फिर से चिट्टी तुम्हें लिखी है नए साल में

जाने कैसे बीत गए, चुप चुप इतने दिन

फिर से चिट्टी तुम्हें लिखी है नए साल में.

वे ही बातें, उतना सा ही कहना सुनना.

बस अक्षर पहले से सुंदर.

पास पास में गूंथ दिए, छोटे छोटे अनगढ़, मोती, सतरों के अंदर.

पाटी-स्लेट छोडक़र, लाइनदार पन्नों में, पेन से अब करने लगी लिखाई .

अब मुझ पर से धूप उतरते देर लगाती है, छू लेती हूं चौखट की पूरी ऊंचाई.

दिन हल्दी हो जाता अपनी देखभाल में.

बौराई आमों की डाली, जामुन फलता रहा निरंतर.

खिली चांदनी रस लपेटकर, महुवे टपका किए रात भर.

अब मैं ही ज्यादा नहीं बोलती, चुप रहती हूं आते जाते.

पर कोलाहल ही कोलाहल करता है, चित्त जाने किस नाते.

अपना ही प्रतिबिम्ब अपरिचित लगने लगता.

चाल ढाल में, रूप रंग में आईने में, अनजाने ख्वाबों सा लगने लगता.

पक्की सडक़ों पर परछाई, कॉलेज के मैदानों में घनी दूब पर कुछ बतियाती है, छुप जाती है शरमाती है.

धनहर खेत पसर कर आती हवा चिकोटी भर जाती है .

फिर कुछ देर नजर झुक जाती है.

रंग बिखेरते दृष्टि जिधर भीï, मन हिरनी को भटकाती है.

भीगी दूब गुदगुदा तलवे, हौले हौले उकसाती है.

बस, मां ही कहने लगती बिटिया तू उलझी किस भरम जाल मे .

फिर से चिट्टी तुम्हें लिखी है नए साल में.

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