बाला सरस्वती

बच्चों को उस तरीके से पढ़ाओ जिससे उन्हें पढ़ाई से प्यार हो जाए न कि पढ़ाई से बेरूखी हो जाए इस अंक के पाखी स्तंभ के लिए बातचीत की गरिमा सिंह ने.
आदर्शवादी विचार तो दुनिया में बहुत लोगों के मिल सकते हैं लेकिन उन विचारों को जीवन में प्रयोग करने वाले बिरले होते हैं. हमारी महक के इस अंक के पाखी स्तंभ के लिए बातचीत करने इस बार हम पहुंचे श्रीमती बाला सरस्वती से मिलने उनके संस्थान ‘‘प्रयास’’ में.
श्रीमती बाला सरस्वती का जन्म भारत की हरी भरी धरती केरल में हुआ. सैनिक पृष्टभूमि का परिवार होने के कारण अनुशासन एवं कड़ी मेहनत के संस्कार बचपन से ही मिले . दक्षिण भारत में जन्म और पिता के देशभर में होने वाले स्थानांतरणों के कारण देश की संस्कृति और वातावरण को समझने का बखूबी अवसर मिला.उनकी स्कूली शिक्षा राजस्थान, उत्तरप्रदेश, देहरादून जैसे राज्यों में पूरी हुई. महाविद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा उन्होंने हैदराबाद विश्वविद्यालय से  पूरी की.
पढऩा और पढ़ाना उनकी रूचि के क्षेत्र है ब वे विद्यालय स्तर की पढ़ाई कर रहीं थी तब से ही अपने आस पास के बच्चों की पढ़ाई में सहायता किया करती थीं. 1990 में एमफिल की शिक्षा समाप्त होने के पश्चात उन्होंने अपना कैरियर केरल के एक विद्यालय में शिक्षण के क्षेत्र से प्रारंभ किया. विवाह के पश्चात सूरत आना हुआ. यहां पति और परिवार का अभूतपूर्व सहयोग उन्हें प्राप्त हुआ. उन दिनों को याद करते हुए वे बतातीं हैं कि मेरी इच्छाओं को देखते हुए मेरे ससुर जी ने मेरा बायोडेटा बनाया और सूरत के सोलह विद्यालयों  में भेजा. सभी सोलह विद्यालयों से प्रस्ताव आया जिनमें से मैंने रॉयन इंटरनेशनल को चुनकर उसमें शिक्षिका के तौर पर अपना कैरियर प्रारंभ किया.
बच्चों को उस तरीके से पढ़ाओ जिससे उन्हें पढ़ाई से प्यार हो जाए न कि पढ़ाई से बेरूखी हो जाए. मेरे पढ़ाने के इस तरीके से प्रभावित होकर मुझे प्रदेश भर में फैले रॉयन के छह अलग अलग विद्यालयों का हैड बना दिया गया.कुछ वर्षों के अध्यापन के पश्चात मैं महसूस करने लगी की मुझे शिक्षण में कुछ सार्थक करने की जरूरत है. समाज में बच्चों का एक वर्ग ऐसा भी हे जो मुख्यधारा के बच्चों से थोड़ा पीछे है जिसे समझने में, समझाने में सामान्य बच्चों की तुलना में थोड़ा ज्यादा समय लगता है.
इसी विचार के साथ ” प्रयास “ की स्थापना की गई
प्रयास उन विद्यार्थियों के लिए सहज सुलभ शिक्षण संस्थान है जिन्हें मुख्य धारा के विद्यालयों ने ये कहकर ठुकरा दिया कि वे दूसरे बच्चों की तरह नहीं हैं.वर्ष 2005 में मात्र पांच विद्यार्थियों से प्रारंभ हु प्रयास में आज तक सौ से अधिक विद्यार्थियों को शिक्षित किया जा चुका है. शिक्षकों का चयन विद्यार्थियों की रूचि और पसंद के आधार पर होता है.
इसके साथ ही  ” वेदास “ का गठन किया गया जिसका उद्देश्य शिक्षकों को सही मायने में शिक्षण के लिए तैयार करना है. सिर्फ पाठयक्रम पूरा करना एक शिक्षक का कार्य नहीं है वरन विद्यार्थी की योग्यता पहचानकर उसका सही दिशा में विकास करना उसे एक मुकम्मल शिक्षक बनाता है.  बाला सरस्वती के परिवार में पति और एक पुत्री है.
उन्होंने अपनी बेटी की शैक्षिक आजादी का पूरा समर्थन करते हुए उसे मनपसंद विषयों के साथ पढऩे दिया. इसके लिए बेटी ने जब राष्ट्रीय ओपन विद्यालय बोर्ड से पढऩा चाहा तो उन्होंने इसका पूरा समर्थन किया. आज वह बड़ौदा विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ले रही है.
शिक्षण क्षेत्र के अतिरिक्त खेलों में उनकी काफी रूचि है. वे राष्ट्रीय स्तर बॉस्केटबॉल टीम की सदस्य खिलाड़ी रह चुकी हैं.
शिक्षा के क्षेत्र में एक अनोखा और क्रांतिकारी कदम उठाकर मिसाल कायम करने वाली बाला सरस्वती को उनके भविष्य के प्रयासों के लिए शुभकामना देते हुए हमने उनसे विदा ली.

गरिमा सिंह

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