नए भारत की उम्मीद नए वर्ष में

नव वर्ष का आगमन नई उमंग के साथ ही एक नई ऊर्जा का भी संचार करता ही है, कुछ नया और अच्छा होने की आस भी जगाता है. 


यह आस तब उत्साह में बदलती है जब विभिन्न चुनौतियों से पार पाना आसान दिखने लगता है. इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता और न ही किसी को करना चाहिए कि काल चक्र में परिवर्तन के बाद भी देश अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है. ये चुनौतियां सामाजिक-आर्थिक-औद्योगिक क्षेत्र के साथ-साथ अन्य अनेक क्षेत्रों में भी हैं. जब यह कहा जाता है कि नए भारत में जातिवाद-संप्रदायवाद और आतंकवाद जैसी समस्याओं से देश को मुक्ति मिले तो एक तरह से चुनौतियों को ही रेखांकित किया जाता है. भारत जैसा विभिन्न संस्कृतियों वाला देश अपने समक्ष उत्पन्न चुनौतियों से लड़ने में तभी सक्षम हो सकता है जब सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ा जाए. यही सकारात्मक सोच चुनौतियों से पार पाने की प्रेरणा प्रदान करती है. 


 नया वर्ष इस प्रेरणा का स्नोत बने और हर किसी के लिए बने, इससे बेहतर और कुछ नहीं. नव वर्ष की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री ने अपने मासिक कार्यक्रम मन की बात के जरिये यह उचित ही कहा कि अपने-अपने स्तर पर सकारात्मक परिवर्तन ही नए भारत का निर्माण है यह सकारात्मक भाव चहुं ओर फैले-बढ़े, इसमें नीति-नियंताओं के साथ आम लोगों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. इसी भूमिका को रेखांकित करने के लिए प्रधानमंत्री ने नव वर्ष के आगमन को इस आधार पर विशेष बताया कि 21वीं सदी के प्रारंभ यानी वर्ष 2000 में जन्म लेने वाले मतदाता बनने और इस तरह भारतीय लोकतंत्र में सहभागी बनने जा रहे हैं. 


21वीं सदी में भारत के भावी स्वरूप को लेकर कई तरह की कल्पनाएं रही हैं. इनमें से कुछ तो साकार होती दिख रही हैं, लेकिन कुछ अभी भी समस्याओं के रूप में सामने खड़ी दिख रही हैं. इन समस्याओं से साझे ढंग से लड़ना होगा. इन समस्याओं से लड़ने के लिए देश में उपयुक्त वातावरण का निर्माण हो, इसके लिए शासन-प्रशासन के साथ-साथ समाज को भी एकजुट होना होगा. 2018 का आगमन 21वीं सदी के आगे बढ़ते सफर की भी बात करता है. 21वीं सदी के बारे में यह एक दृढ़ मान्यता रही है कि यह सदी एशिया की होगी और इसमें भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी. नि:संदेह इसकी एक झलक तब दिखेगी जब आगामी गणतंत्र दिवस पर आसियान संगठन के दस देशों के शासनाध्यक्ष भारत के अतिथि बनेंगे.

 21वीं सदी में भारत की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो, इसलिए यह आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है कि देश एक बड़े लोकतंत्र से एक श्रेष्ठ लोकतंत्र की दिशा में आगे बढ़े. अब केवल इतना ही पर्याप्त नहीं कि भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र है. यदि देश को एक बेहतर लोकतंत्र में बदलना है तो इसके लिए लोकतांत्रिक मूल्यों-मर्यादाओं के प्रसार के लिए कुछ विशेष करने की आवश्यकता है. इस आवश्यकता की पूर्ति करते समय यह भी ध्यान रखना होगा कि कोई भी देश श्रेष्ठ लोकतांत्रिक देश के रूप में तब परिवर्तित होता है जब वहां हर कोई देश-निर्माण में अपना योगदान देने के लिए प्रेरित होता है. नव वर्ष का आगमन इस प्रेरणा के प्रसार में सहायक बने, यह कामना सभी को करनी चाहिए.


आप सभी के लिए नव वर्ष खुशियों की सौगात लाये इस शुभकामना के साथ —-

  स्नेह के साथ,किरन संजीव 

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