नई रोशनी -कहानी

नम्रता के मायके में उसकी माँ रुढ़िवादिताओं की जंजीरों में जकड़ी हुईं थीं. नम्रता ने मायके जाने पर अपनी माँ से ऐसा क्या कहा जिससे कि दीवाली से पहले ही उसके मायके में दीवाली की रोशनी छा गई.

गुजरात में नवरात्रि बहुत ही धूमधाम से मनाई जाती है इसलिए दुर्गा नवमी और दशहरे की छुटिटयां थी और उस के बाद शनिवार और रविवार की छुटटी थी. उसने तीन दिन के लिए दिल्ली जाने का निश्चय किया और विशाल से अपना आरक्षण तत्काल में करवाने को क हा. नम्रता बड़ौदा में र हती थी. उस के पति विशाल बैँक में नौकरी करते थे और वह स्वयं एक प्राइवेट फर्म में अकाउंटेंट थी. विशाल और उस के विचार काफी सुलझे हुए और आधुनिक थे इसलिए दशहरा क हां मनाना है इस बात को लेकर दोनों में कोई विवाद ही नहीं था. उसका मायका दिल्ली करोलबाग में था मूल रूप से नम्रता का मायका आगरा से संबंध रखता था परंतु भैया की नौकरी दिल्ली में होने के कारण मां पिताजी उन के साथ दिल्ली में र हते थे. भाई एक छोटी सी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था जिसमें वेतन बहुत ही कम था और जो जीवन यापन के लिए पर्याह्रश्वत नहीं था. भाभी शीला भी एक विद्यालय में शिक्षिका थीं.

पिछले कुछ समय से नम्रता की मां की तबियत खराब चल रही थी उस के पिता की आंख का भी ओपरेशन हुआ था. उस समय वहां नहीं जा सकी थी एक तो बच्चों की परिक्षाएं थीं और दूसरी उस की अपनी नौकरी, जहां छुटिटयां आसानी से नहीं मिलती है.

विशाल ने नम्रता का आरक्षण तत्काल में करवा दिया.नम्रता ने बेटी नव्या और बेटे नवीन को थोड़ा समझाया. इधर विशाल ने भी छुट्टी ले ली थीं जिससे नम्रता को परिवार की चिंता से मुक्ति मिल गई थी. ट्रेन रात की थी पूरी रात आसानी से सोते हुए निकल गई. सुबह ग्यारह बजे ट्रेन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंची. भैया लेने आ गए थे. ऑटो करके वे घर पहुंचे. भैया का दो कमरों का फलैट एक सोसायटी में बहुमंजिला इमारत में था वे लोग लिफट से आठवें तल पर पहुंचे. भैया ने डोर बेल बजाई तुरंत ही मां ने दरवाजा खोला. नम्रता मां के गले लग गई.

‘‘कैसी हो मां?’’

‘‘अच्छी हूं बेटा’’

‘‘बहुत समय बाद आना हुआ इस बार’’

‘‘हां मां’’. रोजमर्रा की भागदौड़ में समय ही नहीं मिल पता है कहते हुए नम्रता अंदर बैठक में आकर सोफे पर बैठ गई.

मां पानी ले आई. शीला भाभी स्कूल गईं हुईं थीं. मां ने बताया दो बजे तक घर आ जाएगी.

वह उठ कर नहाने चली गई. नहा धोकर आई तो भैया भी अपने कार्यालय जा चुके थे और मां चाय बना लाई थी साथ में एक ह्रश्वलेट में नमकीन भी थी. नम्रता मां का हालचाल पूछने लगी उसने ध्यान से देखा, मां काफी कमजोर हो चुकी थी.

आप भी लो मां, नाश्ते की ह्रश्वलेट मां के आगे करते हुए नम्रता बोली.

नहीं बेटा आज मेरा नवमी का व्रत है, रात को फलाहार करूंगी. उसने कहा ठीक है पर अब जब आह्रश्वा की तबियत ठीक नहीं रहती है व्रत क्यूं कर रही हैं आप स्वस्थ हो जाइए फिर कर लेना. फिर मां खाना बनाने लगी तभी मां बोली मुझे मालूम था तू आनेवाली है.

मैंने जंत्री देखी थी कुछ अच्छा होने वाला है उसी से मुझे पता लगा था.

