नीली बिंदी

दो दिन पहले मुंबई से फोन आया था. मिलिंद ने शादी का प्रस्ताव रखा था. उसके साथ, धीमे मीठे स्वर में बोला था मिलिंद, ये प्रस्ताव है थोपा हुआ फैसला नहीं. दो दिन बाद जयपुर आ रहा हूं. यदि केसर भी ऐसा चाहती है तो मिलिंद के मनपसंद रंग नीले रंग की ड्रैस पहनकर उससे मिले अन्यथा किसी भी रंग के कपड़े पहनकर आए, दोस्त वो हमेशा ही रहेंगे.

तभी से केसर की आंखों से नींद गायब हो गई थी. वहां मौजूद थी वो उम्मीद जिसमें बचपन में देखे गए सपने का सच होना था.

वो सपना जिसमें वो जिंदगी भर मिलिंद के साथ रहना चाहती थी. केसर बचपन में अपनी मौसी के साथ भोपाल में रहती थी. मिलिंद और केसर दोनों का बचपन साथ साथ इंदौर में बीता था. दोनों के परिवारों में मित्रता होने की वजह से उनकी मित्रता को प्रगाढ़ होने का मौका मिला. साथ ही दोनों परिवारों के घर नजदीक होने की वजह से परिवारों में नजदीकी ज्यादा थी. इधर इन दोनों का एक ही विद्यालय और एक ही कक्षा में पढऩे की वजह से बचपन की पहली दोस्ती उन दोनों के बीच होना स्वभाविक था. दोनों का स्कूल घर से काफी दूर था. वे स्कूल बस से स्कूल जाते थे. दिन भर वे कक्षा में साथ रहते बस में साथ आते जाते और घर पर भी साथ ही खेलते और पढ़ते.

दोनों एक दूसरे के गहरे दोस्त बन गए. उस उम्र के अपने सुख दुख थे वो उसके साझीदार थे. एक दूसरे की खुशी में खुश होते और दुख में उदास. बचपन की ये दोस्ती स्वार्थरहित और दुनियादारी से अछूती थी. यहां रंग, रूप, पैसा, पद, सामाजिक प्रतिष्ठा, जाति कुछ भी दोनों के बीच में नहीं था. यदि कुछ था तो वह था एक ऐसा अपनापन जिसमें उनकी दुनिया में सिर्फ वे दो ही थे.

समय ने करवट बदली मिलिंद के पिताजी का स्थानांतरण मुंबई हो गया. वे वहां बांद्रा में रहने लगे और केसर जयपुर में आ गई थी. लेकिन दोनों के बीच का संपर्क यथावत बना रहा. लगभग हर हफ्ते वे एक दूसरे को पत्र लिखते. पत्र में हर बात विस्तार से लिखी जाती शिक्षा, स्कूल, टीचर, नए दोस्त सभी कुछ उसमें होता था. इस बीच आठवीं कक्षा की गर्मियों की छुट्टियों में केसर का अपने मुंबई स्थित रिश्तेदारों के यहां जाना हुआ. तभी मिलिंद के जन्मदिन का अवसर था. वह उससे मिलने न केवल उनके घर गई वरन दो दिन उनके घर भी रूकी. तब उसे पहली बार अहसास हुआ कि उसकी और मिलिंद की दोस्ती बचपन से आगे आ चुकी है. उन दो दिनों में केसर की जिंदगी में भावनाओं का तूफान आ गया. मिलिंद ने अपने सभी दोस्तों को उसका परिचय पूर्व में ही दे रखा था. वहां आए लगभग सभी दोस्तों ने मिलिंद से पूछा यही है केसर जिससे तेरी शादी होने वाली है. इसी तरह की बातों से केसर के दिल में हलचल शुरू हो गई. उस रात जबकि सभी बड़े पार्टी में व्यस्त् थे उसने मिलिंद का नया बना सफारी सूट मजाक में पहन लिया. बचपन की इन्हीं शरारतों के बीच मिलिंद ने अपने कमरे में आने पर उसकी हथेलियों को अपने हाथों में पकडक़र चूम लिया और धीरे से बोला आई लव यू केसर.

फिर उसकी तरफ नजरें उठा कर उससे पूछा- तुम भी मुझसे प्यार करती हो?

तब केसर इस सवाल का कोई जबाव नहीं दे सकी थी. अगले दिन उनका शाम को उनके घर से लौटने का कार्यक्रम था. सुबह बाथरूम में वह नहाने घुसी तभी मिलिंद ने दरवाजा पीट पीट कर शोर कर दिया. बस एक ही बात बोले जा रहा था जल्दी बाहर आओ.

वो अंदर से गुस्से में बोली-आ रही हूं बाल पोंछने तो दो. मुझे तुम्हें गीले बातों में देखना है केसर- मिलिंद ने धीमे से कहा.

