बृज में कान्हा खेलें होली

आया फागुनआई होली।
निकली ग्वाल बल की टोली।।
करते मस्ती हंसी ठिठोली,
बृज में कान्हा खेलें होली।।

श्याम रंग के श्यामल कान्हा।
राधा को न रंग लगाना।।
गोरी देह पे जो रंग लगे तो।
सखी सहली देंगी ताना।।

पिचकारी से रंग क्यों डाला ?
बड़े हो नटखट नन्द के लाला।।
गुलालअबीर लगा राधा को।
लालहरा कहे कर डाला ?

झूठमूठ ही रूठी राधा।
माया यशोदा करूँ दुहाई।।
तेरे लाल ने ग्वालन संग।
कोरी चुनरिया लाल भिगोई।।

मंद मंद मुस्काये श्याम।
चरणो में दिखे चारों धाम।।
विहल हुआ गोकुल धाम।
धन्य हुए हम तुम्हें पाकर श्याम।।

बोली राधा लो मैं हारी।
जीत हुई लो श्याम तुम्हारी।।
तुझ पे जाऊं मैं वारी वारी।
आ गयी लो शरण  तुम्हारी।।

जिस पर प्रेम रंग चढ़ जाये।
उस को दूजा रंग न भाए।।
जब जब एसो फागुन आए।
बृज में कान्हा रास रचाएँ।।

संध्या राठौर

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