नम्रता को हंसी आ गई. जंत्री से मालूम पड़ गया था कि मैं आ रही हूं तो अपनी जंत्री से पता करके बताओ वापस कब जा रही हूं?

मां बोली अब आई है तो दो दिन तो रहेगी ही. नम्रता हंसने लगी.

दोपहर को भाभी आ गईं सबने मिलजुल कर खाना खाया. खाना खाकर वो भाभी से बातें करने लगी उनकी मां की तबियत के बारे में, उन के मायके के सदस्यों के बारे में हालचाल जानने लगी. उनका भी अपनी मां से मिलने जाने का बहुत मन था परंतु यहां मां- पिताजी को अकेले छोड़कर जाने में भी वे परेशानी का अनुभव कर रही थीं. मां भी वहीं बैठी उन दोनों की बातचीत सुन रही थीं. भाभी दीवाली पर आप की, बच्चों की और भैया की भी छुट्टियां होंगी. इस बार दीवाली आप अपने माता-पिता के साथ मना लीजिए. मां-पापा या तो जीजी के पास या आगरा चले जाएंगे इस बार दीवाली मनाने. नम्रता भाभी से बोली

अरे, ऐसा थोड़े ही ना होता है. दीवाली तो बहुओं को अपने ससुराल की ही मनानी चाहिए मायके में दीवाली मनाना अशुभ होता है मां बीच में ही बोली

तो ठीक है भाभी, आप दीवाली के अगले दिन चली जाइयेगा, नम्रता बीच का रास्ता निकालती हुई बोली.

अरे, अगले दिन पड़वा होती है उस दिन जाना अशुभ होता है, मां ने उस की बात काटते हुए कहा. पता है आगरा में अपने पड़ोसी श्रीवास्तव जी की बहु सुनीता पड़वा के दिन अपने मायके गई थी. गर्भवती थी तब, बच्चा मर गया उसका होने के बाद. नम्रता मां की तरफ मुंह करके बोली-आप भी मां किस जमाने में जी रही हैं. बच्चे के जीने मरने की कई शारीरिक मानसिक वजहें हो सकती है ये पड़वा क्या होती है? आज की पीढ़ी के एक चौथाई लोग भी ये नहीं जानते हैं और महानगरों में तो जिंदगी इतनी व्यस्त और तेज है कि वे यदि दिन के अनुसार अपना आना जाना निर्धारित करें तो उन कोई कार्य ही पूरा नहीं होगा.

खैर कोई बात नहीं भाभी, नम्रता ने फिर से सुझाव दिया, इस बार दीवाली पूजन का समय सायं सात बजे है रात दस बजे की ट्रेन से आप लोग चले जाएं, इस प्रकार पड़वा भी नहीं होगी और आप की दीवाली आप की ससुराल में ही हो जाएगी.

मां फिर से बोली-उस दिन तो अमावस्या होती है. घर की बहु बेटियां चौराहा पार नहीं करती हैं. अब नम्रता के पास चुप होने के अलावा कोई चारा नहीं था. भाभी शीला भी बात को समाह्रश्वत करने के उद्देश्य से उठ कर चली गईं. नम्रता भी भाभी के बच्चों अवि, कवि के साथ बातें करने लगी. अगले दिन दशहरा था. सुबह घर में सत्य, वीरता के प्रतीक भगवान राम का पूजन किया गया. दोपहर को खा पीकर उसने और भाभी ने बाजार जाने का कार्यक्रम बनाया. दोनों ने बाजार से बच्चों के लिए कपड़े खरीदे. घर पहुंच कर उन्होंने सभी को कपड़े दिखाए भैया और बच्चे बहुत खुश थे परंतु मां के चेहरे पर अजीब से भाव देखकर उसने पूछ ही लिया-क्या हुआ मां?

बेटा, दीपावली अमावस को होती है उस दिन कोई नए कपड़े नहीं पहनता है फिर मां भाभी की तरफ मुंह करके बोलीं, शीला, तुझे कितनी बार बताया है, अमावस को कोई नया काम नहीं करते हैं न ही नए कपड़े पहनते हैं, ये पितरों का दिन होता है.

नम्रता अवाक मां का मुंह देखती हुई बोली-क्यों मां हमारे पूर्वज हमें नया काम करते देख दुखी होंगे या फिर हमारे नए कपड़े पहनना उन्हें अच्छा नहीं लगेगा.