उनके जाने का समय हो रहा था. मिलिंद अंदर आकर बोला- केसर, थोड़ी देर रूक जाओ ना. वो मिलिंद से कुछ कह पाती इससे पहले मिलिंद ने आगे बढक़र उसके हाठों पर अपना स्पर्श अंकित कर दिया.

केसर जयपुर वापस तो आ गई लेकिन इस बार उसका दिल मिलिंद के पास ही छूट गया था. इधर मिलिंद का भी बुरा हाल था. उसके गहरे मित्र आनंद ने उससे पूछा भी क्या हुआ लेकिन वो कुछ बता ही नहीं पाया कि हुआ क्या? इसी बीच खतों का सिलसिला चलता रहा. केसर ने स्कूली शिक्षा पूरी करके विज्ञान के स्नातक कोर्स बीएससी में दाखिला ले लिया और इधर मिलिंद को इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश मिल गया था. तभी उन दोनों को मौसी के यहां उनकी बड़ी बेटी की शादी में फिर से भोपाल जाने और मिलने का अवसर मिला. केसर दो दिन पहले से शादी में पहुंच गई थी. सभी उसकी फुर्ती और उसके हर काम की दक्षता की तारीफ कर रहे थे. उसे मालूम था कि मिलिंद तडक़े सुबह की फ्लाईट से भोपाल आ रहा है. एक तो अपने बचपन की जगह उस पर सभी बचपन की सहेलियों से मिलने में उसके ये दो दिन कहां निकल गए थे उसे मालूम ही नहीं पड़ा.

शादी का घर, चहल पहल से भरपूर, उस पर आस पड़ोस के जानकार, दोस्त, सहेलियां, भाई-बहन वह तो थक ही नहीं रही थी. फरवरी के ठंड के दिन थे. सुबह 6 बजे उसने मामाजी के बेटे से पूछने के लिए कि चाय लोगे क्या ? उसने भाई के लिहाफ को खींचा तो चौंक गई. लिहाफ में मिलिंद था वो भी हड़बड़ाकर उठ गया.

दोनों एक दूसरे को देखते रह गए. मिलिंद केसर को देखता ही रह गया. भीगे, लंबे खुले हुए उसके बालों के पानी की बूंदें मिलिंद के चेहरे पर टपक रही थीं. ताजा, मुस्कुराता हुआ चेहरा, एक पल भी नहीं लगा, दोनों को एक दूसरे को पहचानने में . मिलिंद उठकर बैठ गया बोला- केसर तुम तो बेहद खूबसूरत हो गई हो.

केसर के चेहरे पर लाज भरी मुस्कान होठों से लेकर आंखों तक फैल गई. पलकें झुकाते हुए उसने पूछा आप कब आए ? बस थोड़ी देर पहले.

शादी के वो तीन दिन केसर इंतजार करती रही मिलिंद कुछ ऐसा बोलेगा जो उसके अहसास को बताए. वो दोनों तीनों दिन साथ रहे, मिलिंद जब भी केसर को देखता केसर को उसमें कुछ अनकहा नजर आता. पर दोनों के हाठों तक कोई शब्द नहीं आए. दूसरे दिन शादी से पहले रात को जागरण था. घर में सभी मस्ती के मूड में थे. केसर भी अपने हाथों में मेहंदी लगा रही थी तभी आनंद ने पूछा केसर, इसमें किसका नाम लिखोगी ?

हमारा नाम लिख लो-पीछे से मिलिंद की आवाज आई. केसर ने पलकें उठाकर मिलिंद की तरफ देखा. उसके चेहरे पर गंभीरता थी परंतु होठों पर मुस्कान. केसर भी मुस्कुरा दी.

मौका पाकर आनंद ने मिलिंद से पूछा- क्या बात है यार. कुछ गड़बड़ है क्या?

नहीं, कुछ नहीं- मिलिंद ने टाला. परेशान तो तू ऐसा लग रहा है जैसे तेरा कुछ खो गया है.

हां, किसी की आंखों में कुछ खो गया है.

गहरी सांस लेते हुए मिलिंद ने जबाव दिया.

शादी से लौटते हुए दोनों ने एक दूसरे को बिना कोई वादा किए बिना कुछ मन की बात कहे सिर्फ पत्र लिखते रहने को कहा.

समय के साथ मिलिंद अपनी पढ़ाई और इंजीनियरिंग कॉलेज के उन्मुक्त वातावरण में केसर और उसकी आंखों की महक भूलने लगा. परंतु केसर ? उसकी तो जैसे दुनिया सिर्फ मिलिंद ही था. उसके लिए समय जैसे थम सा गया था. मिलिंद, केसर को अब कभी-कभी पत्र लिखता था. धीरे धीरे वो भी बंद हो गया. अपने आखिरी पत्र में उसने स्वीकार किया कि केसर तुम मेरा पहला प्यार हो, मेरे बचपन का प्यार हो लेकिन मेरे सपनों में एक फोटो नहीं है वहां पूरी एलबम है उसने खत में अपनी गर्लफ्रेंड की पूरी फेहरिस्त लिखी थी. उसके बाद तो केसर जैसे टूट गई. जब भी मिलिंद के बारे में सोचती आंखों की कोरों से आंसू लुढक़ पड़ते. वो धीरे धीरे मिलिंद को भुलाने को असफल प्रयास करती.

