प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएं

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पद पर बैठते ही ताबड़तोड़ विदेश यात्राएं करना प्रारंभ कर दिया है. इक्कीस देशों की यात्राएं कर विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने भी अपनी यात्राओं पर देश के ३१७ करोड़ रूपए खर्च कर दिए हैं. यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य निवेश लाना बताया जा रहा है, लेकिन देखा जाए तो यह देश की विश्व छवि पर निर्भर करता है न कि मंत्रियों की यात्राओं पर. ४ दिसम्बर २०१३ को जर्मन प्रेस में छपे लेख के अनुसार यूरोपियन कमीशन ने भारी भरकम प्रत्यक्ष निवेश के लिए जिन २० देशों को वरीयता क्रम में चुना है उनमें भारत का कहीं नाम भी नहीं है. इस के लिए भारत में भ्रष्ट, लापरवाह, नौकरशाही, बढ़ते अपराध, असुरक्षित महिलाएं, अनुशासनहीन लोग जिम्मेदार बताए गए हैं. सरकार अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी भी नहीं निभा पा रही है. सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अनुपालना नहीं हो रही है. माफिया देश में समानान्तर सरकार चला रहा है. राज्य दिन ब दिन ज्यादा हावी हो रहे हैं या कहीं बिल्कुल ही अप्रासंगिक हो गए हैं. शीर्ष स्थानों पर बैठे राजनेताओं, उद्योगपतियों, मीडिया हाउसों, नौकरशाहों और अपराधियों का गठबंधन बन गया है. सभी मिल कर अपने स्वार्थ की पूर्ति में लगे हुए हैं.

देश के कुछ ही लोग अर्थव्यवस्था पर हावी हैं छोटे उद्योग आखिरी सांसें ले रहे हैं या कर्जे के बोझ तले दबे हुए हैं. स्वयं सर्वोच्च् न्यायालय ने अपने फैसलों में नक्सलवाद और आतंकवाद के लिए सरकारी नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है. आज देश में तरह-तरह के वाद बेहिसाब पैर फैला रहे हैं. कहीं भाषावाद, प्रांतवाद, रंगवाद, जातिवाद, धर्मवाद और अब नया शहरवाद भी फैलने लगा है. मनुष्य के इन वाद के नाम पर इतने विभाजन, इससे पहले कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा. इसमें कोई शक नहीं है कि मोदी के प्रधानमंत्री पद पर आने के बाद देश में नई आशा का संचार हुआ है लेकिन स्थिति में कोई परिवर्तन कहीं भी हुआ हो, ऐसा नजर नहीं आता है. जरूरी है कि सरकार अपनी प्राथमिकताएं निर्धारित करे. ताबड़तोड़ विदेशयात्राएं कोई बड़ा भानुमति का पिटारा देश के लिए नहीं खोलने वाली हैं. भविष्य यात्राओं की सूची भी लंबी है. इन यात्राओं की सार्थकता पर चिंतन जरूरी है. यह कार्य केवल सत्ताधारी दल पर ही नहीं छोड़ा जा सकता है. इन यात्राओं पर देश भर में लंबी चर्चा करनी होगी तभी कुछ परिणाम नजर आएगा.

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