मां अनसुना करके वहां से चली गईं. थोड़ी देर बाद मां शाम की अपनी नियमित पूजा में लग गई तो शीला उस के सामने मन की भड़ास निकाल बैठी-दीदी, मां का इतना ज्यादा मानना आडंबर और दिखावा लगता है, स्वयं तो रोज बनाया भोजन भी ईश्वर को भोग नहीं लगाती हैं. रोज उन के रहने का स्थान मंदिर तक साफ नहीं करती हैं और तो और सबसे बड़े भगवान, भोजन को बनाने और खाने की जगह पर, मंदिर के कमरे में, मां पापा दोनों ही बाहर सड़क जहां कि लोग थूकते हैं, गाहे बगाहे मनुष्य और पशु मलमूत्र विसर्जन करते हैं लोग गंदगी फेंकते हैं वहां पर पहनी हुई चह्रश्वपलें और जूते लेकर आते हैं. इनकी दिखावटी पूजा पाठ और रूढ़िवादिताओं की वजह से हमें परेशानी उठानी पड़ती है सो अलग. अभी दो महीने पहले की बात है, स्कू टर खरीदना था, कंपनी नया मॉडल बाजार में लाई थी मूल्य थोड़ा ठीक था पर इन्होंने और बड़ी जीजी ने मलमास का अड़ंगा डाल दिया. जीजी ने तो खुद इन्हें फोन करके कहा था कि भैया मलमास है नया स्कूटर मत खरीदना. मलमास के बाद जब वह खरीदने गए तो स्कूटर पर पंद्रह हजार बढ़ गए थे क्या वो रूपए जीजी देने वाली हैं?

नम्रता को समझ ही नहीं आया कि भाभी को क्या जवाब दे.

शीला फिर बताने लगी इधर कोई भी त्योहार हो, चाहे थक रही हों मिठाईयां अवश्य बनेंगी. हालांकि पापाजी को डायबिटीज है पर उसका कोई विचार

नहीं किया जाएगा और मिठाई खूब खाई जाएगी. इधर बड़ी जीजी भी मां से फोन पर इसी प्रकार की बातें करती रहती हैं.


नम्रता को याद था कि जब जीजी की शादी तय नहीं हो पा रही थी और उन की हमउम्र सभी सहेलियों का विवाह हो गया था तब वे आए दिन किसी न किसी नए व्रत को करने लगीं थीं. उन्हीं दिनों मां ने उन्हें किसी पंडित के पास भेजा था, जीजी वहां रोज जाती थीं आखिरी दिन काफी रूपए लेकर उस पंडित ने पूजा करवायी थी. उस पूजा का प्रसाद खीर लाकर जीजी ने भाभी को भी दी थी कि इसे खाने से आह्रश्वाका लड़का हो जाएगा.

उसे याद आता है तो हंसी छूट जाती है. जैसे पंडित की पूजा न हुई लड़के ढूंढ़ने की वेबसाइट हो गई, खीर न हुई लड़के बनाने की मशीन हो गई.

पता नहीं क्यूं नम्रता शुरू से ही इस प्रकार के आडंबरों और अंधविश्वासों में यकीन नहीं करती थी. ईश्वर में उसका अगाध विश्वास था. उस का मानना था कि ईश्वर ने यहां हमें हमारे कर्मों द्वारा परिणाम अर्जित करने के लिए भेजा है साथ ही वह ये भी मानती हैं कि यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो उस के द्वारा निश्चित की गई घटनाओं को किसी पूजा या कर्मकांड के द्वारा बदला नहीं जा सकता है. अत: अपने हाथों में जो कार्य करने की शक्ति है उसे मानना चाहिए और रही दिनों की बात, तो बनाने वाले ने सभी दिन एक समान बनाए हैं फिर आज के तकनीकी और विज्ञान के युग में, जबकि एक छोटा बच्चा भी पूर्णिमा, अमावस्या जैसे तथ्यों केा भौगोलिक विज्ञान के द्वारा जानता है तो फिर इनमें विश्वास करना निरी मूर्खता नहीं तो क्या है? उसने मां से फिर कोई बात नहीं की. रात को भी वह सोचते सोचते कब सो गई उसे पता ही नहीं चला.