इधर मिलिंद की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. उसकी एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में ऊंचे पद पर नौकरी लग गई और घर में शादी की जल्दी. मिलिंद ने ढेरों लड़कियां देख ली, अपनी गर्लफ्रेंड की सूची भी देखी परंतु कहीं नहीं मिल रहे थे उसको वो दो नन्हें हाथ जो उसका हाथ थामकर कहते थे चलो मिलिंद हम साथ मिलकर एक ही टिफिन से खाना खाते हैं. तुम नहीं लाए तो क्या हुआ?

सभी उसके रूप, रंग, वेतन, पद को देख परख रहे थे. उनमें कहीं भी नहीं था वो निस्वार्थ प्रेम. तभी उसने फैसला किया लेकिन वो अपने फैसले को केसर पर जबदरस्ती नहीं थोपना चाहता था और ना होने की स्थिति में अपनी दोस्ती भी नहीं खोना चाहता था. मुंबई से जयपुर की फ्लाईट पकड़ते हुए उसका हृदय सशंकित था. जयपुर पहुंचकर सांगानेर हवाई अड्डे से बाहर आकर उसने टैक्सी ली. घड़ी देखी शाम के 4 बजे रहे थे. टैक्सी को उसने सीधे रामनिवास गार्डन चलने को कहा. आधा घंटे में टैक्सी रामनिवास पर जाकर रूक गई. उसने किराया चुकाया और उतरकर रवीन्द्रमंच की आरे चल दिया. यही वह जगह थी जिसके बाहर दोनों ने मिलना तय किया था. उसने देखा वहां कोई नहीं था. आसपास कुछ आईस्क्रीम और गोलगप्पे के ठेले खड़े थे. दूर तक कबूतर चुग्गा चुग रहे थे. वह वहां लगी एक बैंच पर बैठ गया. इंतजार करते हुए उसे लगभग आधा घंटा हो गया था.

केसर नहीं आई थी. मिलिंद के मन में निराशा छा गई. थके हुए कदमों से उठकर वह दो कदम चला ही था कि पीछे से कबूतरों के जोर से पंख फ्डफ़ड़ाकर उडऩे की आवाज आई. उसने चौंक कर पीछे देखा कबूतरों के बीच में से नीले वस्त्रों में लिपटी हुई केसर तेज कदमों से उसी की तरफ आ रही थी.

मिलिंद के कदम ठहर गए उसकी आश्चर्यमिश्रित खुशी का ठिकाना न था. उसने केसर के आने की उम्मीद बिल्कुल ही छोड़ दी थी.

केसर उसके पास आकर रूक गई. कैसी हो केसर ? मिलिंद ने पूछा.

आप कैसे हैं ? केसर ने प्रश्र किया.

ठीक हूं. मिलिंद के जबाव को सुनकर केसर धीरे से बोली- आप ठीक हैं, तो हम भी ठीक ही होंगे.

मिलिंद मंत्रमुग्ध उसे देखता रह गया. वही बिना शर्त का समर्पण.

ऑटो नहीं मिल रहा था मिलिंद इसलिए देरी हो गई.

नहीं , अभी देर नहीं हुई–कहते हुए मिलिंद ने अपनी बाहें फैला दीं.

केसर उन बांहों में समा गई. कुछ पल दोनों एक दूसरे की धडक़नें सुनते रहे. तभी आसपास की आवाजों से चौंक कर दोनों अलग हो गए.

केसर के चेहरे पर शर्म की लाली फैली हुई थी. उसने अपने माथे पर हाथ रखते हुए चौंक कर कहा-मेरी बिंदी !

मिलिंद ने देखा उसकी कमीज की आस्तीन पर केसर की नीली बिंदी लग गई थी. उसने उसको उठाकर केसर के माथे पर लगा दिया. कबूतर दाना चुग चुके थे. वे घर लौटने की तैयारी कर रहे थे.

सूरत अस्ताचल को जा रहा था. केसर के माथे की नीली बिंदी जगमगा रही थी. मिलिंद ने अस्फुट स्वर में पूछा, मुझसे शादी करोगी केसर ?

केसर ने धीमे से कहा हां ! और शर्म से पलकें झुका ली. उसके पूरे चेहरे पर खुशी की आभा बिखरी हुई थी. मिलिंद को सीप का मोती मिल गया था.

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