बारिश का रिश्ता पत्तों से

रिश्ता है बहुत पुराना, बारिश का.
अनकहा तराना, बारिश का,
इस धरा से, गगन के पंखियों से,
प्यासे कंठो से, सूखे नयनों से,
रिश्ता है बहुत पुराना, बारिश का.
वृक्षों के लहलहाते हरे, पीले पत्तों से,
वृक्षों की प्यासी जड़ों से,
शाख के प्यासे पत्तों से,
रिश्ता है बहुत पुराना, बारिश का.
ढूंढ़ ही लातीं हैं जड़ें अपने लिए,
धरा की गोद में छिपी, दो बूंद पानी की,
जाएँ कहाँ ? ढूढ़ें कहाँ ? दो बूंद पानी की,
रिश्ता है बहुत पुराना, बारिश का.
शाख पर टंगे पीले होने को तैयार, वो हरे पत्ते,
धूल भरी आंधियां जेठ की, चेहरा ढक जाती हैं,
बदरंग कर जाती हैं, उन को जो होते हैं हरे पत्ते,
रिश्ता है बहुत पुराना, बारिश का.
बरगद, पीपल हों या नीम,
अशोक, गुलमोहर या हो पलाश,
सभी की है अधूरी प्यास,
रिश्ता है बहुत पुराना, बारिश का.
तरसते हैं इनके पात पात,
पाने को दो बूंद बरसात,
प्यास बुझा दे वो बरसात,
रिश्ता है बहुत पुराना, बारिश का.
उमड़ते – घुमड़ते देख मेघा,
झूमता है शाख का हर पत्ता,
करतें हैं खुला इशारा, पाने को बरसात,
रिश्ता है बहुत पुराना, बारिश का.
फिर फिर रिझाते, फिर फिर बुलाते,
रूक जाते, ठहर जाते,
बदरा फिर न, आगे जा पाते,
रिश्ता है बहुत पुराना, बारिश का.
मेघों में बजता मृदंग, दामिनी करती नर्तन,
नई उमंग जगाते, जीवन खिलाते,
प्यासे पत्तों की युगों से मेघ,प्यास बुझाते
रिश्ता है बहुत पुराना, बारिश का.
                                                    — कामिनी

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