सुबह उस की नींद देर से खुली. भाभी और बच्चे स्कूल जा चुके थे और भैया अपने कार्यालय. वह मां के पास आकर बैठ गई उस की आज रात आठ बजे की वापसी की ट्रेन थी. इधर उधर की बातों के पश्चात वह मां से बोली आप उम्र के आखिरी पड़ाव पर हैं, आपने अपनी पूरी जिंदगी अमावस, पूर्णिमा, ये दिन, वो दिन और न जाने क्या-क्या माना है. इनको मानना आह्रश्वाकी श्रद्घा है पर क्या इन्हें दूसरों पर थोपना उचित है? आपने पूरी जिंदगी ये सब किया, क्या आप पर औरों की तरह दु:ख नहीं आए? या भैया की बढ़िया नौकरी लग पाई? आप की वजह से भैया को स्कूटर खरीदने में पंद्रह हजार रूपए ज्यादा खर्च करने पड़े क्या ये ठीक हुआ? आप आराम से सोचिए. आज यहां नहीं जाना, वहां नहीं जाना, आज बाल नहीं धोने, नाखून नहीं काटने, सिर में तेल नहीं डालना जैसी बातें करके सभी को कितनी परेशानी में डाल देती हैं. आपकी वजह से आए दिन बच्चों को स्कूल में तेल और नाखूनों के पीछे डांट पड़ती रहती है और उन्हें सभी के सामने शर्मिंदा होना पड़ता है. ये सभी दिखावा है मां, ईश्वर इतना छोटा नहीं है ना ही उस की सोच वह इनसे बहुत ऊपर की श्रद्घा है. वह सर्वशक्तिमान और दयालु है वह हमारे सृजक हैं पिता के समान हैं हम जो भी सुख दुख उठाते हैं वे जीवन का एक भाग हैं. इन सभी के साथ-साथ आप पुराने रिवाजों को भी भैया पर थोपती हैं जब आप पापा के साथ नौकरी पर थीं और त्योहार पर, दीवाली पर आगरा नहीं जा पाती थीं तो क्या दीवाली नहीं मनाती थीं? जब अनजान लोगों के साथ त्योहार मनाया जा सकता है तो अपने माता पिता के साथ क्यूं नहीं?

रही रस्म की बात, तो रस्म तो ये भी है कि दूसरा बड़ा त्योहार होली लड़की अपने पति के साथ मायके में मनाए, ऐसा भैया-भाभी ने कितनी बार किया है? रस्म तो ये भी है कि पूरा सावन लड़कियां अपने मायके में ही बिताएं, क्या आज के समय में ये संभव है? समाज के नियम मनुष्य ने बनाए हैं जो परिस्थितियों के अनुरूप बदलते हैं, नहीं तो ये सड़ गल जाएंगे और इंसान के गले का फंदा बन जाएंगे. जीवन एक बार मिला है इसे सहका सरल रूप में जीना चाहिए? बुरी और अच्छी कोई हवा नहीं होती है हवा सिर्फ प्राणदायिनी होती है.

मां बिल्कुल चुप थीं, उन्हें बड़ा झटका लगा था, वे सोच में डूब गई थीं. कुछ समय बाद बोली तेरी बातों से मैं सहमत हूं बेटा परंतु अब इस आयु में मैं अपने आपको नहीं बदल सकती हूं, परंतु हां इस बात का वादा करती हूं कि अपने विचार और नियम नई पीढ़ी पर नहीं थोपूंगी.

दोपहर को भाभी के साथ खाना खाते हुए मां बोली, बेटी, शीला तुम्हारी और बच्चों की दीवाली की छुट्टियां कब से हैं, दीवाली के तीन दिन पहले से भाभी बोलीं .मां बोली-तुम दीवाली पर अपने मायके जाने का कार्यक्रम बना लो, समय से सारे अ ा र क्ष् ा ण् ा करवा लेना, हफ्ते भर अपनी मां के पास रह आना और हां अपने लिए भी एक नई साड़ी ले लेना. दीवाली पर पहनोगी तो रूप और खिल उठेगा.

शीला आश्चर्य से मां का चेहरा देखती रह गई और नम्रता के चेहरे पर खुशी छलकी पड़ रही थी. विदा लेते समय जब वह मां के गले लगी तो उस का अंतर्मन खुशी से भीगा हुआ था. आज उसके मायके में दीवाली से पहले ही ज्ञान और समझदारी की नई रोशनी का उजाला छा गया था.

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