प्रणब मुखर्जी : नेहरूवादी नेता का संवैधानिक राष्ट्रवाद से हिंदू राष्ट्रवाद को चैलेंज

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय नागपुर में गुरुवार को अपने  दिए गए भाषण में प्रणब मुखर्जी ने  भावी प्रचारकों को संबोधित करते हुए  नेहरू के संवैधानिक राष्ट्रवाद से हिंदू राष्ट्रवाद को  चैलेंज किया. अगर कांग्रेस के नेताओं में थोड़ी सी भी राजनितिक समझदारी है, तो वो संघ का न्योता कुबूल करने और नागपुर जाने के लिए प्रणब मुखर्जी के खिलाफ की गई अपनी बयानबाजी के लिए खुद को कोस रहे होंगे.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय नागपुर में गुरुवार को दिए गए प्रणब मुखर्जी के  भाषण की कई बातें बेहद खास रहीं. पहली बात तो ये कि अपने भाषण की शुरुआत में संघ के पदाधिकारियों का नाम लेने के अतिरिक्त  पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आरएसएस शब्द का इस्तेमाल अपने  पूरे भाषण में एक बार भी नहीं किया. दूसरी ख़ास  बात ये कि उन्होनें  अपने भाषण में जहां कई बार भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू समेत कई कांग्रेसी नेताओं का विस्तार से जिक्र किया, इसके बिल्कुल विपरीत  संघ के नेताओं या उनके विचारकों के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा. न सावरकर, न मूंजे, न हेडगेवार और न ही अपने बंगाली सभ्रांत वर्ग  से ताल्लुक रखने वाले  श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जिक्र प्रणब मुखर्जी ने किया.

अपनी विचारधारा

सार्वजनिक जीवन में आपके एक एक कार्यकलाप का  काफी महत्व होता है. इस कार्यक्रम में प्रणब मुखर्जी की वेशभूषा से लेकर उनका व्यवहार उनके बारे में समझने के लिए काफी  अहम  रहा. जो लोग प्रणब मुखर्जी की तात्कालिक मानसिकता को समझना चाह रहे थे, उनके लिए इस कार्यक्रम की शुरुआत में ही एक अहम संकेत  मौजूद था .  कार्यक्रम की  शुरुआत में   भगवा झंडा फहराया गया, तो, संघ के हजारों स्वयंसेवक और पदाधिकारी सफेद कमीज, खाकी पैंट और चौड़े बेल्ट लगाए हुए बेहद सम्मान के साथ खड़े हुए और ध्वज को उनके अपने विशेष अंदाज़ में प्रणाम किया.

गणवेश धारी स्वयंसेवकों की भीड़ में धोती, कुरता और अचकन पहने पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भीड़ में अल्पसंख्यक मगर खालिस नेहरू- गांधीवादी नेता  लग रहे थे. उन्होंने न ध्वज प्रणाम किया और न ही वो भीड़ उनके दिमाग पर हावी हुई . अपनी विचारधारा से बिल्कुल अलग विचारधारा वाले एक संगठन के कार्यक्रम में वो उस  ध्वजारोहण के एक  अपरिचित मूक दर्शक मात्र थे.

इससे  एक  स्पष्ट संकेत जा रहा था  कि प्रणब मुखर्जी इससे अलग झंडे और अलग राष्ट्रगान के अनुयायी हैं. हालांकि न ही वो झंडा वहां फहराया गया और न ही वो राष्ट्रगान गाया गया. प्रणब मुखर्जी ने साफ तौर पर जाता  दिया कि वो इस आयोजन के प्रतिभागी नहीं, सिर्फ मेहमान हैं, जिसकी अपनी अलग विचारधारा है. प्रणब मुखर्जी ने एकदम साफ़ संकेत  दिया था कि वो विनम्र और सभ्य  होंगे, मगर उस आयोजन के प्रति कोई सम्मान नहीं दिखाएंगे.

बहुलता, सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता का राष्ट्रवाद

पूर्व राष्ट्रपति ने भारतीयता, राष्ट्रवाद और देशभक्ति के बारे में बात की, तो उनके विचार संघ की बुनियादी विचारधारा से बिल्कुल अलग थे. मुखर्जी ने अपने भाषण में उपस्थित श्रोताओं को याद दिलाया कि भारत अनेक  सभ्यताओं और संस्कृतियों के मेल से बना है. मुखर्जी ने कहा, ‘भारत की राष्ट्रीय पहचान सदियों के मेल-जोल और साथ रहने से बनी है. आधुनिक भारत को कई भारतीय नेताओं ने परिभाषित किया है और ये भारतीयता किसी विशेष  नस्ल या धर्म से नहीं जुड़ी है’.

संघ के कट्टर हिंदू राष्ट्रवाद  को ही भारतीयता मानने वाले  स्वयंसेवकों के लिए अपने संगठन के मुख्यालय में उस भारत के निर्माण की प्रक्रिया को सुनना जो अनेक  सभ्यताओं और संस्कृतियों के संगम  से बनी है, बिल्कुल ही अनोखा अनुभव  रहा होगा. प्रणब मुखर्जी ने अपने भाषण में बहुलता और सहिष्णुता को भारत की आत्मा बताया. उन्होंने धर्म के नाम पर भारतीयता को परिभाषित करने की कोशिश को सिरे से खारिज कर दिया. उन्होनें कहा की प्रजा  के कल्याण में ही शासक की भलाई है. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी  ने ये विचार संघ और उसके सहयोगी संगठनों की मानसिकता को ध्यान  में रखकर ही व्यक्त किए होंगे.

अब अगर कांग्रेस के नेता इस घटना  को अच्छे से भुना सकते हैं, तो उन्हें इस बात को जोर-शोर से प्रचारित करना  चाहिए कि ये एक नेहरूवादी अहिंसक विचारधारा वाले  नेता    में ही ये  साहस हो सकता है   कि वो प्रतिद्वंदी के गढ़ में जाकर अपने दिल की बात बेखौफ होकर कर सके . जैसा कि कांग्रेस के राष्ट्रिय प्रवक्ता  रणदीप सुरजेवाला ने कहा भी है  कि कांग्रेस को संघ को सीख देनी चाहिए कि वो पूर्व राष्ट्रपति की सीख को माने और उनके बताए हुए बहुलता और धर्मनिरपेक्ष  रास्ते पर चले.

सर्वकालिक  तस्वीर

पल-पल के समाचार और घटनाओं को  बताने और ट्वीट के जरिए दुनिया  के सामने लाने के  इस दौर में इस कार्यक्रम की सिर्फ एक तस्वीर सर्वकालिक तस्वीर  होगी. खाकी पतलून पहने हजारों लोगों की भीड़ में सफेद धोती पहने हुए खड़ा एक शख्स, जो संघ के भगवा मुख्यालय में बिल्कुल अलग नज़र आ रहा था न केवल विचारों से बल्कि अपनी वेशभूषा से भी, अपने आपके उस कटटर विचारों की हवा से अलग होने के विश्वास के रूप में .  प्रणब मुखर्जी के शब्द स्थाई होंगें , जिसमें उन्होंने उस भारतीयता की बात की, जिसकी प्रेरणा उन्हें नेहरु और गाँधी  से मिली थी.

डेस्क

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