फिर छिड़ी आज बात बूंदों की

 कवियों की कविता हो या किसानों की चौपाल, बारिश की बात के बिना अधूरी है. भारत में तीन ही मौसम होते हैं मानसून पूर्व, मानसून और मानसून के बाद. बारिश का मौसम शुरू हो चुका है तपती धरा और करोड़ों देशवासियों की टकटकी आसमान की और लगी है. काले मेघों और बूंदो का इंतजार है दक्षिण में मेघों ने धरा की प्यास बुझा दी है महाराष्ट्र और गुजरात में भी बादलों ने बारिश की झड़ी लगा रखी है. लेकिन उत्तरभारत की धरा अभी भी काले मेघों का इंतजार कर रही है, गर्मी से लोग बेहाल हैं. इस बार मौसम विभाग ने अच्छे मानसून की भविष्यवाणी की है. पिछले दो वर्षो से लगातार सूखे के हालात से कुम्हलाते देश को राहत की आस है.

प्यासे खेतों को संजीवनी चाहिए, प्यासे कंठो को अमृत. बाजार भी इन्हीं मुनाफे की बूंदो की बाट जोह रहा है. मौसम की करवट समूचे मानव जीवन को प्रभावित करती है.
15 % पानी शेष , देश के 91 मुख्य जलस्त्रोंतों में जून के अंतिम पखवाड़े में. 09 % ही पानी शेष दक्षिण के जलस्त्रोंतों में, 23 % शेष उत्तरी क्षेत्र में 105 % कम बुवाई हुई है खरीफ की इस बार पहले वर्ष की तुलना में .

सरकार सिंचाई के आधार ढांचे को ठीक ठाक करने में जुटे होने की बात कर रही है लेकिन बरखा इस सरकारी कवायद का इंतजार नहीं करती है. मानसून चल पड़ा है अपनी मदमस्त चाल में, कहीं धीमा तो कहीं तेज रफ्तार से. मौसम विभाग महाराष्ट्र के किसानों को सलाह दे रहा है कि वे अपने खेतों में बुवाई थोड़ा देर से करें. स्थिति सुधरने के आसार नजर आ रहे हैं. केरल में झमाझम बारिश का दौर शुरू हो चुका है. महाराष्ट्र और गुजरात भी भीग रहे हैं लेकिन देश के अन्य हिस्सों को अभी भी मानसून की राहत भरी फुहारों का इंतजार है. पिछले वर्षों कमजोर मानसून का बड़ा कारण अलनीनो का प्रभाव था प्रशांत महासागर में गर्म जलघाराओं के कारण मानसून के बादलों का पानी सूख गया था. इस बार मौसम वैज्ञानिक प्रशांत महासागर में ला नीना की भविष्यवाणी कर रहे हैं यानि ठंडी जलधाराएँ प्रशांत महासागर के पानी को शीतलता प्रदान कर रही है इसे बेहतर मानसून से जोड़कर देखा जा सकता है. देश में मानसून अंडबार निकोबार से प्रवेश करता है. इसके प्रश्चात दो दिशाओं में विभक्त होकर पूरे देश में फैल जाता है. भारत में होने वाली कुल बारिश का 80 % सिर्फ मानसून के दौरान ही होता है. जानने योग्य बात है कि कुल खाद्यान का 44 % से ज्यादा उत्पादन वर्षा निर्भर क्षेत्र से होता है.
दक्षिण – पश्चिम मानसून दुनिया भर में मौसम तंत्र का सबसे नायाब उदाहरण है पर मौसम बदलाव भी सूखा या बाढ़ की स्थिति ला सकता है (यह दक्षिण पूर्व मानसून की तुलना में 3 गुना ज्यादा शक्तिशाली होता है.)


जल नहीं अमृत है

 मैग्सेसे पुरस्कार विजेता जल संरक्षण विशेषज्ञ राजेन्द्र सिंह  कहते हैं एक बार की भरपूर बारिश यदि पूरी तरह सहेज ली जाए तो वर्ष भर की पानी की सभी जरूरतों के लिए ये पर्याप्त है. पानी बरसता है और बह जाता है.
गाँवों से ज्यादा शहरों में समस्या विकराल रूप ले रही है बारिश कम हो रही है लेकिन पानी का प्रयोग दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है. आपूर्ति भूगर्भीय पानी पर निर्भर है लेकिन इसके पुर्नभरण के लिए सरकार से लेकर नागरिक तक बेपरवाह हैं. पुर्नभरण का एकमात्र जरिया बारिश का पानी है. बारिश के महीनों में यदि हम इस वर्षा जल को सहेज लें तो पानी की कमी जैसी बढ़ती समस्या से निजात पा सकें. चारों ओर बढ़ती सीमेन्ट की सड़कें , अनियोजित नगर प्लान, पक्की सडकें, खत्म होते मैदान, बगीचे, जंगल. पानी रूके, ठहरे तो कैसे ?उसे इन परिस्थितियों में बहकर नाले में ही जाना है जो किसी लायक नहीं रहेगा.
पानी के रिसाइकल का सरकारी स्तर पर सोचा जा रहा है. उस पर निवेश सोचा जा रहा है जरूरत है पहली धारा के पानी को संरक्षित करने की, जमीन में पानी पुर्नभरण करने की . शहरी  नागरिकों को भी नई तकनीकों को जो पानी संरक्षण से संबंधित हैं उन्हें अपनाना होगा, तालाबों , जलाशयों, बावडियों का पुर्ननिमार्ण या नवनिमार्ण करना रड़े तो करना होगा तभी हम अपने लिये पानी की व्यवस्था कर पाएगें.

न रहेगा जल तो कैसे बचेगा मानव , कैसे बचेगा जीवन इस पृथ्वी पर . अपने लिये बचाएँ जल.

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