सरकारी स्कूल में पांचवी तक पढक़र लिखना पढऩा सीख गए, बस फिर वो भी माँ के साथ खेतों पर काम पर जाने लगी. शादी भी उसके मायके जैसे घर में ही हुई पति आठवीं पास, दुकान पर काम करता था, वह भी कुछ दिनों बाद दुकान  पर जाने लगीï.
गुलाबी-नीली फूलों वाली छतरी जीवन की भागमभाग में पीछे छूट गई लेकिन आंखों में वो सपने की तरह बस गई थी. जब भी किसी  को उस तरह की छतरी में देखती वो मन मसोस कर रह जाती. पीढ़ी बदल गई पर वो छतरी की इच्छा पूरी नहीं हुई क्या यूँही हम पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को अधूरा रखेगें ?
शाम हो गई थी बादल घिरने लगे थे असमान काले मेघों से भर गया था कुछ सोचते हुए वो उठी, पैसों वाला लोहे का डब्बा उठाया, देखा उसमे आठरह सौ रुपए रखे थे, महिना आधा बाकी था कुछ देर सोचती रही फिर रानी को आवाज दी रानी, हाँ माँ होम वर्क करते हुए रानी ने नजर ऊपर की, चल बेटा जरा बाजार का काम है. रानी तुरंत तैयार होकर बाहर आ गई रानी ने आसमान की तरफ देखते हुए पूछा , माँ बारिश आने वाली है हम भीग जायगें, नहीं रे, हम तेरी बार्बी वाली छतरी में छुप जाएगें ललिता ने मुस्कराते हुए कहा. माँ! आश्चर्य से माँ का चेहरा देखते हुए रानी बोली.
चल जल्दी कर छतरी पसंद करने में समय लगेगा. दोनों माँ बेटी हँस दी रानी का चेहरा खुशी से दमक रहा था रानी के चेहरे की खुशी देखकर ललिता के आखों में चमक बढ़ गई और वो तेज-तेज कदम उठाते हुए छतरी की दुकान की ओर चल दी

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